श्रीलिङ्गमहापुराण लिंग पुराण [ उत्तरभाग ] छठा अध्याय
भगवान् विष्णु से अलक्ष्मी (ज्येष्ठा- दरिद्रा) तथा लक्ष्मी का प्रादुर्भाव एवं लक्ष्मी तथा दरिद्रा के निवासयोग्य स्थानों का वर्णन
ऋषय ऊचुः
मायावित्वं श्रुतं विष्णोर्देवदेवस्य धीमतः ।
कथं ज्येष्ठासमुत्पत्तिर्देवदेवाज्जनार्दनात् ॥ १
वक्तुमर्हसि चास्माकं लोमहर्षण तत्त्वतः ।
ऋषिगण बोले- देवोंके भी देव धीमान् विष्णु का मायावी होना तो हमलोगोंने सुन लिया। हे लोमहर्षण ! अब आप हमलोगोंको यथार्थरूपसे यह बतायें कि देवदेव जनार्दनसे ज्येष्ठा (अलक्ष्मी) की उत्पत्ति कैसे हुई ? ॥ १॥
सूत उवाच
अनादिनिधनः श्रीमान् धाता नारायणः प्रभुः ॥ २
जगद्द्वैधमिदं चक्रे मोहनाय जगत्पतिः।
विष्णुर्वै ब्राह्मणान्वेदान्वेदधर्मान् सनातनान् ।। ३
श्रियं पद्मां तथा श्रेष्ठां भागमेकमकारयत्।
ज्येष्ठामलक्ष्मीमशुभां वेदबाह्यान्नराधमान् ॥ ४
सूतजी बोले- आदि तथा अन्तसे रहित, ऐश्वर्यशाली, प्रभुतासम्पन्न तथा जगत्के स्वामी नारायण विष्णुने प्राणियोंको व्यामोहमें डालनेके लिये इस जगत्को दो प्रकारका बनाया है। उन महातेजस्वी विष्णुने ब्राह्मणों, वेदों, सनातन वैदिक धर्मो, श्री तथा श्रेष्ठ पद्माकी उत्पत्ति करके एक भाग किया और अशुभ तथा ज्येष्ठा अलक्ष्मी, वेदविरोधी अधम मनुष्यों तथा अधर्मका निर्माण करके एक दूसरा भाग किया ॥ २-४ ॥
अधर्म च महातेजा भागमेकमकल्पयत्।
अलक्ष्मीमग्रतः सृष्ट्वा पश्चात्पद्मां जनार्दनः ॥५
ज्येष्ठा तेन समाख्याता अलक्ष्मीर्द्विजसत्तमाः ।
अमृतोद्भववेलायां विषानन्तरमुल्बणात् ॥ ६
अशुभा सा तथोत्पन्ना ज्येष्ठा इति च वै श्रुतम्।
ततः श्रीश्च समुत्पन्ना पद्मा विष्णुपरिग्रहः ॥ ७
दुःसहो नाम विप्रर्षिरुपयेमेऽशुभां तदा।
ज्येष्ठां तां परिपूर्णोऽसौ मनसा वीक्ष्य धिष्ठिताम् ।। ८
लोकं चचार हृष्टात्मा तया सह मुनिस्तदा।
यस्मिन् घोषो हरेश्चैव हरस्य च महात्मनः ॥ ९
वेदघोषस्तथा विप्रा होमधूमस्तथैव च।
भस्माङ्गिनो वा यत्रासंस्तत्र तत्र भयार्दिता ॥ १०
पिधाय कर्णी संयाति धावमाना इतस्ततः ।
ज्येष्ठामेवंविधां दृष्ट्वा दुःसहो मोहमागतः ॥ ११
हे श्रेष्ठ द्विजगण! भगवान् जनार्दनने पहले अलक्ष्मीका सृजन करके ही पद्मा (लक्ष्मी) का सृजन किया है, इसीलिये अलक्ष्मी ज्येष्ठा कही गयी हैं। अमृतकी उत्पत्तिके समय महाभयंकर विष निकलनेके पश्चात् पहले वे ज्येष्ठा अशुभ अलक्ष्मी उत्पन्न हुई, ऐसा सुना गया है। उसके अनन्तर विष्णुभार्या लक्ष्मी पद्मा आविर्भूत हुईतब [लक्ष्मीके विवाहसे पूर्व] दुःसह नामक विप्रर्षिने उस अशुभा ज्येष्ठाके साथ विवाह किया तथा उसको परिगृहीत देख स्वयंको परिपूर्ण माना; तब वे मुनि प्रसन्नचित्त होकर उसके साथ लोकमें विचरण करने लगे। हे विप्रो! जिस स्थानपर विष्णु तथा महात्मा शिवके नामका घोष तथा वेदध्वनि होती थी, हवनका धूम दीखता था अथवा अंगोंमें भस्म धारण किये हुए लोग रहते थे, वहाँपर वह अलक्ष्मी भयातुर होकर अपने दोनों कान बन्द करके इधर-उधर भागती हुई जाती थी। उस ज्येष्ठाको इस प्रकारके स्वभाववाली देखकर मुनि दुःसह उद्विग्न हो उठे ॥५-११॥
तया सह वनं गत्वा चचार स महामुनिः।
तपो महद्धने घोरे याति कन्या प्रतिग्रहम् ॥१२
न करिष्यामि चेत्युक्त्वा प्रतिज्ञाय च तामृषिः ।
योगज्ञानपरः शुद्धो यत्र योगीश्वरो मुनिः ॥ १३
तत्रायान्तं महात्मानं मार्कण्डेयमपश्यत।
प्रणिपत्य महात्मानं दुःसहो मुनिमब्रवीत् ॥ १४
भार्येयं भगवन् महां न स्थास्यति कथञ्चन।
किं करोमीति विप्रर्षे ह्यनया सह भार्यया ॥ १५
प्रविशामि तथा कुत्र कुतो न प्रविशाम्यहम्।
मार्कण्डेय उवाच
शृणु दुःसह सर्वत्र अकीर्तिरशुभान्विता ॥ १६
अलक्ष्मीरतुला चेयं ज्येष्ठा इत्यभिशब्दिता।
इसके बाद वे महामुनि उसके साथ घौर वनमें जाकर कठोर तप करने लगे। वे सोचने लगे कि कन्याका प्रतिग्रह भविष्यमें नहीं करूँगा-ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके वे ऋषि योगज्ञानपरायण हो गये। [किसी समय] उन विशुद्धात्मा योगीश्वर मुनिने वहाँपर आते हुए मार्कण्डेयजीको देखा। उन महात्मा मुनिको प्रणाम करके ऋषि दुःसहने कहा- हे भगवन् । मेरी यह भार्या मेरे साथ कभी नहीं रहेगी। हे विप्रवें। मैं क्या करूँ; अपनी इस भार्याके साथ कहाँ जाऊँ और कहाँ न जाऊँ? मार्कण्डेयजी बोले- हे दुःसह! सुनो, अकोर्ति सर्वत्र अशुभसे युक्त रहती है; यह अतुलनीय अलक्ष्मी 'ज्येष्ठा' इस नामसे पुकारी जाती है॥१२-१६ ॥
नारायणपरा यत्र वेदमार्गानुसारिणः ॥ १७
रुद्रभक्ता महात्मानो भस्मोद्धूलितविग्रहाः ।
स्थिता यत्र जना नित्यं मा विशेथाः कथञ्चन ॥ १८
नारायण हृषीकेश पुण्डरीकाक्ष माधव।
अच्युतानन्त गोविन्द वासुदेव जनार्दन ॥ १९
रुद्र रुद्रेति रुद्रेति शिवाय च नमो नमः।
नमः शिवतरायेति शङ्करायेति सर्वदा ॥ २०
महादेव महादेव महादेवेति कीर्तयेत्।
उमायाः पतये चैव हिरण्यपतये सदा ॥ २१
हिरण्यबाहवे तुभ्यं वृषाङ्काय नमो नमः।
नृसिंह वामनाचिन्त्य माधवेति च ये जनाः ॥ २२
वक्ष्यन्ति सततं हृष्टा ब्राह्मणाः क्षत्रियास्तथा।
वैश्याः शूद्राश्च ये नित्यं तेषां धनगृहादिषु।
आरामे चैव गोष्ठेषु न विशेथाः कथञ्चन ।। २३
ज्वालामालाकरालं च सहस्त्रादित्यसन्निभम्।
चक्रं विष्णोरतीवोग्रं तेषां हन्ति सदाशुभम् ॥ २४
जहाँ नारायणके भक्त, वेदमार्गका अनुसरण करनेवाले, रुद्रभक्त, महात्मागण तथा भस्मसे अनुलिप्त शरीरवाले 'हे नारायण! हे हृषीकेश ! हे पुण्डरीकाक्ष ! हे माधव । है लोग सदा रहते हों, वहाँ तुम कभी भी प्रवेश मत करना। अच्युतानन्त! हे गोविन्द । हे वासुदेव ! हे जनार्दन ! हे रुद्र! नमस्कार है, शंकरको सर्वदा नमस्कार है, हे महादेव! हे हे रुद्र ! है रुद्र !' शिवको बार-बार नमस्कार है, शिवतरको महादेव! हे महादेव! ऐसा कहते रहनेवाले; आप उमापति, हिरण्यपति, हिरण्यबाहु तथा वृषांकको सदा बार-बार नमस्कार है, है नृसिंह! हे वामन! हे अचिन्त्य ! हे माधव। - ऐसा जो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र प्रसन्न होकर नित्य बोलते रहते हैं; उनके धन-आदि गृहोंमें, उद्यानमें तथा गोष्ठोंमें कभी भी प्रवेश मत करना; क्योंकि विकराल अग्नि-ज्वालाओं तथा हजारों सूर्यकि समान तेजोमय अत्यन्त उग्र विष्णुचक्र उन लोगोंके अमंगलका सदा नाश कर देता है॥ १७-२४ ॥
स्वाहाकारो वषट्कारो गृहे यस्मिन् हि वर्तते।
तद्धित्वा चान्यमागच्छ सामघोषोऽथ यत्र वा ॥ २५
वेदाभ्यासरता नित्यं नित्यकर्मपरायणाः ।
वासुदेवार्चनरता दूरतस्तान् विसर्जयेत् ॥ २६
अग्निहोत्रं गृहे येषां लिङ्गार्चा वा गृहेषु च।
वासुदेवतनुर्वापि चण्डिका यत्र तिष्ठति ॥ २७
दूरतो व्रज तान् हित्वा सर्वपापविवर्जितान् ।
नित्यनैमित्तिकैर्यज्ञैर्यजन्ति च महेश्वरम् ॥ २८
तान् हित्वा व्रज चान्यत्र दुःसह त्वं सहानया।
श्रोत्रिया ब्राह्मणा गावो गुरवोऽतिथयः सदा ॥ २९
रुद्रभक्ताश्च पूज्यन्ते यैर्नित्यं तान् विवर्जयेत् ।
जिस घरमें स्वाहाकार तथा वषट्कार होता हो तथा जहाँपर सामवेदकी ध्वनि होती हो, उसे छोड़कर अन्यत्र चले जाना। जो लोग नित्य वेदाभ्यासमें संलग्न हों, नित्यकर्ममें तत्पर हों तथा वासुदेवकी पूजामें रत हों, उन्हें दूरसे ही त्याग देना जिनके घरमें अग्निहोत्र तथा शिवलिङ्गका पूजन होता हो और जिनके धरोंमें वासुदेव तथा भगवती चण्डिकाकी मूर्ति विराजमान हो, समस्त पापोंसे रहित उन लोगोंको छोड़कर चले जाना। हे दुःसह! जो लोग नित्य तथा नेमितिका कद्वारा महेस्वरकी आराधना करते हैं, उन्हें छोड़कर तुम इसके साथ अन्यत्र चले जाना। जो लोग वैदिकों, ब्राह्मणों, गौओं, गुरुओं, अतिथियों तथा रुद्रभक्तोंकी नित्य पूजा करते हैं, उनके पास मत जाना ॥ २५-२९ ॥
दुःसह उवाच
यस्मिन् प्रवेशो योग्यो मे तद्ब्रूहि मुनिसत्तम ॥ ३०
त्वद्वाक्याद्भयनिर्मुक्तो विशान्न्येषां गृहे सदा।
मार्कण्डेय उवाच
न श्रोत्रिया द्विजा गावो गुरवोऽतिथयः सदा।
यत्र भर्ता च भार्या च परस्परविरोधिनौ ॥ ३९
सभार्यस्त्वं गृहं तस्य विशेथा भयवर्जितः ।
देवदेवो महादेवो रुद्रस्त्रिभुवनेश्वरः ॥ ३२
विनिन्द्यो यत्र भगवान् विशस्व भयवर्जितः ।
वासुदेवरतिर्नास्ति यत्र नास्ति सदाशिवः ॥ ३३
जपहोमादिकं नास्ति भस्म नास्ति गृहे नृणाम्।
पर्वण्यभ्यर्चनं नास्ति चतुर्दश्यां विशेषतः ॥ ३४
कृष्णाष्टम्यां च रुद्रस्य सन्ध्यायां भस्मवर्जिताः ।
चतुर्दश्यां महादेवं न यजन्ति च यत्र वै ॥ ३५
विष्णोर्नामविहीना ये सङ्गताश्च दुरात्मभिः ।
नमः कृष्णाय शर्वाय शिवाय परमेष्ठिने ॥ ३६
ब्राह्मणाश्च नरा मूढा न वदन्ति दुरात्मकाः।
तत्रैव सततं वत्स सभार्यस्त्वं समाविश ॥ ३७
दुःसह बोला- हे मुनिश्रेष्ठ ! जिस स्थानमें मेरा प्रवेश हो सके; उसे आप मुझे बतायें, जिससे आपके वचनसे मैं भयरहित होकर इनके घरमें सदा प्रवेश करूँ मार्कण्डेयजी बोले- जिसके घरमें वैदिकों, द्विजों, गौओं, गुरुओं तथा अतिथियोंकी पूजा न होती हो और जहाँ पति-पत्नी एक-दूसरेके विरोधी हों, उसके घरमें तुम निर्भय होकर अपनी भायकि साथ प्रवेश करो। जहाँपर देवाधिदेव, महादेव तथा तीनों भुवनोंके स्वामी भगवान् रुद्रकी निन्दा होती हो, वहाँ तुम भयरहित होकर प्रवेश करो जहाँ भगवान् वासुदेवके प्रति भक्ति न हो; जहाँ सदाशिव न स्थापित हों; जहाँ मनुष्योंके घरमें जप-होम आदि न होता हो, भस्म-धारण न किया जाता हो, पर्वपर विशेष करके चतुर्दशी तथा कृष्णाष्टमी तिथिपर रुद्रपूजन न होता हो, लोग सन्ध्योपासनके समय भस्मधारण न करते हों; जहाँपर लोग चतुर्दशीके दिन महादेवका यजन न करते हों, जहाँ लोग विष्णुके नाम- संकीर्तनसे विमुख हों; जहाँ लोग दुष्टात्मावाले पुरुषोंके साथ रहते हों; जहाँ ब्राह्मण तथा विकृत मनवाले मनुष्य कृष्णको नमस्कार है, परमेष्ठी शर्वको नमस्कार है'- ऐसा नहीं कहते हों, वहींपर तुम अपनी भार्याके साथ सदा प्रवेश करो ॥ ३०-३७ ॥
वेदघोषो न यत्रास्ति गुरुपूजादयो न च।
पितृकर्मविहीनांस्तु सभार्यस्त्वं समाविश ॥ ३८
रात्रौ रात्रौ गृहे यस्मिन् कलहो वर्तते मिथः ।
अनया सार्धमनिशं विश त्वं भयवर्जितः ॥ ३९
लिङ्गार्चनं यस्य नास्ति यस्य नास्ति जपादिकम्।
रुद्रभक्तिर्विनिन्दा च तत्रैव विश निर्भयः ॥ ४०
अतिथिः श्रोत्रियो वापि गुरुर्वा वैष्णवोऽपि वा।
न सन्ति यद्गृहे गावः सभार्यस्त्वं समाविश ॥ ४१
बालानां प्रेक्षमाणानां यत्रादत्त्वा त्वभक्षयन्।
भक्ष्याणि तत्र संहृष्टः सभार्यस्त्वं समाविश ॥ ४२
अनभ्यर्च्य महादेवं वासुदेवमथापि वा।
अहुत्त्वा विधिवद्यत्र तत्र नित्यं समाविश ॥ ४३
जहाँ वेदध्वनि, गुरुपूजा आदि न होते हों, उन स्थानोंपर और पितृकर्म (श्राद्ध आदि) से विमुख लोगोंके यहाँ अपनी भार्यासहित निवास करो। जिस घरमें रात्रि-वेलामें [लोगोंके बीच] परस्पर कलह होता हो, वहाँ तुम भयमुक्त होकर इसके साथ निरन्तर निवास करो जिसके यहाँ शिवलिङ्गका पूजन न होता हो तथा जिसके यहाँ जप आदि न होते हों, अपितु रुद्रभतिको निन्दा होती हो, वहींपर तुम निर्भय होकर प्रवेश करो। जिस घरमें अतिथि, श्रोत्रिय (वैदिक), गुरु, विष्णुभक्त और गायें न हों, वहाँ तुम अपनी भार्यासहित निवास करो जहाँ बालकोंके देखते रहनेपर उन्हें बिना दिये ही लोग भक्ष्य पदार्थ स्वयं खा जाते हों, उस स्थानपर तुम प्रसन्न होकर सपत्नीक प्रवेश करो। महादेव अथवा भगवान् विष्णुका पूजन न करके तथा विधिपूर्वक हवन न करके जहाँ लोग रहते हों, वहाँ तुम सदा निवास करो ॥ ३८-४३ ॥
पापकर्मरता मूढा दयाहीनाः परस्परम्।
गृहे यस्मिन् समासन्ते देशे वा तत्र संविश ॥ ४४
प्राकारागारविध्वंसा न चैवेड्या कुटुम्बिनी।
तद्गृहं तु समासाद्य वस नित्यं हि हृष्टधीः ॥ ४५
यत्र कण्टकिनो वृक्षा यत्र निष्पाववल्लरी।
ब्रह्मवृक्षश्च यत्रास्ति सभार्यस्त्वं समाविश ॥ ४६
अगस्त्यार्कादयो वापि बन्धुजीवो गृहेषु वै।
करवीरो विशेषेण नन्द्यावर्तमथापि वा ॥। ४७
मल्लिका वा गृहे येषां सभार्यस्त्वं समाविश।
कन्या च यत्र वै वल्ली द्रोही वा च जटी गृहे ॥ ४८
बहुला कदली यत्र सभार्यस्त्वं समाविश।
तालं तमालं भल्लातं तित्तिडीखण्डमेव च ।। ४९
कदम्बः खादिरं वापि सभार्यस्त्वं समाविश।
न्यग्रोधं वा गृहे येषामश्वत्थं चूतमेव वा ॥५०
उदुम्बरं वा पनसं सभार्यस्त्वं समाविश।
यस्य काकगृहं निम्बे आरामे वा गृहेऽपि वा ॥ ५१
जिस घरमें या देशमें पापकृत्यमें संलग्न रहनेवाले, मूर्ख तथा दयाहीन लोग रहते हों, वहाँपर तुम प्रवेश करो। घर और घरकी चहारदीवारीको तोड़नेवाली अर्थात् घरकी मान-मर्यादाको भंग करनेवाली, दुःशीलताके कारण किसी भी प्रकार प्रसन्न न होनेवाली गृहिणी जिस घरमें हो, उस घरमें प्रसन्न मनसे सदा निवास करो जहाँ काँटेदार वृक्ष हों, जहाँ निष्याव (सेम आदि) की लता हो और जहाँ पलाशका वृक्ष हो, वहाँ तुम अपनी पत्नीसहित निवास करो। जिनके घरोंमें अगस्त्य, आक आदि दूधवाले वृक्ष, बन्धुजीव (गुलदुपहरिया) का पौधा, विशेषरूपसे करवीर, नन्द्यावर्त (तगर) और मल्लिकाके वृक्ष हों, उनके घरोंमें तुम पत्नीके साथ प्रवेश करो। जिस घरमें अपराजिता, अजमोदा, निम्ब, जटामांसी, बहुला (नीलका पौधा), केलेके वृक्ष हों, वहाँपर तुम सपत्नीक प्रवेश करो। जहाँ ताल, तमाल, भल्लात (भिलावा), इमली, कदम्ब और खैरके वृक्ष हों, वहाँ तुम अपनी भार्याके साथ प्रवेश करो। जिनके घरोंमें बरगद, पीपल, आम, गूलर तथा कटहलके वृक्ष हों, उनके यहाँ तुम अपनी भार्याके साथ निवास करो। जिसके निम्बवृक्षमें, बगीचेमें अथवा घरमें कौवोंका निवास हो और जिसके घरमें दण्डधारिणी तथा कपालधारिणी स्त्री हो, उसके यहाँ तुम पत्नीसहित निवास करो ॥ ४४-५१ ॥
दण्डिनी मुण्डिनी वापि सभार्यस्त्वं समाविश।
एका दासी गृहे यत्र त्रिगवं पञ्चमाहिषम्॥५२
षडश्वं सप्तमातङ्ग सभार्यस्त्वं समाविश।
यस्य काली गृहे देवी प्रेतरूपा च डाकिनी ॥ ५३
क्षेत्रपालोऽथ वा यत्र सभार्यस्त्वं समाविश।
भिक्षुविम्बं च वै यस्य गृहे क्षपणकं तथा ॥ ५४
बौद्धं वा बिम्बमासाद्य तत्र पूर्ण समाविश।
शयनासनकालेषु भोजनाटनवृत्तिषु ॥ ५५
येषां वदति नो वाणी नामानि च हरेः सदा।
तद्गृहं ते समाख्यातं सभार्यस्य निवेशितुम् ॥ ५६
जिस घरमें एक दासी, तीन गायें, पाँच भैंसे, छ: घोड़े और सात हाथी हों, वहाँ तुम अपनी भार्यासहित प्रवेश करो। जिस घरमें प्रेतरूपा तथा डाकिनी काली- प्रतिमा स्थापित हो और जहाँ भैरव-मूर्ति हो, वहाँ तुम अपनी पत्नीके साथ प्रवेश करो। जिस घरमें भिक्षुबिम्ब आदि हो, वहाँ तुम यथेच्छ निवास करो। सोने, बैठने, भोजन तथा भ्रमणके समयोंमें जिनकी वाणी (जिह्वा) सदा भगवान् श्रीहरिके नामोंका उच्चारण नहीं करती, उनका घर सपत्नीक तुम्हारे निवास करनेके लिये मैं बता रहा हूँ॥ ५२-५६॥
पाषण्डाचारनिरताः श्रौतस्मार्तबहिष्कृताः ।
विष्णुभक्तिविनिर्मुक्ता महादेवविनिन्दकाः ॥ ५७
नास्तिकाश्च शठा यत्र सभार्यस्त्वं समाविश।
सर्वस्मादधिकत्वं ये न वदन्ति पिनाकिनः ॥ ५८
साधारणं स्मरन्त्येनं सभार्यस्त्वं समाविश।
ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शक्रः सर्वसुरेश्वरः ॥ ५९
रुद्रप्रसादजाश्चेति न वदन्ति दुरात्मकाः ।
ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शक्रश्च सम एव च ।। ६०
वदन्ति मूढाः खद्योतं भानुं वा मूढचेतसः ।
तेषां गृहे तथा क्षेत्रे आवासे वा सदानया ॥ ६१
विश भुङ्क्ष्व गृहं तेषां अपि पूर्णमनन्यधीः ।
येऽश्नन्ति केवलं मूढाः पक्वमन्नं विचेतसः ॥ ६२
स्नानमङ्गलहीनाश्च तेषां त्वं गृहमाविश।
या नारी शौचविभ्रष्टा देहसंस्कारवर्जिता ॥ ६३
जहाँ दम्भपूर्ण आचारमें निरत रहनेवाले, श्रुति तथा स्मृतिसे विमुख रहनेवाले, विष्णुभक्तिसे विहीन, महादेवकी निन्दा करनेवाले, नास्तिक तथा शठ लोग हों, वहाँपर तुम पत्नीसहित निवास करो जो लोग भगवान् शिवको सबसे श्रेष्ठ नहीं कहते हैं और इन्हें साधारण समझते हैं, उनके यहाँ तुम भार्यासहित निवास करो। कलुषित मनवाले जो लोग 'ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा सभी देवताओंके स्वामी इन्द्र-ये रुद्रके प्रसादसे आविर्भूत हैं' ऐसा नहीं कहते हैं और ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्रको इनके समान कहते हैं; साथ ही जो मूढ़ तथा अज्ञानी लोग सूर्यको खद्योत कहते हैं- उनके गृह, क्षेत्र तथा आवासमें तुम सदा इसके साथ निवास करो और पूर्ण रूपसे अनन्यबुद्धि होकर उनके घरमें भोग करो जो मूर्ख तथा अज्ञानी लोग अकेले ही पका हुआ अन्न खाते हैं और स्नान आदि मंगलकार्योंसे विहीन रहते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो। जो स्त्री शौचाचारसे विमुख हो, देहशुद्धिसे रहित हो तथा सभी [भक्ष्याभक्ष्य] पदार्थोंके भक्षणमें तत्पर रहती हो, उसके घरमें तुम नित्य निवास करो॥ ५७-६३ ॥
सर्वभक्षरता नित्यं तस्याः स्थाने समाविश।
मलिनास्याः स्वयं मर्त्या मलिनाम्बरधारिणः ।। ६४
मलदन्ता गृहस्थाश्च गृहं तेषां समाविश।
पादशौचविनिर्मुक्ताः सन्ध्याकाले च शायिनः ।। ६५
सन्ध्यायामश्नुते ये वै गृहं तेषां समाविश।
अत्याशनरता मत्यां अतिपानरता नराः ॥ ६६
द्यूतवादक्रियामूढाः गृहं तेषां समाविश।
ब्रह्मस्वहारिणो ये चायोग्यांश्चैव यजन्ति वा ॥ ६७
शूद्रान्नभोजिनो वापि गृहं तेषां समाविश।
मद्यपानरताः पापा मांसभक्षणतत्पराः ॥ ६८
जो गृहस्थ मानव स्वयं मलिन मुखवाले, गारं वस्त्र धारण करनेवाले तथा मलयुक्त दाँतोंवाले हैं उनके घरमें तुम प्रवेश करो। जो लोग अपना पर नहीं धोते, सन्ध्याके समय शयन करते हैं और सन्ध्यावेलामें भोजन करते हैं, उनके घरमें तुम निवास करो। जो मूर्ख मनुष्य बहुत भोजन करते हैं, अत्यधिक पान करते हैं और जुआ-सम्बन्धी वार्ता करने तथा उसके खेलनेमें तत्पर रहते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो जो लोग ब्राह्मणके धनका हरण करते हैं, अपात्रोंका पूजन करते हैं और शूद्रोंका अन्न खाते हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो। जो मनुष्य मद्यपानमें संलग्न रहते हैं, पापपरायण हैं, मांस भक्षणमें तत्पर रहते हैं और परायी स्त्रियोंमें आसक्त रहते हैं, उनके घरमें तुम निवास करो ॥ ६४-६८ ॥
परदाररता मां गृहं तेषां समाविश।
पर्वण्यनर्चाभिरता मैथुने वा दिवा रताः ॥ ६९
सन्ध्यायां मैथुनं येषां गृहं तेषां समाविश।
पृष्ठतो मैथुनं येषां श्वानवत् मृगवच्च वा ॥ ७०
जले वा मैथुनं कुर्यात्सभार्यस्त्वं समाविश।
रजस्वलां स्त्रियं गच्छेच्चाण्डालीं वा नराधमः ॥ ७१
कन्यां वा गोगृहे वापि गृहं तेषां समाविश।
बहुना किं प्रलापेन नित्यकर्मबहिष्कृताः ॥ ७२
रुद्रभक्तिविहीना ये गृहं तेषां समाविश।
शृङ्गैर्दिव्यौषधैः क्षुद्रैः शेफ आलिप्य गच्छति ॥ ७३
भगद्रावं करोत्यस्मात्सभार्यस्त्वं समाविश।
जो लोग पर्वके अवसरपर भगवान्की पूजामें संलग्न नहीं रहते, दिनमें तथा सन्ध्याके समय मैथुन करते हैं, उनके घरमें तुम निवास करो। जो लोग कुत्ते तथा मृगकी भाँति पीछेसे मैथुन करते हैं और जलमें मैथुन करते हैं, उनके यहाँ अपनी भार्यासहित तुम निवास करो। जो नराधम रजस्वला स्त्रीके साथ अथवा चाण्डालीके साथ अथवा कन्याके साथ अथवा गोशालामें सम्भोग करता है; उसके घरमें तुम निवास करो। अधिक कहनेसे क्या लाभ ! जो लोग नित्यकर्मसे विमुख तथा रुद्रभक्तिसे रहित हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश करो। कृत्रिम साधनोंसे सम्पन्न होकर जो मनुष्य स्त्रीके पास जाता है और स्त्रीसंसर्ग करता है, उसके यहाँ तुम अपनी भार्यासहित प्रवेश करो ॥ ६९-७३ ॥
सूत उवाच
इत्युक्त्वा स मुनिः श्रीमान्निर्मार्ज्य नयने तदा ।। ७४
ब्रह्मर्षिर्ब्रह्मसङ्काशस्तत्रैवान्तद्धिमातनोत् ।
दुःसहश्च तथोक्तानि स्थानानि च समीयिवान् ॥ ७५
विशेषाद्देवदेवस्य विष्णोर्निन्दारतात्मनाम् ।
सभायाँ मुनिशार्दूलः सैषा ज्येष्ठा इति स्मृता ।। ७६
दुःसहस्तामुवाचेदं तडागाश्रममन्तरे।
आस्व त्वमत्र चाहे वै प्रवेक्ष्यामि रसातलम् ॥ ७७
आवयोः स्थानमालोक्य निवासार्थ ततः पुनः ।
आगमिष्यामि ते पार्श्वमित्युक्ता तमुवाच सा ।। ७८
किमश्नामि महाभाग को मे दास्यति वै बलिम्।
इत्युक्तस्तां मुनिः प्राह याः स्त्रियस्त्वां यजन्ति वै ॥ ७९
सूतजी बोले-ऐसा कहकर वे ऐश्वर्यशाली तथा ब्रह्मतुल्य ब्रह्मर्षि [मार्कण्डेय] मुनि अपने नेत्र धोकर वहींपर अन्तर्धान हो गये। तत्पश्चात् [ मार्कण्डेयऋषिके द्वारा] बताये गये स्थानों, विशेष करके देवोंके भी देव विष्णुकी निन्दामें लगे रहनेवाले लोगोंके यहाँ वे मुनिश्रेष्ठ दुःसह अपनी भार्यासहित पहुँचे। किसी समय [एक तड़ाग देखकर] दुःसहमुनिने ये जो ज्येष्ठा नामसे कही गयी हैं, उनसे यह कहा- तुम इस तड़ागके तटपर आश्रममें स्थित पीपलवृक्षमें रहो; मैं रसातलमें प्रवेश करूँगा। अपने दोनोंके निवासयोग्य स्थान देखकर मैं तुम्हारे पास पुनः आ जाऊँगा। उनके ऐसा कहनेपर उस (ज्येष्ठा) ने उनसे कहा-है महाभाग। मैं क्या खाऊँगी; मुझे कौन बलि प्रदान करेगा ? उसके ऐसा कहनेपर मुनिने उससे कहा-जो स्त्रियाँ बलियों (भोज्यपदार्थों) तथा पुष्प-धूपसे तुम्हारा पूजन करती हैं, उनके घरमें तुम प्रवेश मत करना ॥ ७४-७९॥
बलिभिः पुष्पधूपैश्च न तासां च गृहं विश।
इत्युक्त्वा त्वाविशत्तत्र पातालं बिलयोगतः ॥ ८०
अद्यापि च विनिर्मग्नो मुनिः स जलसंस्तरे।
ग्रामपर्वतबाह्येषु नित्यमास्तेऽशुभा पुनः ॥ ८१
प्रसङ्गाद्देवदेवेशो विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः ।
लक्ष्म्या दृष्टस्तया लक्ष्मीः सा तमाह जनार्दनम् ॥ ८२
भर्ता गतो महाबाहो बिलं त्यक्त्वा स मां प्रभो।
अनाथाहं जगन्नाथ वृत्तिं देहि नमोऽस्तु ते ॥ ८३
सूत उवाच
इत्युक्तो भगवान् विष्णुः प्रहस्याह जनार्दनः ।
ज्येष्ठामलक्ष्मीं देवेशो माधवो मधुसूदनः ॥ ८४
श्रीविष्णुरुवाच
ये रुद्रमनधं शर्वं शङ्करं नीललोहितम् ।
अम्बां हैमवतीं वापि जनित्रीं जगतामपि ॥ ८५
मद्भक्तान्निन्दयन्त्यत्र तेषां वित्तं तवैव हि।
येऽपि चैव महादेवं विनिन्हौव यजन्ति माम् ॥ ८६
मूढा ह्यभाग्या मद्भक्ता अपि तेषां धनं तव।
यस्याज्ञया ह्यहं ब्रह्मा प्रसादाद्वर्तते सदा ॥ ८७
ये यजन्ति विनिन्हचैव मम विद्वेषकारकाः ।
मद्भक्ता नैव ते भक्ता इव वर्तन्ति दुर्मदाः ॥ ८८
ऐसा कहकर वे बिल मार्गसे पातालमें प्रविष्ट हुए। वे मुनि आज भी उस जलसंस्तरमें निमग्न हैं और वह अशुभा अलक्ष्मी ग्राम, पर्वत आदि बाह्य स्थानोंमें रह रही है संयोगवश किसी समय उस अलक्ष्मीने देवोंके भी देवेश तथा तीनों लोकोंके स्वामी विष्णुको लक्ष्मीके साथ देख लिया; तब अलक्ष्मीने उन जनार्दनसे कहा- हे प्रभो! हे महाबाहो ! मेरे पति मुझे छोड़कर इस बिलमें प्रविष्ट हो गये हैं। हे जगन्नाथ! मैं अनाथ हूँ, अतः आप मुझे आजीविका प्रदान करें, आपको नमस्कार है सूतजी बोले- [ज्येष्ठाके द्वारा] ऐसा कहे गये जनार्दन, देवेश्वर, माधव तथा मधुसूदन भगवान् विष्णु उस ज्येष्ठा अलक्ष्मीसे हँसकर कहने लगे श्रीविष्णु बोले- जो लोग अनघ, शर्व, शंकर, नीललोहित भगवान् रुद्र तथा [समस्त] लोकोंको उत्पन्न करनेवाली माता पार्वतीकी और मेरे भक्तोंकी निन्दा करते हैं, उनका धन तुम्हारा ही है। जो लोग महादेवकी निन्दा करके मेरा पूजन करते हैं, मेरे वे भक्त निश्चय ही अज्ञानी तथा अभागे हैं; उनका भी धन तुम्हारा है। जिनकी आज्ञासे तथा कृपासे मैं (विष्णु) तथा ब्रह्मा सदा क्रियाशील रहते हैं, उनका तिरस्कार करके जो लोग मेरा पूजन करते हैं, वे मेरे विद्वेषी हैं; वे मेरे भक्त बिलकुल नहीं हैं, अपितु वे मदोन्मत्त हैं और मेरा भक्त होनेका पाखण्ड करते हैं, उनका भौ घर, धन, खेत तथा इष्टापूर्त (यज्ञ आदि तथा तालाब, कुआँ खुदवानेका पुण्य कार्य) सब कुछ तुम्हारा है ॥ ८०-८८ ॥
तेषां गृहं धनं क्षेत्रमिष्टापूर्तं तवैव हि।
सूत उवाच
इत्युक्त्वा तां परित्यज्य लक्ष्म्यालक्ष्मी जनार्दनः ।। ८९
जजाप भगवान् रुद्रमलक्ष्मीक्षयसिद्धये।
तस्मात्प्रदेयस्तस्यै च बलिर्नित्यं मुनीश्वराः ॥ ९०
विष्णुभक्तैर्न सन्देहः सर्वयत्नेन सर्वदा।
अङ्गनाभिः सदा पूज्या बलिभिर्विविधैर्द्विजाः ॥ ९१
यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् ।
अलक्ष्मीवृत्तमनघो लक्ष्मीवॉल्लभते गतिम् ॥ ९२
सूतजी बोले- ऐसा कहकर उन अलक्ष्मीको विदा करके भगवान् जनार्दन अलक्ष्मीके क्षयकी सिद्धिके लिये लक्ष्मीके साथ रुद्रका जप करने लगे। अतः हे मुनीश्वरी। सभी विष्णुभक्तोंको चाहिये कि वे पूर्ण प्रयत्नसे उस अलक्ष्मीको नित्य-निरन्तर बलि प्रदान करें; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। हे द्विजो! सभी स्त्रियोंको अनेक प्रकारके बलि-उपचारोंसे सदा [ज्येष्ठा-अलक्ष्मीकी] पूजा करनी चाहिये जो [मनुष्य] इस अलक्ष्मी-वृत्तान्तको पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है, वह पापरहित तथा लक्ष्मीवान् हो जाता है और [शुभ] गति प्राप्त करता है॥ ८९-९२ ॥
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे अलक्ष्मीवृत्तं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'अलक्ष्मीवृत्त' नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥
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