आन्ध्रवंशीय, शकवंशीय एवं यवनादि राजाओं का संक्षिप्त ऐतिहासिक विवरण
भविष्य पुराण के अनुसार कलियुग में अनेक राजवंशों का उत्थान और पतन हुआ, जिनमें आन्ध्रवंश, शकवंश, यवनवंश, गर्दभिल, आभीर तथा गुरुण्ड आदि प्रमुख थे। इस विस्तृत वर्णन के माध्यम से हमें न केवल इन राजाओं के कालखंड की जानकारी मिलती है, बल्कि यह भी ज्ञात होता है कि समय के साथ किस प्रकार से धर्म, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्थाओं में परिवर्तन आया।
आन्ध्रवंशीय राजाओं का राज्यकाल
भविष्य पुराण में सूतजी ऋषियों से कहते हैं कि शुङ्ग-भूतियों का अंत सुशर्मा नामक राजा से होता है, जिसे आन्ध्रवंशी राजा शिशुक पराजित करता है और इस प्रकार आन्ध्रवंश का शासन प्रारंभ होता है। नीचे आन्ध्रवंशी राजाओं का संक्षिप्त विवरण दिया गया है:
| क्रम | राजा का नाम | राज्यकाल (वर्षों में) |
|---|---|---|
| 1 | शिशुक | 23 |
| 2 | कृष्ण | 18 |
| 3 | श्रीशातकणि | 10 |
| 4 | पूर्णोत्संग | 18 |
| 5 | स्कन्धस्तम्भि | 18 |
| 6 | शान्तकणि | 56 |
| 7 | लम्बोदर | 18 |
| 8 | आपीतक | 12 |
| 9 | मेघस्वाति | 18 |
| 10 | स्वाति | 18 |
| 11 | स्कन्धस्वाति | 7 |
| 12 | मृगेन्द्र स्वातिकर्ण | 3 |
| 13 | कुन्तल स्वातिकर्ण | 8 |
| 14 | स्वातिवर्ण | 1 |
| 15 | रिक्तवर्ण | 25 |
| 16 | हाल | 5 |
| 17 | मन्तुलक | 5 |
| 18 | पुरीन्द्रसेन | – |
| 19 | शान्तिकर्ण | 1 |
| 20 | चकोरस्वातिकर्ण | 0.5 |
| 21 | शिवस्वाति | 28 |
| 22 | गौतमीपुत्र शातकर्णि | 21 |
| 23 | पुलोमा | 28 |
| 24 | शिवश्री पुलोमा | 7 |
| 25 | शिवस्कन्ध | 29 |
| 26 | यज्ञत्री शान्तिकर्णिक | 29 |
| 27 | विजय | 6 |
| 28 | चण्डत्री शान्तिकर्ण | 10 |
| 29 | दूसरा पुलोमा | 7 |
कुल आन्ध्रवंशी राजा: 29
कुल राज्यकाल: लगभग 408 वर्ष
अन्य राजवंशों का वर्णन
भविष्य पुराण के अनुसार आन्ध्रवंश के बाद विभिन्न जातियों और वंशों के राजा पृथ्वी पर राज्य करते हैं:
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आभीरवंशी राजा – 10 राजा, 67 वर्ष
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गर्दभिल राजा – 7 राजा
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शकवंशी राजा – 18 राजा
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यवन राजा – 8 राजा
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तुषार राजा – 14 राजा (7 सहस्र वर्षों तक)
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गुरुण्ड राजा – 13 राजा, 751 वर्ष
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हृणवंशी राजा – 19 राजा
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बबन राजा – 8 राजा, 87 वर्ष
इन वंशों के शासनकाल में धार्मिक पतन, पाखंड का प्रसार, और वर्णाश्रम धर्म का ह्रास हुआ। वैदिक जीवन शैली से लोग विमुख होने लगे और म्लेच्छ संस्कृतियों के साथ मिश्रित होकर धर्मच्युत हो गए।
कलियुग के अंत की स्थिति
भविष्य पुराण में वर्णन आता है कि कलियुग के अंत में:
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प्रजा शोक, व्याधि, भूख और भय से पीड़ित होगी।
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नदियों के तट और पर्वतों पर जीवन यापन करेगी।
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लोग असत्य, अधर्म, मिथ्या व्यवहार और लोभ के वशीभूत हो जाएंगे।
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वर्ण-व्यवस्था पूर्णतः नष्ट हो जाएगी।
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ब्राह्मण, शूद्रों के अधीन हो जाएंगे और धर्म का पूर्ण लोप हो जाएगा।
युग परिवर्तन और सप्तर्षियों की भूमिका
सप्तर्षिगण प्रत्येक युग में एक-एक सौ वर्षों तक नक्षत्रों में निवास करते हैं। वे समयानुसार धर्म की पुनः स्थापना में सहायक होते हैं। भविष्य पुराण के अनुसार जब कलियुग का अंत होगा और धर्म पूरी तरह नष्ट हो जाएगा, तब कृतयुग की पुनः प्रवृत्ति होगी।
निष्कर्ष
भविष्य पुराण में वर्णित यह विवरण न केवल ऐतिहासिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह इस बात का भी संकेत है कि समय, सत्ता और धर्म का गहरा संबंध है। राजाओं के शासन से न केवल राजनीतिक व्यवस्था प्रभावित होती है, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक स्थिति भी बदल जाती है।
यह वंशावली हमें यह भी सिखाती है कि जब धर्म और सत्य की अवहेलना होती है, तब पतन निश्चित होता है — चाहे वह व्यक्ति का हो या समाज का।
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