हिरण्यगर्भ दान की विधि - एक दिव्य महादान का रहस्य / Hiranyagarbha Daan Vidhi - The Secret of a Divine Donation
हिरण्यगर्भ दान की विधि – एक दिव्य महादान का रहस्य
हिरण्यगर्भ दान सनातन धर्म में एक अत्यंत श्रेष्ठ एवं पुण्यदायक महादान के रूप में जाना जाता है। यह दान महापातकों का भी नाश करने में सक्षम माना गया है। मत्स्य भगवान् द्वारा वर्णित इस दान की विधि गूढ़, विस्तृत तथा अत्यंत प्रभावशाली है। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे हिरण्यगर्भ दान की विधि, उसका महत्व तथा इससे प्राप्त होने वाले दिव्य फल।
हिरण्यगर्भ दान क्या है?
‘हिरण्यगर्भ’ का अर्थ है “स्वर्णगर्भ”। यह दान एक स्वर्ण कलश के माध्यम से किया जाता है जो सृष्टिकर्ता ब्रह्मा का प्रतीक होता है। इस दान का उद्देश्य आत्मिक पुनर्जन्म की कल्पना के साथ दिव्यता की प्राप्ति है। इस दान से व्यक्ति न केवल अपने पापों से मुक्त होता है बल्कि अपने पितरों तक को नरक से तारने की शक्ति प्राप्त करता है।
हिरण्यगर्भ दान की विधि
-
किसी पुण्य तिथि का चयन करें (पूर्णिमा, एकादशी, पर्व आदि)।
-
ऋत्विजों, मण्डप, पूजन सामग्री, आभूषण, वस्त्र, आदि की व्यवस्था तुलापुरुष दान की भांति करें।
-
स्वर्ण से निर्मित एक मंगल कलश बनवाएं, जो 72 अंगुल ऊँचा हो।
-
इसकी चौड़ाई ऊँचाई का एक तिहाई होनी चाहिए।
-
कलश में घृत (घी) और दूध भरा होना चाहिए।
-
इसके पास निम्न वस्तुएं रखें:
-
दस अस्त्र
-
रत्न
-
छूरी, सुई, सुवर्ण नाल
-
सूर्य मूर्ति सहित पिटारी
-
स्वर्ण यज्ञोपवीत, दण्ड, कमण्डलु आदि
-
3. कलश का अलंकरण
-
कलश पर कमल के आकार का ढक्कन लगाएं।
-
मोतियों की माला और पद्मराग मणियों से सजाएं।
-
यह कलश तिलों की वेदिका पर स्थापित करें।
पूजा एवं मंत्रोच्चारण
यजमान स्नान कर, श्वेत वस्त्र धारण करें और पुष्प लेकर यह मंत्र बोले:
“सप्त लोकाधिपत्याय हिरण्यगर्भाय नमः।
हिरण्यकवचाय जगद्धात्रे पुनः पुनः नमः॥
यत्र ब्रह्मादयो देवा गर्भस्थाः स जयतु नः।”
इस प्रकार ब्रह्मा, धर्मराज और हिरण्यगर्भ का आवाहन करें और यजमान स्वयं को उसी गर्भ से पुनः उत्पन्न हुआ माने।
संस्कार एवं अभिषेक विधि
-
आचार्य द्वारा गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म आदि सोलह संस्कार संपन्न कराएं।
-
यजमान को स्वर्ण आसन पर विराजमान कर ब्राह्मणों द्वारा जल कलश से स्नान कराया जाता है।
-
मंत्रोच्चारण:
“देवस्य त्वा…”
दान का समर्पण
-
यजमान स्वर्ण कलश सहित सभी सामग्री (सूई, छाता, चमर, जूता, ग्राम, देश आदि) गुरु को दान करे।
-
ब्राह्मणों का समुचित पूजन करें।
हिरण्यगर्भ दान से प्राप्त होने वाले फल
-
ब्रह्मलोक में पूजित होता है।
-
सौ कोटि कल्पों तक दिव्य लोकों में निवास करता है।
-
पितरों, बन्धुओं, पुत्रों आदि को नरक से तार देता है।
-
सिद्धों, साध्यों, अप्सराओं द्वारा सम्मानित होता है।
-
यह दान सुनने अथवा पढ़ने मात्र से विष्णु भगवान के समान पूजित हो जाता है।
निष्कर्ष
हिरण्यगर्भ दान न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि आत्मिक पुनर्जन्म की दिशा में एक दिव्य प्रयास भी है। यह दान केवल आत्मिक कल्याण नहीं करता, बल्कि पूरे वंशजों के उद्धार का मार्ग प्रशस्त करता है। यदि यह दान श्रद्धा, विधिपूर्वक एवं नियमों के अनुसार किया जाए, तो साधक को अपार फल की प्राप्ति होती है।
टिप्पणियाँ