वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवों का त्रिपुर सहित समुद्र में प्रवेश तथा शंकर जी का इन्द्र को युद्ध करने का आदेश | vaapee-shoshanase mayako chinta, may aadi daanavon ka tripur sahit samudr mein pravesh tatha shankar jee ka indr ko yuddh karane ka aadesh

मत्स्य पुराण एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय

वापी-शोषणसे मयको चिन्ता, मय आदि दानवोंका त्रिपुर सहित समुद्र में प्रवेश तथा शंकरजी का इन्द्रको युद्ध करनेका आदेश

सूत उवाच

प्रमथैः समरे भिन्नास्वैपुरास्ते सुरारयः । 
पुरं प्रविविशुर्भीताः प्रमथैर्भग्रगोपुरम् ॥ १ 

सूतजी कहते हैं- ऋषियो! इस प्रकार समरभूमिमें प्रमथगणोंद्वारा घायल किये गये त्रिपुरवासी देवशत्रु दानव भयभीत होकर त्रिपुरमें लौट गये। उस समय प्रमथोंने त्रिपुरके फाटकको भी नष्ट-भ्रष्ट कर दिया था। १

शीर्णदंष्ट्रा यथा नागा भग्ग्रशृङ्गा यथा वृषाः । 
यथा विपक्षाः शकुना नद्यः क्षीणोदका यथा ॥ २

मृतप्रायास्तथा दैत्या दैवतैर्विकृताननाः ।
बभूवुस्ते विमनसः कथं कार्यमिति ब्रुवन् ॥ ३ 

अथ तान् म्लानमनसस्तदा तामरसाननः ।
उवाच दैत्यो दैत्यानां परमाधिपतिर्मयः ॥ ४

कृत्वा युद्धानि घोराणि प्रमथैः सह सामरैः।
तोषयित्वा तथा युद्धे प्रमथानमरैः सह ॥ ५

यूयं यत् प्रथमं दैत्याः पश्चाच्च बलपीडिताः । 
प्रविष्टा नगरं त्रासात् प्रमथैर्भृशमर्दिताः ।। ६

अप्रियं क्रियते व्यक्तं देवैर्नास्त्यत्र संशयः । 
यत्र नाम महाभागाः प्रविशन्ति गिरेर्वनम् ॥ ७

अहो हि कालस्य बलमहो कालो हि दुर्जयः । 
यत्रेदृशस्य दुर्गस्य उपरोधोऽयमागतः ॥ ८

मये विवदमाने तु नर्दमान इवाम्बुदे । 
बभूवुर्निष्प्रभा दैत्या ग्रहा इन्दूदये यथा ॥ ९

जैसे नष्ट हुए दाँतोंवाले सर्प, टूटे हुए सींगोंवाले साँड़, डैनेरहित पक्षी और क्षीण जलवाली नदियाँ शोभाहीन हो जाती हैं, उसी प्रकार देवताओंके प्रहारसे दैत्यवृन्द मृतप्राय हो गये थे। उनके मुख विकृत हो गये थे और वे खिन्न मनसे कह रहे थे कि अब क्या किया जाय ? तब कमल-सदृश मुखवाले दैत्योंके चक्रवर्ती सम्राट् मय दैत्यने उन मलिन मनवाले दैत्योंसे कहा-'दैत्यो ! इसमें सन्देह नहीं है कि तुमलोगोंने पहले युद्धभूमिमें देवताओंसहित प्रमथगणोंके साथ भयंकर युद्ध करके उन्हें संतुष्ट किया है, किंतु पीछे तुमलोग देवसेनासे पीड़ित और प्रमथोंके प्रहारसे अत्यन्त घायल होकर भयवश नगरमें भाग आये हो। निस्संदेह देवगण प्रकटरूपमें हमलोगोंका अप्रिय कर रहे हैं, इसी कारण ये महान् भाग्यशाली दैत्य इस समय भागकर पर्वतीय वनोंमें छिप रहे हैं। अहो! कालका बल महान् है। अहो! यह काल किसी प्रकार जीता नहीं जा सकता। कालके ही प्रभावसे त्रिपुर-जैसे दुर्गपर यह अवरोध उत्पन्न हो गया है।' मेघकी भाँति कड़कते हुए मयके इस प्रकार विषाद करनेपर सभी दैत्य उसी प्रकार निस्तेज हो गये, जैसे चन्द्रमाके उदय होनेपर अन्य ग्रह मलिन हो जाते हैं॥ २-९॥ 

वापीपालास्ततोऽभ्येत्य नभः काल इवाम्बुदाः । 
मयमाहुर्यमप्रख्यं साञ्जलिप्रग्रहाः स्थिताः ॥ १०

या सामृतरसा गूढा वापी वै निर्मिता त्वया।
समाकुलोत्पलवना समीनाकुलपङ्कजा ॥ ११

पीता सा वृषरूपेण केनचिद् दैत्यनायक।
वापी सा साम्प्रतं दृष्ट्वा मृतसंज्ञा इवाङ्गना ॥ १२

वापीपालवचः श्रुत्वा मयोऽसौ दानवप्रभुः । 
कष्टमित्यसकृत् प्रोच्य दितिजानिदमब्रवीत् ॥ १३

मया मायाबलकृता वापी पीता त्वियं यदि। 
विनष्टाः स्म न संदेहस्त्रिपुरं दानवा गतम् ॥ १४

निहतान् निहतान् दैत्यानाजीवयति दैवतैः । 
पीता वा यदि वा वापी पीता वै पीतवाससा ॥ १५

कोऽन्यो मन्मायया गुप्तां वापीममृततोयिनीम् । 
पास्यते विष्णुमजितं वर्जयित्वा गदाधरम् ॥ १६

सुगुह्यमपि दैत्यानां नास्त्यस्याविदितं भुवि। 
यत्र मद्वरकौशल्यं विज्ञानं न वृतं बुधैः ॥ १७

समोऽयं रुचिरो देशो निहुँमो निहुँमाचलः । 
नवाम्भः पूरितं कृत्वा बाधन्तेऽस्मान् मरुद्रणाः ॥ १८

ते यूयं यदि मन्यध्वं सागरोपरि धिष्ठिताः । 
प्रमथानां महावेगं सहामः श्वसनोपमम् ॥ १९

एतेषां च समारम्भास्तस्मिन् सागरसम्प्लवे । 
निरुत्साहा भविष्यन्ति एतद्रथपथावृताः ॥ २० 

युध्यतां निघ्नतां शत्रून् भीतानां च द्रविष्यताम् । 
सागरोऽम्बरसङ्काशः शरणं नो भविष्यति ॥ २१

इत्युक्त्वा स मयो दैत्यो दैत्यानामधिपस्तदा। 
त्रिपुरेण ययौ तूर्णं सागरं सिन्धुबान्धवम् ॥ २२

सागरे जलगम्भीर उत्पपात पुरं वरम् । 
अवतस्थुः पुराण्येव गोपुराभरणानि च ॥ २३ 

इसी समय वर्षाकालीन मेघकी तरह शरीरधारी बावलीके रक्षक दैत्य यमराज सदृश भयंकर मयके निकट आकर हाथ जोड़कर (अभिवादन करके) खड़े हो गये और इस प्रकार बोले- 'दैत्यनायक । आपने अमृतरूपी जलसे भरी हुई जिस गुप्त बावलीका निर्माण किया था, जो नील कमल वनसे व्याप्त थी तथा जिसमें मछलियाँ और विभिन्न प्रकारके भी कमल भरे हुए थे, उसे वृषभरूपधारी किसी देवताने पी लिया। इस समय वह बावली मूच्छित हुई सुन्दरी स्त्रीकी भाँति दीख रही है।' बावलीके रक्षकोंकी बात सुनकर दानवराज मय 'कष्ट है' ऐसा कई बार कहकर दैत्योंसे इस प्रकार बोला' दानवो! मेरे द्वारा मायाके बलसे रची हुई बावलीको यदि किसीने पी लिया तो निश्चय समझो कि हमलोग नष्ट हो गये और त्रिपुरको भी गया हुआ ही समझो। हाय! जो देवताओंद्वारा बार-बार मारे गये दैत्योंको जीवन दान देती थी, वह बावली पी ली गयी ! यदि वह सचमुच पी ली गयी तो (निश्चय ही) उसे पीताम्बरधारी विष्णुने ही पीया होगा। भला, गदाधारी अजेय विष्णुको छोड़कर दूसरा कौन ऐसा समर्थ है, 

जो मेरी मायाद्वारा गुप्त एवं अमृतरूपी जलसे भरी हुई बावलीको पी सकेगा ? भूतलपर दैत्योंकी गुप्त-से-गुप्त बात विष्णुसे अज्ञात नहीं है। मेरी वरप्राप्तिकी कुशलता, जिसे विद्वान् लोग नहीं जान सके, विष्णुसे छिपी नहीं है। हमारा यह देश सुन्दर और समतल है। यह वृक्ष और पर्वतसे रहित है। फिर भी मरुद्गण इसे नूतन जलसे परिपूर्ण करके हमलोगोंको बाधा पहुँचा रहे हैं। इसलिये यदि तुमलोगोंको स्वीकार हो तो हमलोग सागरके ऊपर स्थित हो जायँ और वहींसे प्रमथोंके वायुके समान महान् वेगको सहन करें। सागरकी उस बाढ़में इनका सारा उद्योग उत्साहहीन हो जायगा और उस विशाल रथका मार्ग रुक जायगा। इसलिये युद्ध करते समय, शत्रुओंको मारते समय और भयभीत होकर भागते समय हमलोगोंके लिये यह सागर आकाशकी भाँति शरणदाता हो जायगा।' ऐसा कहकर दैत्यराज मयदानव तुरंत त्रिपुरसहित नदियोंके बन्धुस्वरूप सागरकी ओर प्रस्थित हुआ। फिर तो वह श्रेष्ठ त्रिपुर नामक नगर अगाध जलवाले सागरके ऊपर मँडराने लगा। उसके फाटक और आभूषणादि-सहित तीनों पुर यथास्थान स्थित हो गये ॥ १०-२३॥ 

अपक्रान्ते तु त्रिपुरे त्रिपुरारिस्त्रिलोचनः । 
पितामहमुवाचेदं वेदवादविशारदम् ॥ २४

पितामह दृढं भीता भगवन् दानवा हि नः। 
विपुलं सागरं ते तु दानवाः समुपाश्रिताः ॥ २५

यत एव हि ते यातास्त्रिपुरेण तु दानवाः । 
तत एव रथं तूर्णं प्रापयस्व पितामह ॥ २६

सिंहनादं ततः कृत्वा देवा देवरथं च तम्। 
परिवार्य ययुर्हृष्टाः सायुधाः पश्चिमोदधिम् ॥ २७

ततोऽमरामरगुरुं परिवार्य भवं हरम्। 
नर्दयन्तो ययुस्तूर्ण सागरं दानवालयम् ॥ २८

अथ चारुपताकभूषितं पटहाडम्बरशङ्खनादितम् ।
त्रिपुरमभिसमीक्ष्य देवता विविधबला ननदुर्यथा घनाः ॥ २९

असुरवरपुरेऽपि दारुणो जलधररावमृदङ्गगह्वरः । 
दनुतनयनिनादमिश्रितः प्रतिनिधिः संक्षुभितार्णवोपमः ॥ ३०

अध भुवनपतिर्गतिः सुराणा-मरिमृगयामददात् सुलब्धबुद्धिः ।
त्रिदशगणपतिं ह्युवाच शक्रं त्रिपुरगतं सहसा निरीक्ष्य शत्रुम् ॥ ३१

निशामयैतत् त्रिदशगणपते त्रिपुरनिकेतनं दानवाः प्रविष्टाः । 
यमवरुणकुबेरषण्मुखैस्तत् सह गणपैरपि हन्मि तावदेव ॥ ३२

विहितपरबलाभिघातभूतं व्रज जलधेस्तु यतः पुराणि तस्थुः ।
स रथवरगतो भवः समर्थो ह्युदधिमगात् त्रिपुरं पुनर्निहन्तुम् ॥ ३३

इति परिगणयन्तो दितेः सुता ह्यवतस्थुर्लवणार्णवोपरिष्टात् ।
अभिभवत् त्रिपुरं सदानवेन्द्रं शरवर्षेर्मुसलैश्च वज्रमिश्रः ॥ ३४

अहमपि रथवर्यमास्थितः सुरवरवर्य भवेय पृष्ठतः ।
असुरवरवधार्थमुद्यतानां प्रतिविदधामि सुखाय तेऽनघ ॥ ३५

इति भववचनप्रचोदितो दशशतनयनवपुः समुद्यतः ।
त्रिपुरपुरजिघांसया हरिःप्रविकसिताम्बुजलोचनो ययौ ॥ ३६ 

इस प्रकार त्रिपुरके दूर हट जानेपर त्रिपुरारि भगवान् शंकरने वेदवादमें निपुण ब्रह्मासे इस प्रकार कहा-'ऐश्वर्यशाली पितामह! दानवगण हमलोगोंसे भलीभाँति डर गये हैं, इसलिये वे भागकर विशाल सागरकी शरणमें चले गये। पितामह। त्रिपुरसहित वे दानव जिस मार्गसे गये हैं, उसी मार्गसे आप शीघ्र ही मेरे रथको वहाँ पहुँचाइये।' तब आयुधधारी देवगण हर्षपूर्वक सिंहनाद करके और उस देवरथको चारों ओरसे घेरकर पश्चिम सागरकी ओर चल पड़े। तत्पश्चात् देवगण देवश्रेष्ठ भगवान् शंकरको चारों ओरसे घेरकर सिंहनाद करते हुए शीघ्र ही दानवोंके निवासस्थान सागरकी ओर प्रस्थित हुए। वहाँ पहुँचनेपर सुन्दर पताकाओंसे विभूषित तथा ढोल, नगारे और शङ्खके शब्दोंसे निनादित त्रिपुरको देखकर अनेकों सेनाओंसे सम्पन्न देवगण बादलोंकी तरह गर्जना करने लगे। उधर असुरश्रेष्ठ मयके पुरमें भी दानवोंके सिंहनादके साथ-साथ मेघ गर्जनाके सदृश मृदंगोंका भयंकर एवं गम्भीर शब्द हो रहा था, जो क्षुब्ध हुए महासागरकी गर्जनाके समान प्रतीत हो रहा था। 

तदनन्तर देवताओंके आश्रयस्थान प्रत्युत्पन्नमति त्रिभुवनपति शंकर शत्रुओंका शिकार करनेके लिये उद्यत हो गये। तब उन्होंने सहसा शत्रुओंको त्रिपुरमें प्रवेश करते देखकर देवताओं और गणोंके सेनानायक इन्द्रसे इस प्रकार कहा- 'देवताओं और गणेश्वरोंके नायक इन्द्र ! आपलोग मेरी यह बात सुनें। दानवलोग अपने निवासस्थान त्रिपुरमें घुस गये हैं, अतः आप यम, वरुण, कुबेर, कार्तिकेय तथा गणेश्वरोंको साथ लेकर इनका संहार करें। तबतक मैं भी इन्हें मार रहा हूँ। आप शत्रुसेनापर प्रहार करते हुए समुद्रके उस स्थानतक बढ़ते चलें, जहाँ तीनों पुर स्थित हैं। यह देखकर जब उन दैत्योंको यह विदित हो जायगा कि सामर्थ्यशाली शंकर उस श्रेष्ठ रथपर आरूढ़ हो पुनः त्रिपुरका विनाश करनेके लिये समुद्रतटपर आ गये हैं, तब वे लवणसागरके ऊपर निकल आयेंगे। तब आप वज्रसहित मुसलों एवं बाणोंकी वर्षा करते हुए दानवेन्द्रोंसहित त्रिपुरपर आक्रमण कर दें। सुरश्रेष्ठ। उस समय मैं भी इस श्रेष्ठ रथपर बैठा हुआ असुरेन्द्रोंका वध करनेके लिये उद्यत आपलोगोंके पीछे रहूँगा। अनघ। मैं सर्वथा आपलोगोंके सुखका विधान करता रहूँगा।' इस प्रकार शंकरजीके वचनोंसे प्रेरित होकर एक हजार नेत्रोंवाले इन्द्र, जिनके नेत्र प्रफुल्ल कमलके सदृश सुन्दर थे, त्रिपुरके विनाशकी इच्छासे उद्यत होकर आगे बढ़े ॥ २४-३६॥

इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुराक्रमणं नाम सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें त्रिपुराक्रमण नामक एक सौ सैंतीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १३७ ॥ 

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