मत्स्य पुराण दो सौ सड़सठवाँ अध्याय
देव (प्रतिमा)-प्रतिष्ठाके अङ्गभूत अभिषेक-स्नानका निरूपण
सूत उवाच
अधातः सम्प्रवक्ष्यामि देवस्नपनमुत्तमम् ।
अधस्यापि समासेन शृणु त्वं विधिमुत्तमम् ॥ १
दध्यक्षतकुशाग्राणि क्षीरं दूर्वास्तथा मधु।
यवाः सिद्धार्थकास्तद्वदष्टाङ्गोऽर्थः फलैः सह ॥ २
सूतजी कहते हैं ऋषियो। अब मैं देयप्रतिमाके अभिषेक तथा अर्घ्यकी उत्तम विधि संक्षेपमें बतला रहा है, सुनिये। दधि, अक्षत, कुशका अग्रभाग, दुग्ध, दूर्वा, मधु, यव और सरसों-इन आठ वस्तुओं तथा फलोंके मिलानेसे अर्थ बनता है। २
गजाश्वरथ्यावल्मीकवराहोत्खातमण्डलात् ।
अग्यागारात् तथा तीर्थाद् व्रजाद् गोमण्डलादपि ॥ ३
कुम्भे तु मृत्तिकां दद्यादुद्धृतासीति मन्त्रवित् ।
शं नो देवीत्यपां मन्त्रमापो हिष्ठेति वै तथा ॥ ४
सावित्र्याऽऽदाय गोमूत्रं गन्धद्वारेति गोमयम्।
आप्यायस्वेति च क्षीरं दधिक्राव्णेति वै दधि ॥ ५
तेजोऽसीति घृतं तद्वद् देवस्य त्वेति चोदकम्।
कुशमिश्र क्षिपेद् विद्वान् पञ्चगव्यं भवेत् ततः ॥ ६
स्नाप्याथ पञ्चगव्येन दध्ना शुद्धेन वै ततः।
दधिक्राव्णेति मन्त्रेण कर्तव्यमभिमन्त्रणम् ॥ ७
आप्यायस्वेति पयसा तेजोऽसीति घृतेन च।
मधुवातेति मधुना ततः पुष्पोदकेन च ॥ ८
सरस्वत्यै भैषज्येन कार्यं तस्याभिमन्त्रणम्।
हिरण्याक्षेति मन्त्रेण स्नापयेद् रत्नवारिणा ॥ ९
कुशाम्भसा ततः स्नानं देवस्यत्वेति कारयेत्।
फलोदकेन च स्नानमग्न आयाहि कारयेत् ॥ १०
हाथोशाला, अश्वशाला, चौराहा, विमीट, शूकरद्वारा खोदे गये गड्ढे, अग्निकुण्ड, तीर्थस्थान एवं गोशालाकी मिट्टीको मन्त्रवेत्ता ब्राह्मण 'उद्धृतासि वराहेण' (१० आर०) आदि मन्त्रको उच्चारण करते हुए कलशमें डाले। तत्पश्चात् 'शं नो देवी०', (वाजस० सं० ३६।१०) 'आपो हि ष्ठा०' इन दो मन्त्रोंका उच्चारण कर जल छोड़े। तत्पश्चात् गायत्रीमन्यका उच्चारण करते हुए उस घड़ेमें गोमूत्र, फिर 'गन्धद्वारां०' (ऋकृपरि० श्रीसू० ८) इस मन्त्रसे गोबर, 'आध्यायस्व०' (वाजस० सं० १२।१४४) मन्त्रसे दुग्ध, 'दधिक्राव्णः ०' (वाजस० २३।३२) मन्त्रसे दही और 'तेजोऽसि०' (वाजस० २२।१) मन्त्रसे घृत, 'देवस्य त्वा सवितुः०' (वाजस० सं०१।१९) से जलको छोड़कर सबको मिश्रितकर कुशद्वारा चलावे तो यह पञ्चगव्य होता है। इस पञ्चगव्यद्वारा प्रतिमाको स्नान करानेके उपरान्त शुद्ध दहीद्वारा 'दधिक्राव्णः ०' (वाजस० सं०२३।३२) इस मन्त्रसे अभिषेक संस्कार करना चाहिये। फिर 'आप्यायस्व०' (वाजस० सं० १२।११४) इस मन्त्रका उच्चारण कर दुग्धसे, 'तेजोऽसि शुक्र०' (वाजस० सं०२२।१) इस मन्त्रद्वारा घृतसे, 'मधुवाता०' (वाजस० सं०) इस मन्त्रद्वारा मधुसे तथा पुष्पमिश्रित जलसे और 'सरस्वत्यै० (वानस० सं०) इस मन्त्रका उच्चारण करते हुए ओषधियोंसे प्रतिमाका संस्कार करना चाहिये। फिर 'हिरण्याक्ष०' इस मन्त्रसे रत्नमिश्रित जलसे, 'देवस्य त्वा० (वा०सं० ११०) इस मन्त्रका उच्चारण कर कुशोदकसे तथा 'अग्न आयाहि०' (साम० सं०९।१) इस मन्वका उच्वारण कर प्रतिमाको स्नान करावे ॥ ३-१०॥
ततस्तु गन्धतोयेन साविष्या चाभिमन्त्रयेत्।
ततो घटसहखेण सहस्त्रार्थेन वा पुनः ॥११
तस्याप्यर्थेन वा कुर्यात् सपादेन शतेन वा।
चतुःषष्ट्या ततोऽर्थेन तदर्धार्थेन वा पुनः ॥ १२
चतुभिरथवा कुर्याद् घटानामल्पवित्तवान्।
सौवर्ण राजतैर्वापि ताम्रैर्वा रीतिकोद्भवैः ॥ १३
कांस्यैर्वा पार्थिवैर्वापि स्नपनं शक्तितो भवेत्।
सहदेवी वचा व्याघ्री बला चातिबला तथा ॥ १४
शङ्खपुष्पी तथा सिंही हाष्टमी च सुवर्चला।
महौषध्यष्टकं होतन्महास्नानेषु योजयेत् ॥ १५
यवगोधूमनीवारतिलश्यामाकशालयः।
प्रियङ्गयो ब्रीहया स्नानेषु परिकल्पिताः ॥ १६
स्वस्तिकं पार्क शङ्खमुत्पलं कमलं तथा।
श्रीवत्सं दर्पणं तद्वन्नन्द्यावर्तमथाष्टकम् ।। १७
एतानि गोमयैः कुर्यान्मृदा च शुभया ततः।
पञ्चवर्णादिकं तद्वत् पञ्चवर्ण रजस्तथा ॥ १८
दूर्षाः कृष्णतिलान् दद्यान्नीराजनविधिर्मतः ।
एवं नीराजनं कृत्वा दद्यादाचमनं बुधः ॥ १९
मन्दाकिन्यास्तु यद्वारि सर्वपापापहं शुभम्।
ततो वस्त्रयुगं दद्यान्मन्त्रेणानेन यत्नतः ॥ २०
देवसूत्रसमायुक्ते यज्ञदानसमन्विते।
सर्ववर्णं शुभे देव वाससी ते विनिर्मिते ॥ २१
ततस्तु चन्दनं दद्यात् समं कर्पूरकुङ्कुमैः।
इममुच्चारयेन्मन्त्रं दीर्घपाणिः प्रयत्नतः ॥ २२
शरीरं ते न जानामि चेष्टां नैव च नैव च।
मया निवेदितान् गन्धान् प्रतिगृह्य विलिप्यताम् ॥ २३
इसके बाद गायत्री मन्त्रद्वारा सुगन्धित जलसे अभिमन्त्रित करे। फिर एक हजार या पाँच सी या उसके आधे वाई सी या एक सौ पचीस या एक सौ या चौंसठ या उसके आधे बत्तीस या उसके आधे सोलह या आठ या अल्प वित्तवाला पुरुष चार कलशोंसे स्नान-क्रिया सम्पन्न करे। ये कलश यथाशक्ति सुवर्ण, चाँदी, ताँबा, पौतल, कांसा या मिट्टीके बने होने चाहिये। सहदेई, मन, व्याघ्री, बाता, अतिबला, शङ्खपुष्पी, सिंही तथा आठवी सुवर्चला ये महौषधियाँ हैं, इनका महास्नानके समय प्रयोग करना चाहिये। जी, गेहूँ, तिन्नी, तिल, साँबा, धान, प्रियङ्गु तथा चावल-ये अन्न भी स्नानकार्य में उपयोगी कहे गये हैं। स्वस्तिक, पद्म, शङ्ख, उत्पल, कमल, श्रीवास, दर्पण और नन्द्यावर्त इन आत चित्रोंकी गोबर और शुद्ध मिट्टीसे कलापूर्ण रचना करें, फिर उन्हें पाँच प्रकारके रंग, पाँच प्रकारके चूर्ण, दूर्वा और काला तिलसे भर दे। तत्पश्चात् मीराजन आरतीकी विधिसे नीराजन कर बुद्धिमान् पुरुष 'गङ्गाका जल सभी पापोंका विनाशक और शुभदायक होता है' इस भाव मन्यसे आचमन कराये। तदनन्तर देव। आपके लिये बने हुए ये युगल बस्व देवनिर्मित सूद्वारा बने हुए, यह तथा दानसे समन्वित, विविध वर्षोंवाले एवं परम रमणीय हैं, इन्हें आप ग्रहण करें,' इस भावके मन्त्रका उच्चारण करते हुए बलपूर्वक दो यस्व समर्पित करे। इसके बाद हाथमें कुश लेकर प्रयत्न पूर्वक निम्नलिखित मन्त्रका उच्चारण करते हुए कपूर और केसरमिश्रित चन्दन लगाना चाहिये। मन्त्र इस प्रकार है-'देव। मैं आपके शरीर और चेहको किसी प्रकार भी नहीं जानता, अतः मेरे द्वारा समर्पित किये गये गन्धोंको ग्रहणकर आप स्वयं ही अनुलेपन कर लें ॥ ११-२३॥
चत्वारिंशत् ततो दीपान् दद्याच्चैव प्रदक्षिणान्।
त्वं सूर्यचन्द्रज्योतींषि विद्युदग्निस्तथैव च ॥ २४
त्वमेव सर्वज्योतींषि दीपोऽयं प्रतिगृह्यताम्।
ततस्त्वनेन मन्त्रेण धूपं दद्याद् विचक्षणः ॥ २५
वनस्पतिरसो दिव्यो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः ।
मया निवेदितो भक्त्या धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ २६
ततस्त्वाभरणं दद्यान्महाभूषाय ते नमः।
अनेन विधिना कृत्वा सप्तरात्रं महोत्सवम् ॥ २७
देवकुम्भैस्ततः कुर्याद् यजमानोऽभिषेचनम्।
चतुर्भिरष्टभिर्वापि द्वाभ्यामेकेन वा पुनः ॥ २८
सपञ्चरत्नकलशैः सितवस्त्राभिवेष्टितैः ।
देवस्य त्वेति मन्त्रेण साम्ना चाधर्वणेन च ॥ २९
अभिषेके च ये मन्त्रा नवग्रहमखे स्मृताः ।
सिताम्बरधरः स्नात्वा देवान् सम्पूज्य यत्नतः ॥ ३०
स्थापकं पूजयेद् भक्त्या वस्वालङ्कारभूषणैः ।
यज्ञभाण्डानि सर्वाणि मण्डपोपस्करादिकम् ॥ ३१
यच्चान्यदपि तद्गेहे तदाचार्याय दापयेत्।
सुप्रसन्ने गुरौ यस्मात् तृप्यन्ति सर्वदेवताः ॥ ३२
नैतद्विशीलेन दाम्भिकेन न लिङ्गिना स्थापनमत्र कार्यम्।
विप्रेण कार्य श्रुतिपारगेण गृहस्थधर्माभिरतेन नित्यम् ॥ ३३
पाषण्डिनं यस्तु करोति भक्त्या विहाय विप्राञ्श्रुतिधर्मयुक्तान्।
गुरुं प्रतिष्ठादिषु तत्र नूनं कुलक्षयः स्यादचिरादपूज्यः ॥ ३४
स्थानं पिशाचैः परिगृह्यते वा अपूज्यतां यात्यचिरेण लोकैः।
विप्रैः कृतं यच्छुभदं कुले स्यात् प्रपूज्यतां याति चिरं च कालम् ॥ ३५
इसके बाद चालीस दीप प्रदान करना चाहिये और प्रदक्षिणा भी करनी चाहिये। उस समय निम्नाङ्कित मन्त्रका उच्चारण करे 'देव। आप ही सूर्य और चन्द्रमाको ज्योति, बिजली, अग्नि और सभी प्रकारको ज्योति हैं. आप इस दीपको ग्रहण करें।' फिर 'देव। यह वनस्पतियोंका अति उत्तम रस, दिव्य गन्धयुक्त और उत्तम गन्ध है, मैंने इसे भक्तिपूर्वक अर्पित किया है आप इस धूपको ग्रहण करें।' इस मन्त्रका उच्वारणकर विचक्षण पुरुष धूपदान करे। तत्पश्चात् 'बहुमूल्य आभूषणोंसे विभूषित देव। आपको नमस्कार है।' इस भावके मन्त्रद्वारा आभूषण अर्पित करना चाहिये। इस प्रकार सात राहतक महोत्सव कर बेत वरवधारी यजमान पञ्चरत्न युक्त तथा श्वेत वस्त्रसे परिवेष्टित चार, आठ, दो अथवा एक देवकुम्भके जलसे देवस्य त्वा० (वाजस० सं० १११०) इस मन्त्रसे या आथर्वण तथा साममन्त्रोंसे या नवग्रहयज्ञों में अभिषेक के समय प्रयुक्त होने वाले मन्त्रोंसे अभिषेक करे।
फिर स्नानकर देवताओंकी पूजा करने के बाद स्थापना कराने वाले की वस्त्र, अलंकार एवं आभूषणोंद्वारा पूजा करे। तत्पश्चात् सभी यज्ञपात्रओं, मण्डपकी सामग्रियों तथा मण्डपमें अन्य जो कुछ भी दातव्य वस्तुएँ हों, उन्हें आचार्यको देना चाहिये, क्योंकि गुरुके प्रसन्न होने पर सभी देवगण प्रसन्न हो जाते हैं। इस देवप्रतिमाके स्थापन-कार्यको शीलरहित, दम्भी और पाखंडीसे नहीं कराना चाहिये, प्रत्युत सदा श्रुतियों के पारगामी एवं गृह स्थाश्रम में रहने वाले ब्राह्मणद्वारा ही कराना उचित है। जो व्यक्ति केवल भक्तिके कारण वैदिक धर्मोंमें परायण विद्वान् पण्डितोंको छोड़कर अपने पाखण्डी गुरुको इस कार्य में नियुक्त करता है, उसका कुल शीघ्र ही अपूज्य और नष्ट हो जाता है, उस स्थानपर पिशाचोंका आधिपत्य हो जाता है तथा लोग प्रतिमाको थोड़े ही दिनों बाद अपूज्य समझने लगते हैं। वैदिक ब्राह्मणोंद्वारा करायी गयी स्थापनासे देव-प्रतिमा कुलमें कल्याणकारिणी होती है और चिरकालतक लोग उसकी पूजा करते हैं॥ २४-३५॥
इति श्रीमात्ये महापुराणे देवतास्नानं नाम सप्तषष्ट्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २६७॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें देवप्रतिमा स्नान नामक दो सौ सड़सठवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ २६७॥
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