मत्स्य पुराण एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय
देवताओं और दानवों में घमासान युद्ध तथा तारकासुर का वध
सूत उवाच
मघवा तु निहन्तुं तानसुरानमरेश्वरः ।
लोकपाला ययुः सर्वे गणपालाश्च सर्वशः ॥ १
सूतजी कहते हैं- ऋषियो। शंकरजीद्वारा उत्साहित किये जानेपर देवराज इन्द्र, सभी लोकपाल और गणपाल सब ओरसे उन असुरोंका वध करनेके लिये चले और आकाशकी ओर उछल पड़े। १
ईश्वरेणोर्जिताः सर्व उत्पेतुश्चाम्बरे तदा।
खगतास्तु विरेजुस्ते पक्षवन्त इवाचलाः ॥ २
प्रययुस्तत्पुरं हन्तुं शरीरमिव व्याधयः ।
शङ्खाडम्बरनिर्घोषैः पणवान् पटहानपि।
नादयन्तः पुरो देवा दृष्टास्त्रिपुरवासिभिः ॥ ३
हरः प्राप्त इतीवोक्त्वा बलिनस्ते महासुराः ।
आजग्मुः परमं क्षोभमत्ययेष्विव सागराः ॥ ४
सुरतूर्यरवं श्रुत्वा दानवा भीमदर्शनाः ।
निनेदुर्वादयन्तश्च नानावाद्यान्यनेकशः ॥ ५
भूयोदीरितवीर्यास्ते परस्परकृतागसः ।
पूर्वदेवाश्च देवाश्च सूदयन्तः परस्परम् ॥ ६
आक्रोशेऽपि समप्रख्ये तेषां देहनिकृन्तनम्।
प्रवृत्तं युद्धमतुलं प्रहारकृतनिःस्वनम् ॥ ७
निष्पतन्त इवादित्याः प्रज्वलन्त इवाग्नयः ।
शंसन्त इव नागेन्द्रा भ्रमन्त इव पक्षिणः।
गिरीन्द्रा इव कम्पन्तो गर्जन्त इव तोयदाः ॥ ८
जुम्भन्त इव शार्दूलाः प्रवान्त इव वायवः ।
प्रवृद्धोर्मितरङ्गौघाः क्षुभ्यन्त इव सागराः ॥ ९
प्रमथाश्च महाशूरा दानवाश्च महाबलाः ।
युयुधुर्निश्चला भूत्वा वज्रा इव महाचलैः ॥ १०
आकाशमें पहुँचकर वे पंखधारी पर्वतकी तरह शोभा पाने लगे। तत्पश्चात् वे शङ्ख और डंकेके निर्घोषके साथ-साथ ढोलों और नगाड़ोंको पीटते हुए त्रिपुरका विनाश करनेके लिये उसी प्रकार आगे बढ़े, जैसे व्याधियाँ शरीरको नष्ट कर देती हैं। इतनेमें त्रिपुरवासी दानवोंने देवगणोंको आगे बढ़ते हुए देख लिया। फिर तो वे महाबली असुर 'शंकर (यहाँ भी) आ गये' ऐसा कहकर प्रलयकालीन सागरोंकी तरह परम क्षुब्ध हो उठे। तब भयंकर रूपधारी दानव देवताओंकी तुरहियोंका शब्द सुनकर नाना प्रकारके बाजे बजाते हुए बारंबार उच्च स्वरसे गर्जना करने लगे। तत्पश्चात् पुनः पराक्रम प्रकट करनेवाले वे दानव और देव परस्पर क्रुद्ध होकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगे। दोनों सेनाओंमें समानरूपसे सिंहनाद हो रहे थे। उनके शरीर कट-कटकर गिर रहे थे। फिर तो प्रहार करनेवालोंकी गर्जनाके साथ-साथ अनुपम युद्ध छिड़ गया। उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो अनेकों सूर्य गिर रहे हैं, अग्नियाँ प्रज्वलित हो उठी हैं, विषधर सर्प फुफकार मार रहे हैं, पक्षी आकाशमें चक्कर काट रहे हैं, पर्वत काँप रहे हैं, बादल गरज रहे हैं, सिंह जमुहाई ले रहे हैं, भयानक झंझावात चल रहा है और उछलती हुई लहरोंके समूहसे सागर क्षुब्ध हो उठा है। इस प्रकार महान् शूरवीर प्रमथ और महाबली दानव उसी प्रकार डटकर युद्ध कर रहे थे, जैसे महान् पर्वतोंसे टकरानेपर भी वज्र अटल रहता है॥ २-१०॥
कार्मुकाणां विकृष्टानां बभूवुर्दारुणा रवाः ।
कालानुगानां मेघानां यथा वियति वायुना ॥ ११
आहुश्च युद्धे मा भैषीः क्व यास्यसि मृतो ह्यसि।
प्रहराशु स्थितोऽस्म्यत्र एहि दर्शय पौरुषम् ॥ १२
गृहाण छिन्धि भिन्धीति खाद मारय दारय।
इत्यन्योऽन्यमनूच्चार्य प्रययुर्यमसादनम् ॥ १३
खङ्गापवर्जिताः केचित् केचिच्छिन्ना परश्वधैः ।
केचिन्मुद्गरचूर्णाश्च केचिद् बाहुभिराहताः ।। १४
पट्टिशैः सूदिताः केचित् केचिच्छूलविदारिताः ।
दानवाः शरपुष्याभाः सवना इव पर्वताः ।
निपतन्त्यर्णवजले भीमनक्क्रतिमिङ्गिले ॥ १५
व्यसुभिः सुनिबद्धाङ्गैः पतमानैः सुरेतरैः ।
सम्बभूवार्णवे शब्दः सजलाम्बुदनिः स्वनः ॥ १६
तेन शब्देन मकरा नक्रास्तिमितिमिङ्गिलाः ।
मत्ता लोहितगन्धेन क्षोभयन्तो महार्णवम् ॥ १७
परस्परेण कलहं कुर्वाणा भीममूर्तयः ।
भ्रमन्ते भक्षयन्तश्च दानवानां च लोहितम् ॥ १८
सरथान् सायुधान् साश्वान् सवस्त्राभरणावृतान् ।
जग्रसुस्तिमयो दैत्यान् द्रावयन्तो जलेचरान् ॥ १९
मृधं यथासुराणां च प्रमथानां प्रवर्तते।
अम्बरेऽम्भसि च तथा युद्धं चकुर्जलेचराः ॥ २०
जैसे आकाशमें वायुद्वारा प्रेरित किये जानेपर प्रलयकालीन मेघोंकी गर्जना होती है, उसी तरह खाँचे जाते हुए धनुषोंके भीषण शब्द हो रहे थे। युद्धभूमिमें दोनों ओरके वीर परस्पर 'मत डरो, कहाँ भागकर जाओगे, अब तो तुम मरे ही हो, शीघ्र प्रहार करो, मैं यहाँ खड़ा हूँ, आओ और अपना पुरुषार्थ दिखाओ, पकड़ लो, काट डालो, विदीर्ण कर दो, खा लो, मार डालो, फाड़ डालो'- ऐसा शब्द बोल रहे थे और पुनः शान्त होकर यमलोकके पथिक बन जाते थे। उनमेंसे कुछ वीर तलवारसे काट डाले गये थे, कुछ फरसोंसे छिन्न-भिन्न कर दिये गये थे, कुछ मुद्गरोंकी मारसे चूर्ण-सरीखे हो गये थे, कुछ हाथके चपेटोंसे घायल कर दिये गये, कुछ पट्टिशों (पटों) के प्रहारसे मार डाले गये और कुछ शूलोंसे विदीर्ण कर दिये गये।
सरपतके फूलकी-सी कान्तिवाले दानव वनसहित पर्वतोंकी तरह भयंकर नाक और तिमिंगिलोंसे भरे हुए समुद्रके जलमें गिर रहे थे। दानवोंके कवच आदिसे भलीभाँति बँधे हुए प्राणरहित शरीरोंके समुद्रमें गिरनेसे सजल जलधरकी गर्जनाके समान शब्द हो रहा था। उस शब्दसे तथा दानवोंके रुधिरकी गन्धसे मतवाले हुए मगर, नाक, तिमि और तिमिंगिल आदि जन्तु महासागरको क्षुब्ध कर रहे थे। वे भयंकर आकारवाले जलजन्तु परस्पर झगड़ते हुए दानवोंका रुधिर पान कर चक्कर काट रहे थे। यूथ-के-यूथ मगरमच्छ अन्य जल-जन्तुओंको खदेड़कर रथ आयुध, अश्व, वस्त्र और आभूषणों सहित दैत्योंको निगल जाते थे। जिस प्रकार आकाशमें दानवों और प्रमथोंका युद्ध चल रहा था, उसी तरह समुद्रमें जल-जन्तु (शवोंको खानेके लिये) परस्पर लड़ रहे थे ॥ ११-२०॥
यथा भ्रमन्ति प्रमथाः सदैत्या- स्तथा भ्रमन्ते तिमयः सनक्राः ।
यथैव छिन्दन्ति परस्परं तु तथैव क्रन्दन्ति विभिन्नदेहाः ॥ २१
व्रणाननैरङ्गरसं स्रवद्भिः सुरासुरैर्नक्रतिमिङ्गिलैश्च ।
कृतो मुहूर्तेन समुद्रीदेशः सरक्ततोयः समुदीर्णतोयः ॥ २२
पूर्व महाम्भोधरपर्वताभं द्वारं महान्तं त्रिपुरस्य शक्रः ।
निपीड्य तस्थौ महता बलेन युक्तोऽमराणां महता बलेन ॥ २३
तथोत्तरं सोऽन्तरजो हरस्य बालार्कजाम्बूनदतुल्यवर्णः ।
स्कन्दः पुरद्वारमथारुरोह वृद्धोऽस्तशृङ्गं प्रपतन्निवार्कः ॥ २४
यमश्च वित्ताधिपतिश्च देवो दण्डान्वितः पाशवरायुधश्च ।
देवारिणस्तस्य पुरस्य द्वारं ताभ्यां तु तत्पश्चिमतो निरुद्धम् ॥ २५
दक्षारिरुद्रस्तपनायुताभः स भास्वता देवरथेन देवः ।
तद्दक्षिणद्वारमरेः पुरस्य रुद्ध्वावतस्थो भगवांस्त्रिनेत्रः ॥ २६
तुङ्गानि वेश्मानि सगोपुराणि स्वर्णानि कैलासशशिप्रभाणि ।
प्रह्लादरूपाः प्रमथावरुद्धा ज्योतींषि मेघा इव चाश्मवर्षाः ॥ २७
उत्पाट्य चोत्पाट्य गृहाणि तेषां सशैलमालासमवेदिकानि ।
प्रक्षिप्य प्रक्षिप्य समुद्रमध्ये कालाम्बुदाभाः प्रमथा विनेदुः ॥ २८
रक्तानि चाशेषवनैर्युतानि साशोकखण्डानि सकोकिलानि।
गृहाणि हे नाथ पितः सुतेति भ्रातेति कान्तेति प्रियेति चापि।
उत्पाट्यमानेषु गृहेषु नार्य-स्त्वनार्यशब्दान् विविधान् प्रचक्कुः ॥ २९
कलत्रपुत्रक्षयप्राणनाशे तस्मिन् पुरे युद्धमतिप्रवृत्ते ।
महासुराः सागरतुल्यवेगा गणेश्वराः कोपवृताः प्रतीयुः ॥ ३०
परश्वधैस्तत्र शिलोपलैश्च त्रिशूलवज्रोत्तमकम्पनैश्च ।
शरीरसद्यक्षपणं सुघोरं युद्धं प्रवृत्तं दृढवैरबद्धम् ।। ३१
अन्योऽन्यमुद्दिश्य विमर्दतां च प्रधावतां चैव विनिघ्नतां च।
शब्दो बभूवामरदानवानां युगान्तकालेष्विव सागराणाम् ॥ ३२
उस समय जैसे आकाशमें प्रमथगण दैत्योंके साथ युद्ध करते हुए चक्कर काट रहे थे, वैसे ही जलमें मगरमच्छ नाकोंके साथ झगड़ते हुए घूम रहे थे। जैसे देवता और दानव परस्पर एक-दूसरेके शरीरको काट रहे थे, वैसे ही मगरमच्छ और नाक भी एक-दूसरेके शरीरको विदीर्ण कर चीत्कार कर रहे थे। देवताओं, असुरों, नाकों और तिमिंगिलोंके घावों और मुखोंसे बहते हुए रुधिरसे समुद्रके उस प्रदेशका जल मुहूर्तमात्रके लिये रक्तयुक्त हो गया और वहाँ बाढ़ आ गयी। उस त्रिपुरका पूर्वद्वार अत्यन्त विशाल और काले मेघ तथा पर्वतके समान कान्तिमान् था। महान् बलशाली इन्द्र देवताओंकी विशाल सेनाके साथ उस द्वारको अवरुद्ध कर खड़े थे। उसी प्रकार उदयकालीन सूर्य और सुवर्णके तुल्य रंगवाले शंकरजीके आत्मज स्कन्द त्रिपुरके उत्तरद्वारपर ऐसे चढ़े हुए थे मानो बढ़े हुए सूर्य अस्ताचलके शिखरोंपर चढ़ रहे हों। दण्डधारी यमराज और अपने श्रेष्ठ अख पाशको धारण किये हुए कुबेर ये दोनों देवता उस देवशत्रु मयके पुरके पश्चिमद्वारपर घेरा डाले हुए थे।
दस हजार सूर्योकी-सी आभावाले दक्षके शत्रु त्रिनेत्र धारी भगवान् रुद्रदेव उस उद्दीत देवरथपर आरूढ़ होकर शत्रु-नगरके दक्षिणद्वारको रोककर स्थित थे। उस त्रिपुरके फाटकोंसहित स्वर्णनिर्मित ऊँचे-ऊँचे महलोंको, जो कैलास और चन्द्रमाके सदृश चमक रहे थे, प्रसन्न मुखवाले प्रमथोंने उसी प्रकार अवरुद्ध कर रखा था, जैसे उपलोंकी वर्षा करनेवाले मेघ ज्योतिर्गणोंको घेर लेते हैं। काले मेघकी-सी कान्तिवाले प्रमथगण दानवोंके पर्वतमालाके सदृश ऊँची-ऊँची वेदिकाओंसे युक्त गृहोंको, जो लाल वर्णवाले तथा अशोक वृक्षों एवं अन्यान्य वनोंसे युक्त थे और जिनमें कोयलें कूक रही थीं, उखाड़-उखाड़कर लगातार समुद्रमें फेंक रहे थे और उच्च स्वरसे गर्जना कर रहे थे। गृहोंको उखाड़ते समय उनमें रहनेवाली स्त्रियाँ- ' हे नाथ! हा पिता! अरे पुत्र! हाय भाई! हाय कान्त। हे प्रियतम!' आदि अनेक प्रकारके अनार्योचित शब्द बोल रही थीं। इस प्रकार जब उस पुरमें रखी, पुत्र तथा प्राणका विनाश करनेवाला अत्यन्त भीषण युद्ध होने लगा, तब सागरतुल्य वेगशाली महान् असुर और गणेश्वर क्रोधसे भर गये। फिर तो कुठार, शिलाखण्ड, त्रिशूल, श्रेष्ठ वज्र और कम्पन (एक प्रकारका शस्त्र) आदिके प्रहारसे शरीर और गृहको विनष्ट करनेवाला अत्यन्त घोर युद्ध आरम्भ हो गया; क्योंकि दोनों सेनाओं में सुदृढ़ वैर बँधा हुआ था। परस्पर एक-दूसरेको लक्ष्य करके मर्दन, आक्रमण और प्रहार करनेवाले देवताओं और दानवोंका प्रलयकालमें सागरोंकी गर्जनाकी भाँति भीषण शब्द होने लगा ॥ २१-३२॥
व्रणैरजस्त्रं क्षतजं वमन्तः कोपोपरक्ता बहुधा नदन्तः।
गणेश्वरास्तेऽसुरपुङ्गवाश्च युध्यन्ति शब्दं च महदुद्भिरन्तः ॥ ३३
मार्गाः पुरे लोहितकर्दमाक्ताः स्वर्णेष्टकास्फाटिकभिन्नचित्राः ।
कृता मुहूर्तेन सुखेन गन्तुं छिन्नोत्तमाङ्गाङ्गिकराः करालाः ॥ ३४
कोपावृताक्षः स तु तारकाख्यः संख्ये सवृक्षः सगिरिर्निलीनः ।
तस्मिन् क्षणे द्वारवरं रिरक्षो रुद्रं भवेनाद्भुतविक्रमेण ॥ ३५
स तत्र प्राकारगतांश्च भूतान्-शान्तान् महानद्भुतवीर्यसत्त्वः ।
चचार चाप्तेन्द्रियगर्वदृप्तः पुराद् विनिष्क्रम्य ररास घोरम् ॥ ३६
ततः स दैत्योत्तमपर्वताभो यथाञ्जसा नाग इवाभिमत्तः ।
निवारितो रुद्ररथं जिघृक्षु-र्यथार्णवः सर्पति चातिवेलः ॥ ३७
शेषः सुधन्वा गिरिशश्च देव-श्चतुर्मुखो यः स त्रिलोचनश्च।
ते तारकाख्याभिगतागताजौ क्षोभं यथा वायुवशात् समुद्राः ॥ ३८
शेषो गिरीशः सपितामहेश-श्चोत्क्षुभ्यमाणः स रथेऽम्बरस्थः ।
बिभेद संधीषु बलाभिपन्नः कूजन्निनादांश्च करोति घोरान् ॥ ३९
एकं तु ऋग्वेदतुरङ्गमस्य पृष्ठे पदं न्यस्य वृषस्य चैकम्।
तस्थौ भवः सोद्यतबाणचापः पुरस्य तत्सङ्गममीक्षमाणः ॥ ४०
तदा भवपदन्यासाद्धयस्य वृषभस्य च।
पेतुः स्तनाश्च दन्ताश्च पीडिताभ्यां त्रिशूलिना ।। ४१
ततः प्रभृति चाश्वानां स्तना दन्ता गवां तथा।
गूढाः समभवंस्तेन चादृश्यत्वमुपागताः ॥ ४२
तारकाख्यस्तु भीमाक्षो रौद्ररक्तान्तरेक्षणीः ।
रुद्रान्तिके सुसंरुद्धो नन्दिना कुलनन्दिना ॥ ४३
परश्वधेन तीक्ष्णेन स नन्दी दानवेश्वरम् ।
तक्षयामास वै तक्षा चन्दनं गन्धदो यथा ॥ ४४
परश्वधहतः शूरः शैलादिः शरभो यथा।
दुद्राव खड्गं निष्कृष्य तारकाख्यो गणेश्वरम् ॥ ४५
यज्ञोपवीतमार्गेण चिच्छेद च ननाद च।
ततः सिंहरवो घोरः शङ्खशब्दश्च भैरवः ।
गणेश्वरैः कृतस्तत्र तारकाख्ये निषूदिते ॥ ४६
उस समय वे गणेश्वर और असुरश्रेष्ठ घावोंसे निरन्तर रक्तकी धारा बहाते हुए, बारंबार गरजते हुए और भयंकर शब्द बोलते हुए युद्ध कर रहे थे। उस पुरमें स्वर्ण और स्फटिक मणिकी ईंटोंसे बने हुए जो चित्र-विचित्र मार्ग थे, वे दो ही घड़ीमें रुधिरयुक्त कीचड़से भर दिये गये। जो सुखपूर्वक चलनेयोग्य थे, वे कटे हुए मस्तकों, पादों और पैरोंसे व्याप्त हो जानेके कारण दुर्गम हो गये। तब तारकासुर क्रोधसे आँखें तरेरता हुआ वृक्ष और पर्वत हाथमें लेकर युद्धस्थलमें आ पहुँचा। वह उस समय अद्भुत पराक्रमी शंकरद्वारा अवरुद्ध किये गये दक्षिणद्वारकी रक्षा करना चाहता था। महान् पराक्रमी एवं अद्भुत सत्त्वशाली तारकासुर अपनी इन्द्रियोंके गर्वसे उन्मत्त होकर परकोटॉपर चढ़े हुए भूतगणोंको काटकर वहाँ विचरण करने लगा। पुनः नगरसे बाहर निकलकर उसने घोर गर्जना की। पर्वतकी-सी आभावाला दैत्येन्द्र तारक मतवाले हाथीकी तरह शीघ्र ही शंकरजीके रथको पकड़ लेना चाहता था, परंतु प्रमथोंद्वारा इस प्रकार रोक दिया गया, जैसे बढ़ते हुए समुद्रको उसका तट रोक देता है। उस समय शेषनाग, ब्रह्मा तथा सुन्दर धनुष धारण करनेवाले और पर्वतपर शयन करनेवाले त्रिनेत्रधारी भगवान् शंकर युद्धस्थलमें तारकासुरके आ जानेसे उसी प्रकार क्षुब्ध हो गये, जैसे वायुके वेगसे सागर उद्वेलित हो उठते हैं। आकाशस्थित रथपर बैठे हुए बलसम्पन्न शेषनाग, शंकर और ब्रह्माने विशेष क्षुब्ध होकर पृथक् पृथक् तारकासुरके शरीरकी संधियोंको बींध दिया और वे घोर गर्जना करने लगे। उस समय हाथमें धनुष-बाण लिये हुए भगवान् शंकर अपना एक पैर ऋग्वेदरूप घोड़ेकी तथा दूसरा पैर नन्दीश्वरकी पीठपर रखकर त्रिपुरोंके परस्पर सम्मिलनकी प्रतीक्षा करते हुए खड़े हो गये। उस समय शंकरजीके पैर रखनेसे उन त्रिशूलधारीके भारसे पीड़ित हुए अश्वके स्तन और वृषभके दाँत टूटकर गिर पड़े। तभीसे घोड़ोंके स्तन और गो-वंशके (ऊपरी जबड़ेके) दाँत गुप्त हो गये। इसी कारण वे दिखायी नहीं पड़ते। उसी समय जिसके नेत्रोंके अन्तर्भाग भयंकर और लाल थे, उस भीषण नेत्रोंवाले तारकासुरको भगवान् रुद्रके निकट आते देखकर कुलको आनन्दित करने वाले नन्दीने रोक दिया तथा उन्होंने अपने तीखे कुठारसे उस दानवेश्वरके शरीरको इस प्रकार छील डाला, जैसे गन्धकी इच्छावाला (अथवा इत्र बनानेवाला) बढ़ई चन्दन वृक्षको छाँट देता है। कुठारके आघातसे आहत हुए शूरवीर तारकासुरने पर्वतीय सिंहकी तरह क्क्रुद्ध होकर म्यानसे तलवार खींचकर गणेश्वर नन्दीपर आक्रमण किया। तब नन्दीश्वरने यज्ञोपवीत-मार्गसे (अर्थात् जनेऊ पहननेकी जगह-बाएँ कंधेसे लेकर दाहिने कटितटतक) तिरछे रूपमें तारकासुरके शरीरको विदीर्ण कर दिया और भयंकर गर्जना की। फिर तो वहाँ तारकासुरके मारे जानेपर गणेश्वरोंके भयंकर सिंहनाद गूंज उठे और उनके शङ्खोंके भीषण शब्द होने लगे ॥ ३३-४६ ॥
प्रमथारसितं श्रुत्वा वादित्रस्वनमेव च।
पार्श्वस्थः सुमहापार्श्व विद्युन्मालिं मयोऽब्रवीत् ॥ ४७
बहुवदनवतां किमेष शब्दो नदतां श्रूयते भिन्नसागराभः ।
वद वद त्वं तडिन्मालिन् किमेत-गणपा युयुधुर्यथा गजेन्द्राः ॥ ४८
इति मयवचनाङ्कुशार्दित-स्तं तडिन्माली रविरिवांशुमाली।
रणशिरसि समागतः सुराणां निजगादेदमरिन्दमोऽतिदुःखात् ॥ ४९
यमवरुणमहेन्द्ररुद्रवीर्य-स्तव यशसो निधिर्धीरः तारकाख्यः ।
सकलसमरशीर्षपर्वतेन्द्रो युद्ध्वा यस्तपति हि तारको गणेन्नैः ॥ ५०
मुदितमुपनिशम्य तारकाख्यं रविदीप्तानलभीषणायताक्षम् ।
हृषितसकलनेत्रलोमसत्त्वाः प्रमथास्तोयमुचो तथा नदन्ति ॥ ५१
इति सुहृदो वचनं निशम्य तत्त्वं तडिन्मालेः स मयः सुवर्णमाली।
रणशिरस्यसिताञ्जनाचलाभो जगदे वाक्यमिदं नवेन्दुमालिम् ॥ ५२
विद्युन्मालिन्न नः कालः साधितुं ह्यवहेलया।
करोमि विक्रमेणैतत् पुरं व्यसनवर्जितम् ॥ ५३
विद्युन्माली ततः कुद्धो मयश्च त्रिपुरेश्वरः ।
गणान् जघ्नुस्तु द्राधिष्ठाः सहितास्तैर्महासुरैः ॥ ५४
येन येन ततो विद्युन्माली याति मयश्च सः।
तेन तेन पुरं शून्यं प्रमथोपहुङ्कतम् ॥ ५५
अथ यमवरुणमृदङ्गघोषैः पणवडिण्डिमज्यास्वनप्रघोषैः।
सकरतलपुटैश्च सिहनादै- र्भवमभिपूज्य तदा सुरावतस्थुः ॥ ५६
सम्पूज्यमानोऽदितिजैर्महात्मभिः सहस्त्ररश्मिप्रतिमौजसैर्विभुः।
अभिष्टुतः सत्यरतैस्तपोधनै-र्यथास्त शृङ्गाभिगतो दिवाकरः ॥ ५७
तब प्रमथगणोंके सिंहनाद और उनके बाजोंके भीषण शब्दको सुनकर बगलमें ही स्थित मयदानवने महान् बलशाली विद्युन्मालीसे पूछा- 'विद्युन्मालिन्। बताओ तो सही, अनेकों मुखोंवाले प्रमथगणोंका सागरकी गर्जनाके समान यह भयंकर सिंहनाद क्यों सुनायी पड़ रहा है? ये गणेश्वर क्यों गजराज से गरजते हुए इतने उत्साहसे युद्ध कर रहे हैं?' इस प्रकार मयके वचनरूपी अङ्कुशसे पीड़ित हुआ किरणमाली सूर्यकी तरह तेजस्वी शत्रुदमन विद्युन्माली, जो तुरंत ही देवताओंके युद्धके मुहानेसे लौटकर आया था, अत्यन्त दुःखके साथ मयसे इस प्रकार बोला-' धैर्यशाली राजन्। जो यम, वरुण, महेन्द्र और रुद्रके समान पराक्रमी, आपकी कीर्तिका निधिस्वरूप, समस्त युद्धोंके मुहानेपर पर्वतराजकी भाँति डटा रहनेवाला और युद्धभूमिमें शत्रुओंके लिये संतापदायक था, वह तारक गणेश्वरोंद्वारा निहत हो गया। सूर्य एवं प्रज्वलित अग्निके समान भयंकर विशाल नेत्रोंवाले तारकको मारा गया सुनकर हर्षके कारण सभी प्रमथोंके शरीर पुलकित और नेत्र उत्फुल्ल हो गये हैं और वे बादलोंकी तरह गर्जना कर रहे हैं।' अपने मित्र विद्युन्मालीके इस तत्त्वपूर्ण वचनको सुनकर कञ्जलगिरिके सदृश शरीरवाला स्वर्णमालाधारी मय रणके मुहानेपर विद्युन्मालीसे इस प्रकार बोला- 'विद्युन्मालिन् ।
अब हमलोगोंके लिये अवहेलना (प्रमाद) पूर्वक समय बिताना ठीक नहीं है। मैं अपने पराक्रमसे पुनः इस त्रिपुरको आपत्तिरहित बनाऊँगा।' फिर तो विद्युन्माली और त्रिपुराधिपति मय-दोनोंने क्क्रुद्ध होकर महासुरोंकी विशाल सेनाके साथ गणेश्वरोंको मारना आरम्भ किया। उस समय त्रिपुरमें विद्युन्माली और मय जिस-जिस मार्गसे निकलते थे, वे मार्ग प्रमथोंके घायल होकर भाग जानेसे शून्य हो जाते थे। तब यम और वरुणके मृदङ्गघोष और ढोल, नगारे एवं धनुषकी प्रत्यञ्चाके निनादके साथ-साथ ताली बजाते और सिंहनाद करते हुए सभी देवगण शङ्करजीकी पूजा करके उन्हें घेरकर खड़े हो गये। सूर्यके समान तेजस्वी उन महात्मा देवगणोंद्वारा पूजित होते हुए तथा सत्यपरायण तपस्वियोंद्वारा स्तुति किये जाते हुए भगवान् शङ्कर अस्ताचलके शिखरपर पहुँचे हुए सूर्यकी भाँति सुशोभित हो रहे थे॥ ४७-५७॥
इति श्रीमात्ये महापुराणे त्रिपुरदाहे तारकाख्यवधो नामाष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥
इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके त्रिपुरदाहके प्रसङ्गमें तारकासुर वध नामक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ ॥ १३८ ॥
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