मत्स्य पुराण एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय
मयका चिन्तित होकर अद्भुत बावलीका निर्माण करना, नन्दिकेश्वर और तारकासुरका भीषण युद्ध तथा प्रमथगणों की मारसे विमुख होकर दानवोंका त्रिपुर-प्रवेश
सूत उवाच
मयः प्रहारं कृत्वा तु मायावी दानवर्षभः ।
विवेश तूर्णं त्रिपुरमभ्रं नीलमिवाम्बरम् ॥ १
सूतजी कहते हैं- ऋषियो। दानवश्रेष्ठ मायावी मय स्वामिकार्तिकपर प्रहारकर त्रिपुरमें उसी प्रकार तुरंत प्रवेश कर गया, जैसे नीले आकाशमें बादल प्रविष्ट हो जाते हैं।१
स दीर्घमुष्णं निःश्वस्य दानवान् वीक्ष्य मध्यगान्।
दध्यौ लोकक्षये प्राप्ते कालं काल इवापरः ॥ २
इन्द्रोऽपि बिभ्यते यस्य स्थितो युद्धेप्सुरग्रतः ।
स चापि निधनं प्राप्तो विद्युन्माली महायशाः ॥ ३
दुर्ग वै त्रिपुरस्यास्य न समं विद्यते पुरम्।
तस्याप्येषोऽनयः प्राप्तो नादुर्गं कारणं क्वचित् ॥ ४
कालस्यैव वशे सर्वं दुर्गं दुर्गतरं च यत्।
काले कुद्धे कथं कालात्त्राणं नोऽद्य भविष्यति ॥ ५
लोकेषु त्रिषु यत्किञ्चिद् बलं वै सर्वजन्तुषु।
कालस्य तद्वशं सर्वमिति पैतामहो विधिः ॥ ६
अस्मिन् कः प्रभवेद् यो वै ह्यसंधार्येऽमितात्मनि ।
लङ्घने कः समर्थः स्यादृते देवं महेश्वरम् ॥ ७
बिभेमि नेन्द्राद्धि यमाद् वरुणान्न च वित्तपात् ।
स्वामी चैषां तु देवानां दुर्जयः स महेश्वरः ॥ ८
ऐश्वर्यस्य फलं यत्तत्प्रभुत्वस्य च समंततः ।
तदद्य दर्शयिष्यामि यावद्वीराः समंततः ॥ ९
वापीममृततोयेन पूर्णा स्त्रक्ष्ये वरौषधीः ।
जीविष्यन्ति तदा दैत्याः संजीवनवरौषधैः ॥ १०
वहाँ आकर उसने लम्बी और गरम साँस ली तथा त्रिपुरमें भागकर आये हुए दानवोंकी ओर देखकर लोकके विनाशके अवसरपर दूसरे कालके समान मय कालके विषयमें विचार करने लगा- 'अहो ! रणभूमिमें युद्धकी अभिलाषासे सम्मुख खड़ा हो जानेपर जिससे इन्द्र भी डरते थे वह महायशस्वी विद्युन्माली भी कालका ग्रास बन गया। त्रिलोकीमें इस त्रिपुरकी समतामें अन्य कोई दुर्ग अथवा पुर नहीं है, फिर भी इसपर भी ऐसी आपत्ति आ ही गयी, अतः (प्राणरक्षाके लिये) दुर्ग कोई कारण नहीं है। (इसलिये मैं तो ऐसा समझता हूँ कि) दुर्ग ही क्यों? दुर्गसे भी बढ़कर सभी वस्तुएँ कालके ही वशमें हैं।
तब भला कालके कुपित हो जानेपर इस समय हमलोगोंकी कालसे रक्षा कैसे हो सकेगी ? तीनों लोकों तथा समस्त प्राणियोंमें जो कुछ बल है, वह सारा-का-सारा कालके वशीभूत है-ऐसा ब्रह्माका विधान है। ऐसे अमित पराक्रमी एवं असाध्य कालके प्रति कौन-सा उद्योग सफल हो सकता है? भगवान् शंकरके अतिरिक्त उस कालपर विजय पानेमें कौन समर्थ हो सकता है? मैं इन्द्र, यम और वरुणसे नहीं डरता, कुबेरसे भी मुझे कोई भय नहीं है, किंतु इन देवताओंके स्वामी जो महेश्वर हैं, उनपर विजय पाना दुष्कर है। फिर भी जबतक ये दानववीर चारों ओर बिखरे हुए हैं, तबतक ऐश्वर्य-प्राप्तिका जो फल होता है तथा स्वामी बननेका जो फल होता है, उसे मैं प्रदर्शित करूँगा। मैं एक ऐसी बावलीका निर्माण करूँगा, जिसमें अमृतरूपी जल भरा होगा। साथ ही कुछ श्रेष्ठ ओषधियोंका भी आविष्कार करूँगा। उन श्रेष्ठ संजीविनी ओषधियोंके प्रयोगसे मरे हुए दैत्य जीवित हो जायेंगे ' ॥२-१०॥
इति संचिन्त्य बलवान् मयो मायाविनां वरः ।
मायया ससृजे वापीं रम्भामिव पितामहः ॥ ११
द्वियोजनायतां दीर्घा पूर्णयोजनविस्तृताम् ।
आरोहसंक्रमवतीं चित्ररूपां कथामिव ॥ १२
इन्दोः किरणकल्पेन मृष्टेनामृतगन्धिना ।
पूर्णा परमतोयेन गुणपूर्णामिवाङ्गनाम् ॥ १३
उत्पलैः कुमुदैः पद्यैर्वृतां कादम्बकैस्तथा।
चन्द्रभास्करवर्णाभैर्भीमैरावरणैर्वृताम् ॥ १४
खगैर्मधुररावैश्च चारुचामीकरप्रभैः ।
कामैषिभिरिवाकीर्णा जीवनाभरणीमिव ॥ १५
संसृज्य स मयो वापीं गङ्गामिव महेश्वरः ।
तस्यां प्रक्षालयामास विद्युन्मालिनमादितः ॥ १६
स वाप्यां मज्जितो दैत्यो देवशत्रुर्महाबलः ।
उत्तस्थाविन्धनैरिद्धः सद्यो हुत इवानलः ॥ १७
मयस्य चाञ्जलिं कृत्वा तारकाख्योऽभिवादितः ।
विद्युन्मालीति वचनं मयमुत्थाय चाब्रवीत् ॥ १८
क्व नन्दी सह रुद्रेण वृतः प्रमथजम्बुकैः ।
युध्यामोऽरीन् विनिष्पीड्य दयादेहेषु का हि नः ।। १९
अन्वास्यैव च रुद्रस्य भवामः प्रभविष्णवः ।
तैर्वा विनिहता युद्धे भविष्यामो यमाशनाः ॥ २०
विद्युन्मालेर्निशम्यैतन्मयो वचनमूर्जितम् ।
तं परिष्वज्य सार्द्राक्ष इदमाह महासुरः ॥ २१
विद्युन्मालिन् न मे राज्यमभिप्रेतं न जीवितम् ।
त्वया विना महाबाहो किमन्येन महासुर ॥ २२
महामृतमयी वापी होषा मायाभिरीश्वर।
सृष्टा दानवदैत्यानां हतानां जीववर्धिनी ॥ २३
दिष्ट्या त्वां दैत्य पश्यामि यमलोकादिहागतम् ।
दुर्गतावनयग्रस्तं भोक्ष्यामोऽद्य महानिधिम् ॥ २४
ऐसा विचारकर मायावियोंमें श्रेष्ठ बलवान् मयने एक (सुन्दर) बावलीकी रचना की, जैसे ब्रह्माजीने मायासे रम्भा अप्सराकी रचना कर डाली थी। वह (बावली) दो योजन लम्बी और एक योजन चौड़ी थी। उसमें चित्र-विचित्र प्रसङ्गोंवाली कथाकी भाँति क्रमशः चढ़ाव-उतारवाली सीढ़ियाँ बनी थीं। वह चन्द्रमाकी किरणोंके समान उज्ज्वल, अमृत-सदृश मधुर एवं सुगन्धित उत्तम जलसे भरी हुई ऐसी लग रही थी, मानो सम्पूर्ण सद्गुणोंसे पूर्ण कोई वनिता हो। उसमें नील कमल, कुमुदिनी और अनेकों प्रकारके कमल खिले हुए थे। वह चन्द्रमा और सूर्यके समान चमकीले रंगवाले भयंकर डैनोंसे युक्त कलहंसोंसे व्याप्त थी। उसमें सुन्दर सुनहली कान्तिवाले पक्षी मधुर शब्दोंमें कूज रहे थे। वह जलाभिलाषी जीवोंसे व्याप्त उन्हें प्राणदान करनेवालीकी तरह दीख रही थी। जैसे महेश्वरने (अपनी जटासे) गङ्गाको उत्पन्न किया था, उसी प्रकार मयने उस बावलीकी रचना कर उसके जलसे सर्वप्रथम विद्युन्मालीके शवको धोया। उस बावलीमें डुबोये जानेपर देवशत्रु महाबली दैत्य विद्युन्माली उसी प्रकार उठ खड़ा हुआ, जैसे इन्धन पड़नेसे हवन की गयी अग्नि तुरंत उद्दीप्त हो उठती है।
उठते ही विद्युन्मालीने हाथ जोड़कर मय और तारकासुरका अभिवादन किया और मयसे इस प्रकार कहा- 'प्रमथरूपी शृगालोंसे घिरा हुआ रुद्रके साथ नन्दी कहाँ खड़ा है? अब हमलोग शत्रुओंको पीसते हुए युद्ध करेंगे। हमलोगोंके शरीर में दया कहाँ? हमलोग या तो रुद्रको खदेड़कर प्रभावशाली होंगे अथवा उनके द्वारा युद्धस्थलमें मारे जाकर यमराजके ग्रास बन जायेंगे।' विद्युन्मालीके ऐसे उत्साहपूर्ण वचन सुनकर महासुर मयके नेत्रोंमें आँसू छलक आये। तब उसने विद्युन्मालीका आलिङ्गन कर इस प्रकार कहा-'महाबाहु विद्युन्माली ! तुम्हारे बिना न तो मुझे राज्य अभीष्ट है, न जीवनकी ही अभिलाषा है। महासुर । अन्य पदार्थोंकी तो बात ही क्या है? ऐश्वर्यशाली वीर! मैंने मायाद्वारा अमृतसे भरी हुई इस बावलीकी रचना की है। यह मरे हुए दानवों और दैत्योंको जीवन-दान देगी। दैत्य ! सौभाग्यवश (इसीके प्रभावसे) मैं तुम्हें यमलोकसे लौटा हुआ देख रहा हूँ। अब हमलोग आपत्तिके समय अन्यायसे अपहरण की हुई महानिधिका उपभोग करेंगे ' ॥११- २४॥
दृष्ट्वा दृष्ट्वा च तां वापीं मायया मयनिर्मिताम् ।
हृष्टाननाक्षा दैत्येन्द्रा इदं वचनमब्रुवन् ॥ २५
दानवा युध्यतेदानीं प्रमथैः सह निर्भयाः।
मयेन निर्मिता वापी हतान् संजीवयिष्यति ।। २६
ततः क्षुब्धाम्बुधिनिभा भेरी सा तु भयंकरी।
वाद्यमाना ननादोच्चै रौरवी सा पुनः पुनः ॥ २७
श्रुत्वा भेरीरवं घोरं मेघारम्भितसंनिभम्।
न्यपतन्नसुरास्तूर्ण त्रिपुराद् युद्धलालसाः ॥ २८
लोहराजतसौवर्णैः कटकैर्मणिराजितैः ।
आमुक्तैः कुण्डलैहरैिर्मुकुटैरपि चोत्कटैः ॥ २९
धूमायिता ह्यविरमा ज्वलन्त इव पावकाः ।
आयुधानि समादाय काशिनो दृढविक्रमाः ॥ ३०
नृत्यमाना इव नटा गर्जन्त इव तोयदाः।
करोच्छ्या इव गजाः सिंहा इव च निर्भयाः ॥ ३१
हृदा इव च गम्भीराः सूर्या इव प्रतापिताः ।
हुमा इव च दैत्येन्द्रास्त्रासयन्तो बलं महत् ॥ ३२
प्रमथा अपि सोत्साहा गरुडोत्पातपातिनः ।
युयुत्सवोऽभिधावन्ति दानवान् दानवारयः ॥ ३३
नन्दीश्वरेण प्रमथास्तारकाख्येन दानवाः ।
चकुः संहृत्य संग्रामं चोद्यमाना बलेन च ॥ ३४
तेऽसिभिश्चन्द्रसंकाशैः शूलैश्चानलपिङ्गलैः ।
बाणैश्च दृढनिर्मुक्तैरभिजघ्नुः परस्परम् ॥ ३५
शराणां सृज्यमानानामसीनां च निपात्यताम्।
रूपाण्यासन् महोल्कानां पतन्तीनामिवाम्बरात् ॥ ३६
मायाके प्रभावसे मयद्वारा निर्मित उस बावलीको देख-देखकर दैत्येन्द्रोंके नेत्र और मुख हर्षके कारण उत्फुल्ल हो उठे थे। तब वे (दानवोंको ललकारते हुए) इस प्रकार बोले-'दानवो! अब तुमलोग निर्भय होकर प्रमथगणोंके साथ युद्ध करो। मयद्वारा निर्मित यह बावली मरे हुए तुमलोगोंको जीवित कर देगी।' फिर तो क्षुब्ध हुए सागरके समान भय उत्पन्न करनेवाली दानवोंकी भेरी बज उठी। वह बड़े जोरसे भयंकर शब्द कर रही थी। मेघकी गर्जनाके समान उस भयंकर भेरीके शब्दको सुनकर युद्धके लिये लालायित हुए असुरगण तुरंत ही त्रिपुरसे बाहर निकल पड़े। वे लोहे, चाँदी, सुवर्ण और मणियोंके बने हुए कड़े, कुण्डल, हार और उत्तम मुकुट धारण किये हुए थे। वे अनवरत जलते हुए धूमसे युक्त प्रज्वलित अग्निके समान दीख रहे थे। वे सुदृढ़ पराक्रमी दैत्य अपने-अपने अस्त्र लेकर (उच्छलते-कूदते हुए) ऐसे लग रहे थे, जैसे रंगमंचपर नाचते हुए नट हों।
वे सूँड़ उठाये हुए हाथीके समान हाथ उठाकर और सिंह-सदृश निर्भय होकर बादलकी तरह गर्जना कर रहे थे। कुण्डके समान गम्भीर, सूर्यके सदृश तेजस्वी और वृक्षोंके से धैर्यशाली दैत्येन्द्र प्रमथोंकी विशाल सेनाको पीडित करने लगे। तत्पश्चात् गरुडकी भाँति झपट्टा मारनेवाले दानव-शत्रु प्रमथगण भी उत्साहपूर्वक युद्ध करनेकी अभिलाषासे दानवोंपर टूट पड़े। उस समय नन्दीश्वरकी अध्यक्षतामें प्रमथगण और तारकासुरकी अध्यक्षतामें दानवयूथ समवेतरूपसे युद्ध करने लगे। उन्हें सेनाएँ भी प्रेरित कर रही थीं। वे चन्द्रमाके समान चमकीली तलवारों, अग्नि-सदृश पीले शूलों और सुदृढ़रूपसे छोड़े गये बाणोंसे परस्पर एक-दूसरेपर प्रहार कर रहे थे। उस समय छोड़े जाते हुए बाणों तथा प्रहार की जाती हुई तलवारोंके रूप ऐसे दीख रहे थे मानो आकाशसे गिरती हुई महोल्काएँ हों ॥ २५-३६ ॥
शक्तिभिभिन्नहृदया निर्दया इव पातिताः ।
निरयेष्विव निर्मग्नाः कूजन्ते प्रमथासुराः ॥ ३७
हेमकुण्डलयुक्तानि किरीटोत्कटवन्ति च।
शिरांस्युर्व्या पतन्ति स्म गिरिकूटा इवात्यये ॥ ३८
परश्वधैः पट्टिशैश्च खङ्गैश्च परिधैस्तथा।
छिन्नाः करिवराकारा निपेतुस्ते धरातले ॥ ३९
गर्जन्ति सहसा हृष्टाः प्रमथा भीमगर्जनाः ।
साधयन्त्यपरे सिद्धात्र युद्धगान्धर्वमद्भुतम् ॥ ४०
बलवान् भासि प्रमथ दर्पितो भासि दानव।
इति चोच्चारयन् वाचं चारणा रणधूर्गताः ॥ ४१
परिधैराहताः केचिद् दानवैः शङ्करानुगाः ।
वमन्ते रुधिरं वक्त्रैः स्वर्णधातुमिवाचलाः ॥ ४२
प्रमथैरपि नाराचैरसुराः सुरशत्रवः ।
द्रुमैश्च गिरिशृङ्गैश्च गाढमेवाहवे हताः ॥ ४३
सूदितानथ तान् दैत्यानन्ये दानवपुङ्गवाः ।
उत्क्षिप्य चिक्षिपुर्वाप्यां मयदानवचोदिताः ॥ ४४
ते चापि भास्वरैर्देहैः स्वर्गलोक इवामराः ।
उत्तस्थुर्वापीमासाद्य सद्रूपाभरणाम्बराः ।। ४५
अथैके दानवाः प्राप्य वापीप्रक्षेपणादसून् ।
आस्फोट्य सिंहनादं च कृत्वाधावंस्तथासुराः ॥ ४६
दानवाः प्रमथानेतान् प्रसर्पत किमासथ।
हतानपि हि वो वापी पुनरुज्जीवयिष्यति ॥ ४७
शक्तिके आघातसे उनके हृदय छिन्न-भिन्न हो गये थे और वे दयाहीनकी भाँति भूमिपर पड़े हुए थे। इस प्रकार प्रमथगण तथा असुरवृन्द नरकमें पड़े हुए जीवोंकी तरह चीत्कार कर रहे थे। स्वर्णनिर्मित कुण्डलों और प्रभावशाली किरीटोंसे युक्त वीरोंके मस्तक प्रलयकालमें पर्वतशिखरकी भाँति पृथ्वीपर गिर रहे थे। वे कुठार, पटय, खड्ग और लोहेकी गदाके आघातसे छिन्न-भिन्न होकर गजेन्द्रोंके समान धराशायी हो रहे थे। कभी सहसा भयंकर गर्जना करनेवाले प्रमथगण हर्षपूर्वक गर्जना करने लगते तो इधर सिद्धगण अद्भुत युद्ध-कौशल दिखाते थे। रणभूमिमें आगे चलनेवाले चारण-'प्रमथ! तुम तो बलवान् मालूम पड़ते हो,' 'दानव ! तुम गर्वीले दीख रहे हो' इस प्रकारके वचन बोल रहे थे।
दानवोंद्वारा चलाये गये लोहनिर्मित गदाके आघातसे कुछ पार्षदगण मुखसे रक्त उगल रहे थे, जो ऐसे लगते थे, मानो पर्वत सुवर्णधातु उगल रहे हों। उधर प्रमथगण भी रणभूमिमें बाणों, वृक्षों और पर्वत शिखरोंके प्रहारसे बहुतेरे देवशत्रु असुरोंको पूर्णरूपसे घायल कर उन्हें कालके हवाले कर रहे थे। मयदानवकी आज्ञासे दूसरे दानवश्रेष्ठ उन मरे हुए दानवोंको उठाकर उसी बावलीमें डाल देते थे। उस बावलीमें पड़ते ही वे सभी दानव स्वर्गवासी देवताओंकी तरह तेजस्वी शरीर धारण कर उत्तम आभूषणों और वस्त्रोंसे विभूषित हो बाहर निकल आते थे। तदनन्तर बावलीमें डाल देनेसे जीवित हुए कुछ दानव ताल ठोंककर सिंहनाद करते हुए इधर-उधर दौड़ लगा रहे थे और कह रहे थे- 'दानवो! इन प्रमथगणोंपर धावा करो। क्यों बैठे हो ? (अब तुमलोगोंको कोई भय नहीं है; क्योंकि) मर जानेपर भी तुमलोगोंको यह बावली पुनः जीवित कर देगी' ॥ ३७-४७॥
एवं श्रुत्वा शङ्कुकर्णों वचोऽग्रग्रहसंनिभः ।
द्रुतमेवैत्य देवेशमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ४८
सूदिताः सूदिता देव प्रमथैरसुरा हामी।
उत्तिष्ठन्ति पुनर्भीमाः सस्या इव जलोक्षिताः ॥ ४९
अस्मिन् किल पुरे वापी पूर्णामृतरसाम्भसा ।
निहता निहता यत्र क्षिप्ता जीवन्ति दानवाः ॥ ५०
इति विज्ञापयद् देवं शङ्कुकर्णो महेश्वरम् ।
अभवन् दानवबल उत्पाता वै सुदारुणाः ॥ ५१
तारकाख्यः सुभीमाक्षो दारितास्यो हरिर्यथा।
अभ्यधावत् संकुद्धो महादेवरथं प्रति ॥ ५२
त्रिपुरे तु महान् घोरो भेरीशङ्खरवो बभौ।
दानवा निःसृता दृष्ट्वा देवदेवरथे सुरम् ॥ ५३
भूकम्पश्चाभवत्तत्र रथाङ्गो भूगतोऽभवत् ।
दृष्ट्वा क्षोभमगारुद्रः स्वयम्भूश्च पितामहः ।। ५४
ताभ्यां देववरिष्ठाभ्यामन्वितः स रथोत्तमः ।
अनायतनमासाद्य सीदते गुणवानिव ॥ ५५
धातुक्षये देह इव ग्रीष्मे चाल्पमिवोदकम्।
शैथिल्यं याति स रथः स्नेहो विप्रकृतो यथा ॥ ५६
रथादुत्पत्यात्मभूर्वै सीदन्तं तु रथोत्तमम् ।
उज्जहार महाप्राणो रथं त्रैलोक्यरूपिणम् ॥ ५७
तदा शराद् विनिष्पत्य पीतवासा जनार्दनः ।
वृषरूपं महत्कृत्वा रथं जग्राह दुर्धरम् ॥ ५८
स विषाणाभ्यां त्रैलोक्यं रथमेव महारथः ।
प्रगृह्योद्वहते सज्जं कुलं कुलवहो यथा ॥ ५९
तारकाख्योऽपि दैत्येन्द्रो गिरीन्द्र इव पक्षवान् ।
अभ्यद्रवत्तदा देवं ब्रह्माणं हतवांश्च सः ॥ ६०
स तारकाख्याभिहतः प्रतोदं न्यस्य कूबरे।
विजज्वाल मुहुर्ब्रह्मा श्वासं वक्त्रात् समुद्रिरन् ।। ६१
दानवोंको ऐसा कहते सुनकर सूर्यके समान तेजस्वी शङ्कुकर्णने शीघ्र ही देवेश्वर शंकरजीके निकट जाकर इस प्रकार कहा- 'देव! प्रमथगणोंद्वारा बारंबार मारे गये ये भयंकर असुर पुनः उसी प्रकार जी उठते हैं, जैसे जलके सिञ्चनसे सूखी हुई फसल। निश्चय ही इस पुरमें अमृतरूपी जलसे परिपूर्ण कोई बावली है, जिसमें डाल देनेसे बार-बार मारे गये दानव पुनः जीवित हो जाते हैं।' इस प्रकार शङ्कुकर्णने भगवान् महेश्वरको सूचित किया। उसी समय दानवोंकी सेनामें अत्यन्त भीषण उत्पात होने लगे। तब परम भयानक नेत्रोंवाले तारकाक्षने अत्यन्त कुपित होकर सिंहकी तरह मुँह फैलाये हुए महादेवजीके रथपर धावा किया। उस समय त्रिपुरमें भेरियों और शङ्खौँका महान् भीषण निनाद होने लगा। देवाधिदेव शंकरजीके रथपर (शंकर और) ब्रह्माको उपस्थित देखकर दानवगण त्रिपुरसे बाहर निकले। तभी वहाँ ऐसा भयंकर भूकम्प आया, जिससे (शिवजीके) रथका चक्का पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गया। यह देखकर भगवान् रुद्र और स्वयम्भू ब्रह्मा क्षुब्ध हो उठे।
उन दोनों देवश्रेष्ठोंसे युक्त वह उत्तम रथ कहीं ठहरनेका स्थान न पाकर स्थानरहित गुणी पुरुषकी तरह विपत्तिग्रस्त हो गया। वह रथ वीर्यनाश हो जानेपर शरीर, ग्रीष्म ऋतुमें अल्प जलवाले जलाशय और तिरस्कृत स्नेहकी तरह शिथिलताको प्राप्त हो गया। इस प्रकार जब वह श्रेष्ठ रथ नीचे जाने लगा, तब महाबली स्वयम्भू ब्रह्माने उससे कूदकर उस त्रैलोक्यरूपी रथको ऊपर उठा दिया। इतनेमें ही पीताम्बर धारी भगवान् जनार्दनने बाणसे निकलकर विशाल वृषभका रूप धारण किया और उस दुर्धर रथको उठा लिया। वे महारथी जनार्दन त्रिलोकीरूप उस रथको अपने सींगोंपर उठाकर उसी तरह ढो रहे थे, जैसे कुलपति अपने संगठित कुलका भार वहन करता है। उसी समय पक्षधारी गिरिराजकी तरह विशालकाय दैत्येन्द्र तारकासुरने भी देवेश्वर ब्रह्मापर धावा बोल दिया और उन्हें घायल कर दिया। तब तारकासुरके प्रहारसे घायल हुए ब्रह्मा रथके कूबरपर चाबुक रखकर मुखसे बारंबार लम्बी साँस छोड़ते हुए (क्रोधसे) प्रज्वलित हो उठे ॥ ४८-६१ ॥
तत्र दैत्यैर्महानादो दानवैरपि भैरवः ।
तारकाख्यस्य पूजार्थं कृतो जलधरोपमः ॥ ६२
रथचरणकरोऽथ महामृधे वृषभवपुर्वृषभेन्द्रपूजितः।
दितितनयबलं विमर्हा सर्वं त्रिपुरपुरं प्रविवेश केशवः ॥ ६३
सजलजलदराजितां समस्तां कुमुदवरोत्पलफुल्लपङ्कजाळ्याम् ।
सुरगुरुरपिबत् पयोऽमृतं त-द्रविरिव संचितशार्वरं तमोऽन्धम् ॥ ६४
वापीं पीत्वासुरेन्द्राणां पीतवासा जनार्दनः ।
नर्दमानो महाबाहुः प्रविवेश शरं ततः ॥ ६५
ततोऽसुरा भीमगणेश्वरैर्हताः प्रहारसंवर्धितशोणितापगाः।
पराङ्मुखा भीममुखैः कृता रणे यथा नयाभ्युद्यततत्परैर्नरैः ॥ ६६
स तारकाख्यस्तडिमालिरेव च मयेन सार्धं प्रमथैरभिद्रुताः ।
पुरं परावृत्य नु ते शरार्दिता यथा शरीरं पवनोदये गताः ॥ ६७
गणेश्वराभ्युद्यतदर्पकाशिनो महेन्द्रनन्दीश्वरषण्मुखा युधि।
विनेदुरुच्चैर्जहसुश्च दुर्मदा जयेम चन्द्रादिदिगीश्वरैः सह । ६८
वहाँ दैत्य और दानव तारकासुरका सत्कार करनेके लिये मेघकी गर्जनाके समान अत्यन्त भयंकर सिंहनाद करने लगे। यह देखकर वृषभका शरीर धारण करनेवाले एवं शंकरद्वारा पूजित भगवान् केशव हाथमें सुदर्शन चक्र धारण कर उस महासमरमें दैत्योंकी सारी सेनाओंका मर्दन करते हुए त्रिपुरमें प्रविष्ट हुए। वहाँ वे उस बावलीपर जा पहुँचे, जो चारों ओरसे बादलोंसे सुशोभित तथा खिली हुई कुमुदिनी, नीलकमल और अन्यान्य कमलोंसे व्याप्त थी। फिर तो उन देवश्रेष्ठने उसके अमृतरूपी जलको इस प्रकार पी लिया, जैसे सूर्य रात्रिमें संचित हुए घने अन्धकारको पी जाते हैं। इस प्रकार पीताम्बरधारी महाबाहु जनार्दन असुरेन्द्रोंकी बावलीका अमृत पीकर सिंहनाद करते हुए पुनः उसी बाणमें प्रविष्ट हो गये। तत्पश्चात् भयावने मुखवाले भयंकर गणेश्वरोंने असुरोंको मारना प्रारम्भकिया। उनके प्रहारसे घायल हुए दानवोंक रुधिरसे नदियाँ बह चलीं। वे उसी प्रकार युद्धविमुख कर दिये गये, जैसे नयशील पुरुष अन्यायियोंको विमुख कर देते हैं। इस प्रकार प्रमथगणोंद्वारा खदेड़े गये एवं बाणोंके प्रहारसे घायल मयके साथ तारकासुर और विद्युन्माली त्रिपुरमें ऐसे लौट आये, मानो उनके शरीरसे प्राण ही निकल गये हों। उस समय युद्धस्थलमें महेन्द्र, नन्दीश्वर और स्वामिकार्तिक गणेश्वरोंके साथ दर्पसे सुशोभित हो रहे थे। वे उन्मत्त होकर सिंहनाद एवं अट्टहास करते हुए कहने लगे कि अब चन्द्रमा आदि दिक्पालोंसहित हमलोग अवश्य विजयी होंगे ॥ ६२-६८ ॥
इति श्रीमात्स्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३६ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाहप्रसङ्गमें एक सौ छत्तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १३६ ॥
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