श्रीलिङ्गमहापुराण लिंग पुराण [ उत्तरभाग ] पाँचवाँ अध्याय
विष्णु भक्त राजर्षि अम्बरीषका आख्यान, विष्णु माया द्वारा नारद एवं पर्वत मुनि का वानर मुख होना तथा इसीका रामावतार में हेतु बनना
ऋषय ऊचुः
ऐक्ष्वाकुरम्बरीषो वै वासुदेवपरायणः ।
पालयामास पृथिवीं विष्णोराज्ञापुरःसरः ॥ १
श्रुतमेतन्महाबुद्धे त्तत्सर्वं वक्तुमर्हसि।
नित्यं तस्य हरेश्चक्रं शत्रुरोगभयादिकम् ॥ २
हन्तीति श्रूयते लोके धार्मिकस्य महात्मनः ।
अम्बरीषस्य चरितं तत्सर्वं ब्रूहि सत्तम ॥ ३
माहात्म्यमनुभावं च भक्तियोगमनुत्तमम् ।
यथावच्छ्रोतुमिच्छामः सूत वक्तुं त्वमर्हसि ॥ ४
ऋषिगण बोले- इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न विष्णुभक्त [राजा] अम्बरीष भगवान् विष्णुकी आज्ञाके अनुसार पृथ्वीका पालन करते थे यह हमने सुना है; हे महाबुद्धे। उनके विषयमें आप सब कुछ बताइये। लोकमें ऐसा सुना जाता है कि भगवान् श्रीहरिका सुदर्शन चक्र उनके शत्रु, रोग, भय आदिका सदा श किया करता था। अतः हे श्रेष्ठ। आप उन धार्मिक तथा महात्मा अम्बरीषके उस सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन कोरिये। हे सूत । हम उनके माहात्म्य, अनुभाव तथा श्रेष्ठ भक्तियोगको यथार्थतः सुनना चाहते हैं, आप हरे बतायें ॥ १-४ ॥
सूत उवाच
श्रूयतां मुनिशार्दूलाश्चरितं तस्य धीमतः ।
अम्बरीषस्य माहात्म्यं सर्वपापहरं परम् ॥ ५
सूतजी बोले- है मुनीन्द्रो ! उन बुद्धिमत अम्बरीषके श्रेष्ठ चरित्र तथा माहात्म्यको आपलोग सुनें, जो सम्पूर्ण पापोंका नाश कर देनेवाला है॥५॥
त्रिशङ्कोर्दयिता भार्या सर्वलक्षणशोभिता।
अम्बरीषस्य जननी नित्यं शौचसमन्विता ॥ ६
योगनिद्रासमारूढं शेषपर्यङ्कशायिनम् ।
नारायणं महात्मानं ब्रह्माण्डकमलोद्भवम् ॥ ७
तमसा कालरुद्राख्यं रजसा कनकाण्डजम्।
सत्त्वेन सर्वगं विष्णुं सर्वदेवनमस्कृतम् ॥ ८
अर्चयामास सततं वाड्मनःकायकर्मभिः ।
माल्यदानादिकं सर्वं स्वयमेवमचीकरत् ॥ ९
गन्धादिपेषणं चैव धूपद्रव्यादिकं तथा।
भूमेरालेपनादीनि हविर्घा पचनं तथा ॥ १०
तत्कौतुकसमाविष्टा स्वयमेव चकार सा।
शुभा पद्मावती नित्यं वाचा नारायणेति वै ॥ ११
अनन्तेत्येव सा नित्यं भाषमाणा पतिव्रता।
दशवर्षसहस्त्राणि तत्परेणान्तरात्मना ।॥ १२
अर्चयामास गोविन्दं गन्धपुष्यादिभिः शुचिः ।
विष्णुभक्तान् महाभागान् सर्वपापविवर्जितान् ॥ १३
त्रिशंकुकी प्रिय भार्या तथा अम्बरीषकी माता, जो समस्त शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थीं, नित्य [स्नान आदिसे] शुद्ध होकर योगनिद्रामें लीन रहनेवाले, शेषशय्यापर शयन करनेवाले, ब्रह्माण्डरूपी कमलका प्रादुर्भाव करनेवाले, तमोगुणसे युक्त होनेपर कालरुद्ररूर रजोगुणसे युक्त होनेपर हिरण्यगर्भ ब्रह्मारूप और सत्त्वगुणसे युक्त होनेपर सर्वव्यापी तथा सभी देवोंसे नमस्कृत साक्षात् महात्मा नारायण विष्णुकी निरन्तर मन-वाणी- कर्मसे अर्चना करती थीं। माल्य, दान आदि सब कुछ वे स्वयं करती थीं। चन्दन आदि द्रव्योंका घिसना, धूप- दीप आदि, भूमिका लेपन आदि, हवि द्रव्यको पकाना- ये सब कार्य वे स्वयं सम्पन्न करती थीं। वे कल्याणमयी तथा पतिव्रता रानी पद्मावती प्रतिदिन वाणीसे 'नारायण' और 'अनन्त' ऐसा निरन्तर उच्चारण करती हुई उन्हों परमात्मामें संलग्न मनसे दस हजार वर्षोंतक शुद्धतापूर्वक गन्ध, पुष्प आदि उपचारोंसे गोविन्दका पूजन किया करती थीं। वे सब प्रकारके पापोंसे रहित महाभाग विष्णुभक्तोंको दान, मान, पूजन तथा धनोंसे नित्य सन्तुष्ट रखती थीं ॥ ६-१३ ॥
दानमानार्चनैर्नित्यं धनरत्नैरतोषयत् ।
ततः कदाचित्सा देवी द्वादशीं समुपोष्य वै ॥ १४
हरेरग्रे महाभागा सुष्वाप पतिना सह।
तत्र नारायणो देवस्तामाह पुरुषोत्तमः ।। १५
किमिच्छसि वरं भद्रे मत्तस्त्वं ब्रूहि भामिनि।
सा दृष्ट्वा तु वरं वने पुत्रो मे वैष्णवो भवेत् ॥ १६
सार्वभौमो महातेजाः स्वकर्मनिरतः शुचिः ।
तथेत्युक्त्वा ददौ तस्यै फलमेकं जनार्दनः ॥ १७
तदनन्तर किसी समय वे महाभागा देवी द्वादशीका व्रत करके पतिके साथ भगवान् श्रीहरिके [विग्रहके] सम्मुख सो गयीं। वहाँ पर [स्वप्नमें] पुरुषोत्तम नारायणने उनसे कहा-हे भद्रे ! क्या चाहती हो ? हे भामिनि ! तुम मुझसे वर माँग लो तब भगवान्को देखकर उन्होंने यह वर माँगा- मुझे विष्णुभक्त, चक्रवर्ती सम्राटु, महातेजस्वी, अपने कार्यमें तत्पर रहनेवाला और पवित्र मनवाला पुत्र उत्पन्न हो। तब 'वैसा ही होगा'- यह कहकर जनार्दनने उन्हें एक फल प्रदान किया ॥ १४-१७॥
सा प्रबुद्धा फलं दृष्ट्वा भर्ने सर्व न्यवेदयत् ।
भक्षयामास संहृष्टा फलं तद्गतमानसा ॥ १८
ततः कालेन सा देवी पुत्रं कुलविवर्धनम्।
असूत सा सदाचारं वासुदेवपरायणम् ॥ १९
शुभलक्षणसम्पन्नं चक्राङ्किततनूरुहम्।
जातं दृष्ट्वा पिता पुत्रं क्रियाः सर्वाश्चकार वै ॥ २०
अम्बरीष इति ख्यातो लोके समभवत्प्रभुः ।
पितर्युपरते श्रीमानभिषिक्तो महामुनिः ॥ २१
मन्त्रिष्वाधाय राज्यं च तप उग्रं चकार सः।
संवत्सरसहस्त्रं वै जपन्नारायणं प्रभुम् ॥ २२
हृत्पुण्डरीकमध्यस्थं सूर्यमण्डलमध्यतः ।
शङ्खचक्रगदापद्य धारयन्तं चतुर्भुजम् ॥ २३
शुद्धजाम्बूनदनिभं ब्रह्मविष्णुशिवात्मकम् ।
सर्वाभरणसंयुक्तं पीताम्बरधरं प्रभुम् ॥ २४
तदनन्तर वे जग गयीं और उस फलको देखकर उन्होंने सारी बात अपने पतिसे कही। इसके बाद उन्हीं प्रभुमें संलग्न चित्तवाली उन्होंने प्रसन्न होकर वह फल खा लिया तत्पश्चात् समय आनेपर उन देवीने कुलकी वृद्धि करनेवाले, सदाचारी, वासुदेवपरायण, शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा चक्रांकित केशोंवाले पुत्रको जन्म दिया। पुत्र उत्पन्न हुआ देखकर पिता [त्रिशंकु] ने उसके सभी [जातकर्म आदि संस्कार किये वह ऐश्वर्यशाली बालक अम्बरीष इस नामसे लोकमें विख्यात हुआ। पिताकी मृत्यु हो जानेपर उस शोभासम्पन्न महात्मा अम्बरीषका अभिषेक किया गया। तत्पश्चात् मन्त्रियोंको राज्य सौंपकर उन्होंने हृदयकमलके मध्यमें विराजमान, सूर्यमण्डलके मध्यमें स्थित, शंख- चक्र-गदा-पद्म धारण करनेवाले, चतुर्भुज, विशुद्ध सुवर्णक सदृश कान्तिवाले, ब्रह्मा-विष्णु-शिवरूप, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, पीताम्बर धारण करनेवाले, वक्षःस्थलपर श्रीवत्स चिह्न धारण करनेवाले, परम पुरुष तथा पुरुषोंमें श्रेष्ठ भगवान् नारायणका जप करते हुए पूरे एक हजार वर्षतक कठोर तप किया ॥ १८-२४ ॥
श्रीवत्सवक्षसं देवं पुरुषं पुरुषोत्तमम् ।
ततो गरुडमारुह्य सर्वदेवैरभिष्टुतः ॥ २५
आजगाम स विश्वात्मा सर्वलोकनमस्कृतः ।
ऐरावतमिवाचिन्त्यं कृत्वा वै गरुडं हरिः ॥ २६
स्वयं शक्र इवासीनस्तमाह नृपसत्तमम्।
इन्द्रोऽहमस्मि भद्रं ते किं ददामि वरं च ते ॥ २७
सर्वलोकेश्वरोऽहं त्वां रक्षितुं समुपागतः ।
अम्बरीष उवाच
नाहं त्वामभिसन्धाय तप आस्थितवानिह ॥ २८
त्वया दत्तं च नेष्यामि गच्छ शक्र यथासुखम् ।
मम नारायणो नाथस्तन्नमामि जगत्पतिम् ॥ २९
तब सभी देवताओंसे स्तुत तथा सभी लोकोंसे नमस्कृत होनेवाले वे विश्वात्मा गरुड़पर आरूढ़ होकर वहाँ आ गये। उन श्रीहरिने गरुड़को अद्भुत ऐरावतके रूपमें करके स्वयं इन्द्रका रूप धारणकर उसपर आसीन हो उन नृपश्रेष्ठसे कहा- 'मैं इन्द्र हूँ, आपका कल्याण हो; मैं आपको कौन-सा वर प्रदान करूँ? सभी लोकोंका ईश्वर मैं आपकी रक्षा करनेके लिये आपके पास आया हूँ अम्बरीषजी बोले- आपको उद्देश्य करके मैंने यह तप नहीं किया है। हे शक्र! आपके द्वारा प्रदत्त वर मैं नहीं चाहता; अतः आप सुखपूर्वक लौट जाइये। मेरे स्वामी तो नारायण हैं; मैं उन्हीं जगत्पतिको नमस्कार करता हूँ। हे इन्द्र। आप चले जाइये, मेरी बुद्धिको भ्रमित मह कीजिये ॥ २८-२९ ॥
गच्छेन्द्र मा कृथास्त्वत्र मम बुद्धिविलोपनम् ।
ततः प्रहस्य भगवान् स्वरूपमकरोद्धरिः ॥ ३०
शार्ङ्गचक्रगदापाणिः खड्गहस्तो जनार्दनः ।
गरुडोपरि सर्वात्मा नीलाचल इवापरः ॥ ३१
देवगन्धर्वसङ्गैश्च स्तूयमानः समन्ततः ।
प्रणम्य स च सन्तुष्टस्तुष्टाव गरुडध्वजम् ॥ ३२
प्रसीद लोकनाथेश मम नाथ जनार्दन।
कृष्ण विष्णो जगन्नाथ सर्वलोकनमस्कृत ॥ ३३
त्वमादिस्त्वमनादिस्त्वमनन्तः पुरुषः प्रभुः ।
अप्रमेयो विभुर्विष्णुर्गोविन्दः कमलेक्षणः ॥ ३४
महेश्वराङ्गजो मध्ये पुष्करः खगमः खगः।
कव्यवाहः कपाली त्वं हव्यवाहः प्रभञ्जनः ।। ३५
आदिदेवः क्रियानन्दः परमात्मात्मनि स्थितः ।
त्वां प्रपन्नोऽस्मि गोविन्द जय देवकिनन्दन।
जय देव जगन्नाथ पाहि मां पुष्करेक्षण ॥ ३६
नान्या गतिस्त्वदन्या मे त्वमेव शरणं मम।
तब [इन्द्ररूपधारी] भगवान् विष्णुने हँसकर अपना रूप प्रकट कर दिया। वे सर्वात्मा जनार्दन हाथमें शाङ्ग नामक धनुष-चक्र-गदा-खड्ग लिये हुए थे, गरुड़पर आरूढ़ थे और दूसरे नीलपर्वतकी भाँति सुशोभित हो रहे थे। देवताओं तथा गन्धर्वोके समूह सभी ओरसे उनकी स्तुति कर रहे थे तब प्रसन्नताको प्राप्त वे [अम्बरीष] उर गरुड़ध्वजको प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे- हे लोकनाथ। हे ईश। हे मेरे नाथ! हे जनार्दन! हे कृष्ण! हे विष्णो! हे जगन्नाथ। हे सर्वलोकनमस्कृत ! [मुझपर] प्रसन्न होइये। आप आदि हैं और आदिरहित भी हैं। आप अनन्त, परम पुरुष, प्रभुतासम्पन्न, अपरिमित, सर्वोपरि, विष्णु, गोविन्द, कमलके समान नेत्रोंवाले, महेश्वरके अंगसे आविर्भूत, नाभिसे कमलकी उत्पत्ति करनेवाले, हृदयाकाशमें योगियोंके द्वारा प्राप्त होनेवाले, खगरूप, कव्यवाह तथा भैरवरूप हैं। आप हव्यवाह, प्रभंजन, आदिदेव, क्रियानन्द, परमात्मा तथा स्वयंमें स्थित हैं। हे गोविन्द ! मैं आपके शरणागत हूँ। हे देवकीनन्दन ! आपकी जय हो। हे देव। है जगन्नाथ। आपकी जय हो। हे कमलनयन! मेरी रक्षा कीजिये: आपके अतिरिक्त मेरी दूसरी गति नहीं है; आप ही मेरे शरणदाता हैं॥ ३०-३६ ॥
सूत उवाच
तमाह भगवान् विष्णुः किं ते हृदि चिकीर्षितम् ॥ ३७
तत्सर्वं ते प्रदास्यामि भक्तोऽसि मम सुव्रत।
भक्तिप्रियोऽहं सततं तस्माद्दातुमिहागतः ।। ३८
अम्बरीष उवाच
लोकनाथ परानन्द नित्यं मे वर्तते मतिः ।
वासुदेवपरो नित्यं वाङ्मनः कायकर्मभिः ॥ ३९
यथा त्वं देवदेवस्य भवस्य परमात्मनः ।
तथा भवाम्यहं विष्णो तव देव जनार्दन ॥ ४०
पालयिष्यामि पृथिवीं कृत्वा वै वैष्णवं जगत्।
यज्ञहोमार्चनैश्चैव तर्पयामि सुरोत्तमान् ॥ ४१
वैष्णवान् पालयिष्यामि निहनिष्यामि शात्रवान् ।
लोकतापभये भीत इति मे धीयते मतिः ॥ ४२
सूतजी बोले- भगवान् विष्णुने उनसे कहा- आपके मनमें कौन-सी अभिलाषा है; वह सब मैं आपको दूँगा। हे सुव्रत! आप मेरे भक्त हैं, मुझे भक्ति प्रिय है, अतः आपको वर प्रदान करनेके लिये मैं यहाँ आया हूँ अम्बरीषजी बोले- हे लोकनाथ ! हे परानन्द ! मेरी सदा यही अभिलाषा रहती है कि मैं मन, वाणी तथा कर्मसे नित्य वासुदेवमें लीन रहूँ। हे विष्णो ! हे देव! हे जनार्दन । जैसे आप देवाधिदेव परमात्मा शिवके [भक्त] हैं, वैसे ही मैं आपका [भक्त] हो जाऊँ। मैं [सम्पूर्ण] जगत्को विष्णुभक्त बनाकर पृथ्वीका पालन करूँगा, यज्ञ-हवन अर्चन आदिके द्वारा श्रेष्ठ देवताओंको तृप्त करूँगा, वैष्णवजनोंका पालन-पोषण करूँगा और शत्रुओंका संहार करूँगा, प्राणियोंको संताप देनेसे मैं भयभीत रहूँ मेरी मति ऐसी भावनाको धारण करे ॥ ३७-४२ ॥
श्रीभगवानुवाच
एवमस्तु यथेच्छं वै चक्रमेतत्सुदर्शनम् ।
पुरा रुद्रप्रसादेन लब्धं वै दुर्लभं मया ॥ ४३
ऋषिशापादिकं दुःखं शत्रुरोगादिकं तथा।
निहनिष्यति ते नित्यमित्युक्त्वान्तरधीयत ।। ४४
सूत उवाच
ततः प्रणम्य मुदितो राजा नारायणं प्रभुम्।
प्रविश्य नगरीं रम्यामयोध्यां पर्यपालयत् ॥ ४५
ब्राह्मणादींश्च वर्णाश्च स्वस्वकर्मण्ययोजयत्।
नारायणपरो नित्यं विष्णुभक्तानकल्मषान् ॥ ४६
पालयामास हृष्टात्मा विशेषेण जनाधिपः।
अश्वमेधशतैरिष्ट्वा वाजपेयशतेन च ॥ ४७
श्रीभगवान् बोले- 'जैसी आपकी इच्छा है, वैसा ही होगा। प्राचीनकालमें मैंने भगवान् रुद्रकी कृपासे यह दुर्लभ सुदर्शन चक्र प्राप्त किया है। यह आपके ऋषिशाप, दुःख, शत्रु, रोग आदिका सदा नाश करेगा'- ऐसा कहकर वे अन्तर्धान हो गये सूतजी बोले- तदनन्तर भगवान् नारायणको प्रणाम करके आनन्दसे युक्त राजा [अम्बरीष] रम्य अयोध्या नगरीमें प्रवेश करके प्रजापालन करने लगे। नारायणमें तत्पर रहनेवाले उन राजाने ब्राह्मण आदि वर्णोंको अपने-अपने कर्ममें लगाया। वे राजा अम्बरीष प्रसन्नचित्त होकर विशेष रूपसे निष्याप विष्णुभक्तोंका पालन करने लगे। एक सौ अश्वमेधयज्ञ तथा एक सौ वाजपेययज्ञ करके वे सागरपर्यन्त इस पृथ्वीका पालन करनेमें तत्पर हो गये ॥ ४३-४७॥
पालयामास पृथिवीं सागरावरणामिमाम्।
गृहे गृहे हरिस्तस्थौ वेदघोषो गृहे गृहे ॥ ४८
नामघोषो हरेश्चैव यज्ञघोषस्तथैव च।
अभवन्नृपशार्दूले तस्मिन् राज्यं प्रशासति ॥ ४९
नासस्या नातृणा भूमिर्न दुर्भिक्षादिभिर्युता।
रोगहीनाः प्रजा नित्यं सर्वोपद्रववर्जिताः ॥ ५०
अम्बरीषो महातेजाः पालयामास मेदिनीम्।
तस्यैवं वर्तमानस्य कन्या कमललोचना ॥ ५१
श्रीमती नाम विख्याता सर्वलक्षणसंयुता ।
प्रदानसमयं प्राप्ता देवमायेव शोभना ॥ ५२
तस्मिन् काले मुनिः श्रीमान्नारदोऽभ्यागतश्च वै।
अम्बरीषस्य राज्ञो वै पर्वतश्च महामतिः ॥ ५३
उन नृपश्रेष्ठके राज्य-शासन करते रहनेपर घर- घरमें विष्णुका विग्रह स्थापित किया गया; घर-घरमें वेद-ध्वनि, विष्णु के नामका घोष और यज्ञघोष होने लगा। भूमि फसलरहित, तृणविहीन और दुर्भिक्ष आदिसे युक्त नहीं रह गयी। सम्पूर्ण प्रजाएँ नित्य रोग तथा सभी प्रकारके विघ्नोंसे रहित हो गयीं। इस प्रकार महातेजस्वी अम्बरीष पृथ्वीका पालन करते थे इस प्रकार राज्य करते हुए उन राजाके यहाँ कमलके समान नेत्रोंवाली तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न एक कन्या उत्पन्न हुई, जो श्रीमती नामसे विख्यात हुई। देवकन्याके समान सुन्दर वह श्रीमती [कुछ दिनोंमें] कन्यादानके योग्य हो गयी। उस समय राजा अम्बरीषके यहाँ श्रीमान् नारदमुनि तथा महामति पर्वत- ये दोनों आये ॥ ४८-५३ ॥
तावुभावागतौ दृष्ट्वा प्रणिपत्य यथाविधि।
अम्बरीषो महातेजाः पूजयामास तावृषी ॥ ५४
कन्यां तां रममाणां वै मेघमध्ये शतहृदाम् ।
प्राह तां प्रेक्ष्य भगवान्नारदः सस्मितस्तदा ॥ ५५
केयं राजन् महाभागा कन्या सुरसुतोपमा।
ब्रूहि धर्मभृतां श्रेष्ठ सर्वलक्षणशोभिता ।। ५६
राजोवाच
दुहितेयं मम विभो श्रीमती नाम नामतः ।
प्रदानसमयं प्राप्ता वरमन्वेषते शुभा ॥ ५७
इत्युक्तो मुनिशार्दूलस्तामैच्छन्नारदो द्विजाः ।
पर्वतोऽपि मुनिस्तां वै चकमे मुनिसत्तमाः ॥ ५८
अनुज्ञाप्य च राजानं नारदो वाक्यमब्रवीत्।
रहस्याहूय धर्मात्मा मम देहि सुतामिमाम् ॥ ५९
उन दोनों ऋषियोंको आया हुआ देखकर उन्हें प्रणाम करके महातेजस्वी अम्बरीषने विधिपूर्वक उनका पूजन-सत्कार किया मेधमें विद्युत्के समान प्रतीत होनेवाली उम्र कन्याको क्रीड़ा करती हुई देखकर भगवान् नारदते मुसकराकर राजासे कहा- है राजन्! महाभाग्यशालिन्ने देवकन्याके सदृश तथा सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन यह बाला कौन है? हे धर्मधारियोंमें श्रेष्ठ। यह बताइये राजा बोले- हे विभो ! यह मेरी पुत्री है, जो श्रीमत नामसे प्रसिद्ध है। यह विवाह-कालको प्राप्त हो चुझे है, अतः यह सौभाग्यशालिनी वरका अन्वेषण कर रही है हे ऋषियो ! राजाके ऐसा कहनेपर मुनिश्रेष्ठ नारद उसे प्राप्त करनेकी इच्छा करने लगे और हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी तरह पर्वतमुनि भी उसे पानेकी प्रबल कामना करने लगे राजाकी अनुमति प्राप्तकर धर्मात्मा नारदने उन्हें एकान्तमें बुलाकर यह बात कही-' अपनी इस पुत्रीको मुझे दे दीजिये।' पर्वतमुनिने भी राजासे एकान्तमें वैसा ही कहा ॥ ५४-५९ ॥
पर्वतो हि तथा प्राह राजानं रहसि प्रभुः।
तावुभौ सह धर्मात्मा प्रणिपत्य भयार्दितः ॥ ६०
उभौ भवन्तौ कन्यां मे प्रार्थयानौ कथं त्वहम्।
करिष्यामि महाप्राज्ञ शृणु नारद मे वचः ॥ ६१
त्वं च पर्वत मे वाक्यं शृणु वक्ष्यामि यत्प्रभो।
कन्येयं युवयोरेकं वरयिष्यति चेच्छुभा ॥ ६२
तस्मै कन्यां प्रयच्छामि नान्यथा शक्तिरस्ति मे।
तथेत्युक्त्वा ततो भूयः श्वो यास्याव इति स्म ह।। ६३
इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलौ जग्मतुः प्रीतिमानसौ।
वासुदेवपरौ नित्यमुभौ ज्ञानविदां वरौ ॥ ६४
तब भयसे व्याकुल राजाने उन दोनोंको एक साथ प्रणाम करके कहा-आप दोनों ही मेरी कन्या की याचना कर रहे हैं: [ऐसी स्थितिमें] मैं क्या करूँ? है महाप्राज्ञ ! है नारद! आप मेरी बात सुनें और हे पर्वत ! हे प्रभो! आप भी मेरा वचन सुनें, जिसे मैं कह रहा हूँ- 'मेरी यह सौभाग्यवती पुत्री आप दोनोंमेंसे जिस एकका वरण कर लेगी, उसे मैं अपनी कन्या दे दूंगा; इसके अतिरिक्त मेरा सामर्थ्य नहीं है' 'वैसा ही हो'- यह कहनेके बाद 'हम दोनों कल पुनः आयेंगे'- यह कहकर निरन्तर भगवान् विष्णुमें अनुरक्त रहनेवाले तथा ज्ञानियोंमें अग्रणी वे दोनों मुनिश्रेष्ठ प्रसन्नचित्त होकर वहाँसे चले गये ॥ ६०-६४॥
विष्णुलोकं ततो गत्वा नारदो मुनिसत्तमः।
प्रणिपत्य हृषीकेशं वाक्यमेतदुवाच ह। ६५
श्रोतव्यमस्ति भगवन्नाथ नारायण प्रभो।
रहसि त्वां प्रवक्ष्यामि नमस्ते भुवनेश्वर ॥ ६६
तत्पश्चात् मुनिश्रेष्ठ नारदने विष्णुलोक पहुँचकर भगवान् हृषीकेशको प्रणाम करके यह वचन कहा- हे भगवन्! हे नाथ! हे नारायण। हे प्रभो! आपको कुछ सुनना है; इसे मैं आपको एकान्तमें बताऊँगा। हे भुवनेश्वर ! आपको नमस्कार है॥ ६५-६६ ॥
ततः प्रहस्य गोविन्दः सर्वांनुत्सार्य तं मुनिम्।
ब्रूहीत्याह च विश्वात्मा मुनिराह च केशवम् ॥ ६७
त्वदीयो नृपतिः श्रीमानम्बरीषो महीपतिः ।
तस्य कन्या विशालाक्षी श्रीमती नाम नामतः ॥ ६८
परिणेतुमनास्तत्र गतोऽस्मि वचनं शृणु।
पर्वतोऽयं मुनिः श्रीमांस्तव भृत्यस्तपोनिधिः ॥ ६९
तामैच्छत्सोऽपि भगवन्नावामाह जनाधिपः ।
अम्बरीषो महातेजाः कन्येयं युवयोर्वरम् ॥ ७०
लावण्ययुक्तं वृणुयाद्यदि तस्मै ददाम्यहम्।
इत्याहावां नृपस्तत्र तथेत्युक्त्वाहमागतः ॥ ७१
आगमिष्यामि ते राजन् श्वः प्रभाते गृहं त्विति।
आगतोऽहं जगन्नाथ कर्तुमर्हसि मे प्रियम् ॥ ७२
वानराननवद्भाति पर्वतस्य मुखं यथा।
तथा कुरु जगन्नाथ मम चेदिच्छसि प्रियम् ॥ ७३
तथेत्युक्त्वा स गोविन्दः प्रहस्य मधुसूदनः ।
त्वयोक्तं च करिष्यामि गच्छ सौम्य यथागतम् ।। ७४
तदनन्तर परमात्मा गोविन्द सभी लोगोंको वहाँसे हटाकर हँस करके उन मुनिसे बोले 'कहिये।' तब मुनिने केशवसे कहा- 'मेरी बात सुनिये; श्रीमान् राजा अम्बरीष आपके भक्त हैं। श्रीमती नामसे विख्यात उनकी विशाल नेत्रोंवाली पुत्री है। मैं उससे विवाह करनेका इच्छुक हूँ। मैं वहाँ गया था। मेरा वचन सुनिये। आपके भक्त तपोनिधि श्रीमान् ये जो पर्वतमुनि हैं, वे भी उसे चाहते हैं। हे भगवन्! महातेजस्वी राजा अम्बरीषने हम दोनोंसे कहा कि यह कन्या आप दोनोंमेंसे जिस सौन्दर्यसम्पन्नका पतिरूपमें वरण करेगी, उसे मैं कन्या अर्पण कर दूँगा।' जब राजाने हम दोनोंसे ऐसा कहा, तब 'ठीक है; हे राजन्। मैं आपके घर कल प्रातः काल आऊँगा' ऐसा कहकर मैं यहाँ आ गया। 'हे जगन्नाथ। अब मैं आपके पास आ गया हूँ; आप मेरा प्रिय कार्य कर दें। हे जगन्नाथ। यदि आप मेरा प्रिय करना चाहते हैं, तो जिस भी प्रकारसे पर्वतका मुख वानरके मुखके समान हो जाय, वैसा आप कर दें' तब मुसकराकर भगवान् मधुसूदनने 'ठीक है'- ऐसा कहकर [मुनि नारदसे] कहा है सौम्य ! आपने जो कहा है, उसे मैं करूंगा; अब आप जैसे आये थे, वैसे ही चले जाइये ॥ ६७-७४ ॥
एवमुक्त्वा मुनिहृष्टः प्रणिपत्य जनार्दनम्।
मन्यमानः कृतात्मानं तथायोध्यां जगाम सः ॥ ७५
गते मुनिवरे तस्मिन् पर्वतोऽपि महामुनिः।
प्रणम्य माधवं हृष्टो रहस्येनमुवाच ह ॥ ७६
वृत्तं तस्य निवेद्याग्रे नारदस्य जगत्पतेः ।
गोलाडूलमुखं यद्वन्मुखं भाति तथा कुरु ॥ ७७
तच्छ्रुत्वा भगवान् विष्णुस्त्वयोक्तं च करोमि वै।
गच्छ शीघ्रमयोध्यां वै मा वेदीर्नारदस्य वै ॥ ७८
[भगवान्के] ऐसा कहनेपर वे मुनि प्रसन्नतापूर्वक जनार्दनको प्रणाम करके अपनेको धन्य मानते हुए वहाँसे अयोध्या चले गये तत्पश्चात् उन मुनिश्रेष्ठके चले जानेपर महामुनि पर्वतने भी [वहाँ पहुँचकर] भगवान् माधवको प्रणाम करके उन [राजा अम्बरीष] का सारा वृत्तान्त उनके सम्मुख एकान्तमें कहकर उनसे प्रसन्नतापूर्वक कहा- हे जगत्पते। नारद का मुख लंगूरके मुखकी भाँति लगने लगे, वैसा आप कर दें यह सुनकर भगवान् विष्णुने कहा-' आपके द्वारा कही गयी बात मैं अवश्य करूँगा, अब आप शीघ्र ही अयोध्या जाइये; किंतु आपके साथ मेरे इस वार्तालापके विषयमें नारदसे वहाँ मत कहियेगा। तब 'ठीक है'- ऐसा कहकर वे [पर्वतमुनि] चले गये ॥ ७५ -७८॥
त्वया मे संविदं तत्र तथेत्युक्त्वा जगाम सः।
ततो राजा समाज्ञाय प्राप्तौ मुनिवरौ तदा ॥ ७९
माङ्गल्यैर्विविधैः सर्वामयोध्यां ध्वजमालिनीम्।
मण्डयामास पुष्यैश्च लाजैश्चैव समन्ततः ॥ ८०
अम्बुसिक्तगृहद्वारां सिक्तापणमहापथाम् ।
दिव्यगन्धरसोपेतां धूपितां दिव्यधूपकैः ॥ ८१
कृत्वा च नगरीं राजा मण्डयामास तां सभाम् ।
दिव्यैर्गन्धैस्तथा धूपै रत्नैश्च विविधैस्तथा ॥ ८२
अलङ्कृतां मणिस्तम्भैर्नानामाल्योपशोभिताम् ।
परार्ध्यास्तरणोपेतैर्दिव्यैर्भद्रासनैर्वृताम् ॥८३
कृत्वा नृपेन्द्रस्तां कन्यां ह्यादाय प्रविवेश ह।
सर्वाभरणसम्पन्नां श्रीरिवायतलोचनाम् ।। ८४
करसम्मितमध्याङ्गीं पञ्चस्निग्धां शुभाननाम्।
स्त्रीभिः परिवृतां दिव्यां श्रीमतीं संश्रितां तदा ॥ ८५
तदनन्तर राजाने उन दोनों मुनिवरोंको आया हुआ जानकर अनेक प्रकारके मांगलिक पदार्थों, पुष्पों तथा लाजा (लावा) आदिके द्वारा एवं ध्वजा-तोरण आदि लगवाकर चारों ओरसे सम्पूर्ण अयोध्याको सजाया। भवनोंके द्वारोंको जलसे सिक्त करके, बाजारों तथा मागौपर जलका छिड़काव कराकर, नगरीको दिव्य गन्ध, रस आदिसे युक्त तथा सुगन्धित धूपोंसे धूपित करके राजाने सम्पूर्ण अयोध्याको मण्डित किया। तदनन्तर राजाने उस स्वयंवर-सभाको विविध प्रकारके दिव्य गन्धों, धूपों तथा रत्नोंसे अलंकृत; मणिनिर्मित स्तम्भों तथा अनेकविध मालाओंसे सुशोभित एवं बहुमूल्य आस्तरणोंसे युक्त दिव्य सिंहासनोंसे आवृत करनेके पश्चात् सभी प्रकारके आभरणोंसे सुसज्जित, लक्ष्मीके समान विशाल नेत्रोंवाली, कृशोदरी, हाथ आदि पाँच अंगोंमें कोमलता धारण करनेवाली, मनोहर मुखमण्डलवाली और अनेक स्त्रियोंसे घिरी तथा संश्रित (सहारा देकर ले जायी जाती हुई) कन्या श्रीमतीको साथमें लेकर उस सभामें प्रवेश किया॥ ७९-८५॥
सभा च सा भूपपतेः समृद्धा मणिप्रवेकोत्तमरत्नचित्रा।
न्यस्तासना माल्यवती सुबद्धा तामाययुस्ते नरराजवर्गाः ॥ ८६
अथापरो ब्रह्मवरात्मजो हि त्रैविद्यविद्यो भगवान् महात्मा।
सपर्वतो ब्रह्मविदां वरिष्ठो महामुनिर्नारद आजगाम ।। ८७
तावागतौ समीक्ष्याथ राजा सम्भ्रान्तमानसः ।
दिव्यमासनमादाय पूजयामास तावुभौ ॥ ८८
उभौ देवर्षिसिद्धौ तावुभौ ज्ञानविदां वरौ।
समासीनौ महात्मानौ कन्यार्थ मुनिसत्तमौ ॥ ८९
तावुभौ प्रणिपत्याग्रे कन्यां तां श्रीमतीं शुभाम्।
सुतां कमलपत्राक्षीं प्राह राजा यशस्विनीम् ॥ ९०
अनयोर्य वरं भद्रे मनसा त्वमिहेच्छसि।
तस्मै मालामिमां देहि प्रणिपत्य यथाविधि ॥ ९१
राजा अम्बरीषको वह सभा वैभवमयी, अनेकविध श्रेष्ठ मणियों तथा रत्नोंसे चित्रित, उत्तम आसनोंसे सुशोभित, पुष्पमालाओंसे मण्डित और सुव्यवस्थित थी, उस सभामें वे राजागण आये तत्पश्चात् ब्रह्माके ज्येष्ठ पुत्र, वेदत्रयी विद्याके ज्ञात्ता, ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, ऐश्वर्यसम्पन्न तथा महान् आत्मावाले महामुनि नारद पर्वतमुनिसहित वहाँ आ गये उन दोनोंको आया हुआ देखकर व्याकुल- चित्तवाले राजाने दिव्य आसन प्रदानकर उनकी पूजा की। देवर्षियोंमें विख्यात, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ तथा महान् आत्मावाले वे दोनों मुनिवर कन्याप्राप्तिके लिये सम्यक् रूपसे आसनपर विराजमान हो गये उन दोनोंके सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके राजाने मनोहर, कमलके समान नेत्रोंवाली तथा यशस्विनी उस पुत्री श्रीमतीसे कहा- हे भद्रे। इन दोनोंमेंसे जिस वरको तुम मनसे चाहती हो, उसे प्रणाम करके यह माला विधिपूर्वक उसे पहना दो ॥ ८६-९१॥
एवमुक्ता तु सा कन्यास्त्रीभिः परिवृता तदा।
मालां हिरण्यमयीं दिव्यामादाय शुभलोचना ॥ ९२
यत्रासीनौ महात्मानौ तत्रागम्य स्थिता तदा।
वीक्ष्यमाणा मुनिश्रेष्ठौ नारदं पर्वतं तथा ॥ ९३
शाखामृगाननं दृष्ट्वा नारदं पर्वतं तथा।
गोलाङ्गुलमुखं कन्या किञ्चित् त्राससमन्विता ।। ९४
सम्भ्रान्तमानसा तत्र प्रवातकदली यथा।
तस्थौ तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि ॥ ९५
राजाके ऐसा कहनेपर स्त्रियोंसे घिरी हुई सुन्दर नेत्रोंवाली वह कन्या सुवर्णमयी दिव्य माला लेकर, जहाँ वे दोनों महात्मा बैठे थे, वहीं आकर उन मुनि श्रेष्ठों नारद तथा पर्वतको देखती हुई वहीं स्थित हो गयी नारदको लंगूरके समान मुखवाला तथा पर्वतको वानरके समान मुखवाला देखकर वह कन्या कुछ डर- सी गयी। व्याकुल चित्तवाली वह कन्या वायु-प्रकम्पित कदलीकी भाँति [काँपती हुई। वहाँ स्थित रही। तब उस राजाने उससे कहा- हे वत्से। तुम अब क्या करोगी? हे शुभे। इन दोनोंमेंसे किसी एकको चुनकर उसे माला पहना दो ॥ ९२-९५ ॥
अनयोरेकमुद्दिश्य देहि मालामिमां शुभे।
सा प्राह पितरं त्रस्ता इमौ तौ नरवानरौ ॥ ९६
मुनिश्रेष्ठं न पश्यामि नारदं पर्वतं तथा।
अनयोर्मध्यतस्त्वेकमूनषोडशवार्षिकम् ॥ ९७
सर्वाभरणसम्पन्नमतसीपुष्यसन्निभम् ।
दीर्घबाहुं विशालाक्षं तुङ्गोरस्थलमुत्तमम् ॥ ९८
रेखाङ्कितकटिग्रीवं रक्तान्तायतलोचनम् ।
नग्नचापानुकरणपटुभ्रूयुगशोभितम् ॥ ९९
विभक्तत्रिवलीव्यक्तं नाभिव्यक्तशुभोदरम् ।
हिरण्याम्बरसंवीतं तुङ्गरत्ननखं शुभम्।
पद्याकारकरं त्वेनं पद्मास्यं पद्मलोचनम् ॥ १००
सुनासं पद्महृदयं पद्मनाभं श्रिया वृतम्।
दन्तपंक्तिभिरत्यर्थ कुन्दकुड्मलसन्निभैः ॥ १०१
हसन्तं मां समालोक्य दक्षिणं च प्रसार्य वै।
पाणिं स्थितममुं तत्र पश्यामि शुभमूर्धजम् ।। १०२
डरी हुई उस कन्याने पितासे कहा- ये दोनों तो नरवानरकी आकृतिवाले हैं; मुनिश्रेष्ठ नारद तथा पर्वत तो मुझे दिखायी ही नहीं पड़ रहे हैं। [अपितु] इन दोनोंके मध्यमें सोलह वर्षसे थोड़ी कम आयुवाले, समस्त आभरणोंसे सम्पन्न, अतसी-पुष्पके समान [नील] कान्तिवाले, लम्बी भुजाओंवाले, विशाल नेत्रोंवाले, उन्नत तथा उत्तम वक्षःस्थलवाले, रेखायुक्त कटिप्रदेश तथा ग्रीवावाले, रक्त प्रान्तभागसे युक्त विशाल नेत्रोंवाले झुके हुए धनुषके सदृश टेढ़ी भौहोंसे सुशोभित [उदरदेशमें] पृथक् पृथक् तीन वलियोंसे समन्चिार, स्पष्ट नाभिसे युक्त सुन्दर उदरवाले, पीताम्बर धारण किये हुए, उन्नत तथा रत्नकी आभासे युक्त नखबाले मनोहर कमलके आकारसदृश हाथोंवाले, कमलके समान मुख तथा नेत्रोंवाले, सुन्दर नासिकावाले, पद्यसदृश हृदयदेशवाले, पद्मके समान नाभिवाले, कान्तिमानु कुन्द-कलीके समान दन्त-पंक्तियोंसे सुशोभित, सुदा केशोंवाले और मुझको देखकर मेरी ओर दाहिना हाथ फैलाकर हँसते हुए वहाँपर विराजमान इस [अन्य व्यक्ति] को देख रही हूँ ॥ ९६-१०२॥
सम्भ्रान्तमानसां तत्र वेपतीं कदलीमिव।
स्थितां तामाह राजासौ वत्से किं त्वं करिष्यसि ॥ १०३
एवमुक्ते मुनिः प्राह नारदः संशयं गतः ।
कियन्तो बाहवस्तस्य कन्ये ब्रूहि यथातथम् ॥ १०४
बाहुद्वयं च पश्यामीत्याह कन्या शुचिस्मिता ।
प्राह तां पर्वतस्तत्र तस्य वक्षःस्थले शुभे ॥ १०५
किं पश्यसि च मे ब्रूहि करे किं वास्य पश्यसि।
कन्या तमाह मालां वै पञ्चरूपामनुत्तमाम् ।। १०६
वक्षःस्थलेऽस्य पश्यामि करे कार्मुकसायकान् ।
एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ परस्परमनुत्तमौ ॥ १०७
मनसा चिन्तयन्तौ तौ मायेयं कस्यचिद्भवेत्।
मायावी तस्करो नूनं स्वयमेव जनार्दनः ॥ १०८
आगतो न यथा कुर्यात्कथमस्मन्मुखं त्विदम्।
गोलाङ्गूलत्वमित्येवं चिन्तयामास नारदः ॥ १०९
पर्वतोऽपि यथान्यायं वानरत्वं कथं मम।
प्राप्तमित्येव मनसा चिन्तामापेदिवांस्तथा ॥ ११०
तब कदलीकी भाँति काँपते हुए वहाँपर खड़ी उस व्याकुल मनवाली कन्यासे राजाने कहा- हे वत्से! अब तुम क्या करोगी? उसके ऐसा कहनेपर सन्देहमें पड़े नारदमुन्ने कहा- हे कन्ये। उसकी कितनी भुजाएँ हैं; सही-सही बताओ। तब पवित्र मुसकानवाली उस कन्याने कहा- मैं [उसके] दो हाथ देख रही हूँ। इसके बाद पर्वतले उससे कहा- हे शुभे! तुम उसके वक्षःस्थलपर क्या देख रही हो और उसके बायें] हाथमें क्या देख रही हो; मुझे बताओ। इसपर कन्या उनसे बोली- मैं उसके वक्षःस्थलपर सर्वश्रेष्ठ पंचरूप माला तथा हाथमें धनुष- बाण देख रही हूँ उसके द्वारा इस प्रकार कहे गये वे दोनों उत्तम मुनिश्रेष्ठ मनमें सोचते हुए परस्पर कहने लगे कि यह किसीको माया हो सकती है। लगता है मायावी तथा तस्कर स्वयं जनार्दन ही [कन्या प्राप्त करनेके लिये] निश्चितरूपसे यहाँ आया हुआ है; यदि ऐसा न होता, तो मेरा यह मुख लंगूरके मुखके समान वह क्यों करता?- ऐसा नारदजी सोचने लगे। इसी प्रकार पर्वतमुनि भी मनमें चिन्ता करने लगे कि मुझे यह वानरत्व कैसे प्राप्त हो गया ? ॥ १०३-११०॥
ततो राजा प्रणम्यासौ नारदं पर्वतं तथा।
भवद्भ्यां किमिदं तत्र कृतं बुद्धिविमोहजम् ॥ १११
स्वस्थौ भवन्तौ तिष्ठेतां यथा कन्यार्थमुद्यतौ।
एवमुक्तौ मुनिश्रेष्ठौ नृपमूचतुरुल्बणौ ।। ११२
त्वमेव मोहं कुरुषे नावामिह कथञ्चन।
आवयोरेकमेषा ते वरयत्वेव मा चिरम् ॥ ११३
ततः सा कन्यका भूयः प्रणिपत्येष्टदेवताम्।
मायामादाय तिष्ठन्तं तयोर्मध्ये समाहितम् ॥ ११४
सर्वाभरणसंयुक्तमतसीपुष्यसन्निभम्।
दीर्घबाहुं सुपुष्टाङ्गं कर्णान्तायतलोचनम् ॥ ११५
पूर्ववत्पुरुषं दृष्ट्वा मालां तस्मै ददौ हि सा।
अनन्तरं हि सा कन्या न दृष्टा मनुजैः पुनः ॥ ११६
तदनन्तर राजाने नारद तथा पर्वतको प्रणाम करके कहा- आप दोनोंने बुद्धि-विमौह उत्पन्न करनेवाला यह क्या कर दिया? कन्याको प्राप्त करनेके लिये तत्पर आप दोनों अब शान्तचित्त होकर बैठिये राजाके ऐसा कहनेपर वे दोनों मुनिश्रेष्ठ कुपित होकर बोले-आप ही मोह कर रहे हैं; हम दोनों बिलकुल नहीं। आपकी यह पुत्री अब हम दोनोंमेंसे किसी एकका अविलम्ब वरण कर ले तत्पश्चात् अपने इष्ट देवताको प्रणाम करके माला लेकर वह उठी और उसने उन दोनोंके बीचमें समाहितचित्त होकर बैठे हुए, समस्त आभरणोंसे सुशोभित, अतसीपुष्पके समान श्याम वर्णवाले, लम्बी भुजाओंवाले, पुष्ट अंगोंवाले तथा कर्णपर्यन्त विशाल नेत्रोंवाले पूर्वसदृश पुरुषको देखकर उसे माला पहना दी। इसके बाद पुनः [वहाँ उपस्थित] मनुष्योंने उस कन्याको नहीं देखा ॥ १११-११६ ॥
ततो नादः समभवत् किमेतदिति विस्मितौ।
तामादाय गतो विष्णुः स्वस्थानं पुरुषोत्तमः ॥ ११७
पुरा तदर्थमनिशं तपस्तप्त्वा वराङ्गना।
श्रीमती सा समुत्पन्ना सा गता च तथा हरिम् ॥ ११८
तावुभौ मुनिशार्दूलौ धिक्कृतावतिदुःखितौ ।
वासुदेवं प्रति तदा जग्मतुर्भवनं हरेः ॥ ११९
तावागतौ समीक्ष्याह श्रीमतीं भगवान् हरिः ।
मुनिश्रेष्ठौ समायातौ गृहस्वात्मानमत्र वै ॥ १२०
तथेत्युक्त्वा च सा देवी प्रहसन्ती चकार ह।
नारदः प्रणिपत्याग्रे प्राह दामोदरं हरिम् ॥ १२१
प्रियं हि कृतवानद्य मम त्वं पर्वतस्य हि।
त्वमेव नूनं गोविन्द कन्यां तां हृतवानसि ॥ १२२
तब वे दोनों मुनि आश्चर्यचकित हो गये कि यह क्या हुआ? इसके बाद वहाँ [लोगोंके बीच] यह ध्वनि होने लगी कि उसे लेकर पुरुषोत्तम श्रीविष्णु अपने लोकको चले गये। पूर्वजन्ममें उस सुन्दर युवतीने उन भगवान्के लिये निरन्तर तप करके [इस जन्ममें] 'श्रीमती' नामवाली कन्याके रूपमें जन्म लिया और फिर वह श्रीविष्णुको प्राप्त हुई तत्पश्चात् [उस श्रीमतीके द्वारा] तिरस्कृत किये गये वे दोनों मुनिश्रेष्ठ वासुदेव श्रीविष्णुके प्रति अत्यन्त दुःखित होकर उन श्रीहरिके भवन पहुँचे उन दोनोंको आया हुआ देखकर भगवान् श्रीहरिने श्रीमतीसे कहा कि मुनिश्रेष्ठ [नारद तथा पर्वत] आये हैं, अतः तुम अपनेको यहाँ छिपा लो इस पर 'ठीक है' ऐसा कहकर उस देवीने हँसते हुए वैसा कर दिया। तब सम्मुख दण्डवत् प्रणाम करके नारदने दामोदर श्रीहरिसे कहा- आपने मेरा तथा पर्वतका प्रिय कार्य तो आज कर दिया; हे गोविन्द ! हे सुरश्रेष्ठ ! अपनी बुद्धिसे हम दोनोंको धोखा देकर तथा विमोहित करके स्वयं आपने ही उस कन्याका हरण किया है॥ ११७-१२२ ॥
विमोह्यावां स्वयं बुद्धया प्रतार्य सुरसत्तम।
इत्युक्तः पुरुषो विष्णुः पिधाय श्रोत्रमच्युत।
पाणिभ्यां प्राह भगवान् भवद्भ्यां किमुदीरितम् ॥ १२३
कामवानपि भावोऽयं मुनिवृत्तिरहो किल।
एवमुक्तो मुनिः प्राह वासुदेवं स नारदः ॥ १२४
कर्णमूले मम कथं गोलाङ्गलमुखं त्विति।
कर्णमूले तमाहेदं वानरत्वं कृतं मया ॥ १२५
पर्वतस्य मया विद्वन् गोलाङ्गलमुखं तव।
मया तव कृतं तत्र प्रियार्थं नान्यथा त्विति ॥ १२६
पर्वतोऽपि तथा प्राह तस्याप्येवं जगाद सः ।
शृण्वतोरुभयोस्तत्र प्राह दामोदरो वचः ॥ १२७
प्रियं भवद्भ्यां कृतवान् सत्येनात्मानमालभे।
नारदः प्राह धर्मात्मा आवयोर्मध्यतः स्थितः ॥ १२८
उनके ऐसा कहनेपर परम पुरुष अच्युत भगवान् विष्णुने दोनों हाथोंसे अपने कान बन्द करके कहा- आप दोनोंने यह क्या कह दिया। अहो, यह तो वासनामय भाव है, जबकि आपलोग मुनिवृत्तिवाले हैं [भगवान्के द्वारा] इस प्रकार कहे गये उन नारद मुनिने वासुदेवसे उनके कर्णमूलमें कहा- आपने मेरा मुख लंगूरके मुखके समान क्यों कर दिया? तब भगवान् उनके कर्णमूलमें बोले- हे विद्वन्! मैंने ही पर्वतका मुख वानर-जैसा और आपका मुख लंगूर-जैसा कर दिया था; यह सब मैंने आपके हितके लिये ही किया था, इसके विपरीत नहीं पर्वतने भी वही पूछा; तब उन विष्णुने उनसे भी वैसा ही कहा। इसके बाद भगवान् दामोदर श्रवण कर रहे उन दोनोंके समक्ष यह वचन बोले- मैं शपथपूर्वक सत्य कहता हूँ कि मैंने आप दोनोंका हित ही किया है तत्पश्चात् धर्मात्मा नारदने कहा-हम दोनोंके मध्यमें स्थित वह कौन धनुर्धारी पुरुष था, जो उस कन्याका हरण करके चला गया था ? ॥१२३-१२८ ॥
धनुष्मान् पुरुषः कोऽत्र तां हृत्वा गतवान् किल ।
तच्छ्रुत्वा वासुदेवोऽसौ प्राह तौ मुनिसत्तमौ ।। १२९
मायाविनो महात्मनो बहवः सन्ति सत्तमाः ।
तत्र सा श्रीमती नूनमदृष्ट्वा मुनिसत्तमौ ॥ १३०
चक्रपाणिरहं नित्यं चतुर्बाहुरिति स्थितः ।
तां तथा नाहमैच्छं वै भवद्भ्यां विदितं हि तत् ॥ १३१
इत्युक्तौ प्रणिपत्यैनमूचतुः प्रीतिमानसौ।
कोऽत्र दोषस्तव विभो नारायण जगत्पते ॥ १३२
दौरात्म्यं तन्नृपस्यैव मायां हि कृतवानसौ।
इत्युक्त्वा जग्मतुस्तस्मान्मुनी नारदपर्वतौ ॥ १३३
अम्बरीषं समासाद्य शापेनैनमयोजयत्।
नारदः पर्वतश्चैव यस्मादावामिहागतौ ॥ १३४
आहूय पश्चादन्यस्मै कन्यां त्वं दत्तवानसि।
मायायोगेन तस्मात्त्वां तमो ह्यभिभविष्यति ॥ १३५
यह सुनकर वासुदेवने उन मुनिवरोंसे कहा- 'बहुतसे श्रेष्ठ महात्मा लोग भी मायावी हैं। वहाँ निश्चित ही श्रीमतीने आप दोनों ऋषिसत्तमोंको देखकर ही अन्यका वरण किया होगा। मैं हाथमें चक्र धारण किये चार भुजाओंसे युक्त होकर स्थित रहता हूँ, यह तो आप दोनोंको विदित ही है; मैंने उसे प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं की है भगवान्ने जब उनसे ऐसा कहा, तब उन दोनोंने प्रसन्न- चित्त होकर उन्हें प्रणाम करके कहा- हे विभो ! हे नारायण ! हे जगत्पते! इसमें आपका क्या दोष है; इसमें उस राजाकी ही धृष्टता है, उसीने यह माया रची है ऐसा कहकर वे दोनों मुनि नारद तथा पर्वत वहाँसे चल पड़े। अम्बरीषके यहाँ आकर नारद तथा पर्वतने उन्हें शाप दे दिया। हम दोनों आये थे, फिर भी उसके बादमें किसी अन्यको बुलाकर आपने माया रचकर उसे अपनी कन्या दे दी है, अतः तमोगुण आपको आक्रान्त कर लेगा; इसके परिणामस्वरूप आप अपनी आत्माको यथार्थरूपमें बिलकुल नहीं जान पायेंगे ॥ १२९-१३५ ॥
तेन चात्मानमत्यर्थ यथावत्त्वं न वेत्स्यसि।
एवं शापे प्रदत्ते तु तमोराशिरथोत्थितः ॥ १३६
नृपं प्रति ततश्चक्रं विष्णोः प्रादुरभूत् क्षणात् ।
चक्रवित्रासितं घोरं तावुभौ तम अभ्यगात् ॥ १३७
ततः सन्त्रस्तसर्वाङ्गौ धावमानौ महामुनी।
पृष्ठतश्चक्रमालोक्य तमोराशिं दुरासदम् ॥ १३८
कन्यासिद्धिरहो प्राप्ता ह्यावयोरिति वेगितौ।
लोकालोकान्तमनिशं धावमानौ भयार्दितौ ॥ १३९
त्राहि त्राहीति गोविन्दं भाषमाणौ भयार्दितौ।
विष्णुलोकं ततो गत्वा नारायण जगत्पते ॥ १४०
वासुदेव हृषीकेश पद्मनाभ जनार्दन।
त्राह्यावां पुण्डरीकाक्ष नाथोऽसि पुरुषोत्तम ॥ १४१
[मुनियोंके द्वारा] यह शाप दे दिये जानेपर एक अन्धकारपुंज उत्पन्न हुआ और राजाकी ओर बढ़ा; तब उसी क्षण भगवान् विष्णुका चक्र प्रकट हो गया। उस चक्रके द्वारा त्रस्त किया गया वह अन्धकारपुंज अब उन मुनियोंकी ओर चल पड़ा तत्पश्चात् सन्तप्त अंगोंवाले भागते हुए वे दोनों महामुनि अपने पीछे उस चक्र तथा भयानक अन्धकार- पुंजको देखकर कहने लगे-'अहो, हम दोनोंने शीघ्र ही कन्यासिद्धि प्राप्त कर ली।' भयभीत होकर लोकलोकान्तरमें निरन्तर दौड़ते हुए और 'त्राहि- त्राहि ऐसा पुकारते हुए विष्णुलोक जाकर गोविन्दसे बोले- हे नारायण! हे जगत्पते! हे वासुदेव! हे हृषीकेश ! हे पद्मनाभ! हे जनार्दन! हे पुण्डरीकाक्ष! हे पुरुषोत्तम ! आप [सबके] स्वामी हैं; हम दोनोंकी रक्षा कीजिये ॥ १३६-१४१ ॥
ततो नारायणश्चिन्त्य श्रीमाञ्छ्रीवत्सलाञ्छनः ।
निवार्य चक्रं ध्वान्तं च भक्तानुग्रहकाम्यया॥ १४२
अम्बरीषश्च मद्भक्तस्तथैतौ मुनिसत्तमौ।
अनयोरस्य च तथा हितं कार्यं मयाधुना ॥ १४३
आहूय तत्तमः श्रीमान् गिरा प्रह्लादयन् हरिः ।
प्रोवाच भगवान् विष्णुः शृणुतां मे इदं वचः ॥ १४४
ऋषिशापो न चैवासीदन्यथा च वरो मम।
दत्तो नृपाय रक्षार्थ नास्ति तस्यान्यथा पुनः ॥ १४५
अम्बरीषस्य पुत्रस्य नप्तुः पुत्रो महायशाः ।
श्रीमान् दशरथो नाम राजा भवति धार्मिकः ॥ १४६
तस्याहमग्रजः पुत्रो रामनामा भवाम्यहम्।
तत्र मे दक्षिणो बाहुर्भरतो नाम वै भवेत् ॥ १४७
शत्रुघ्नो नाम सव्यश्च शेषोऽसौ लक्ष्मणः स्मृतः ।
तत्र मां समुपागच्छ गच्छेदानीं नृपं विना ॥ १४८
मुनिश्रेष्ठौ च हित्वा त्वं इति स्माह च माधवः ।
एवमुक्तं तमो नाशं तत्क्षणाच्च जगाम वै॥ १४९
अम्बरीष मेरा भक्त है और वैसे ही ये दोनों मुनिश्रेष्ठ भी मेरे भक्त हैं, अतः इस [अम्बरीष] का तथा इन दोनों [मुनियों] का इस समय मुझे हित करना चाहिये-यह सोच करके भक्तोंपर कृपा करनेकी अभिलाषासे ऐश्वर्यसम्पन्न वक्षःस्थलपर श्रीवत्स चिह्न धारण करनेवाले, नारायण, श्रीहरि भगवान् विष्णुने चक्र तथा तमोराशिका निवारण करके उस अन्धकारको बुलाकर वाणीसे उसे प्रसन्न करते हुए बोले- मेरी यह बात सुनो, यह ऋषिका शाप नहीं था, अपितु मेरा वरदान ही था, जिसे राजाकी रक्षाके लिये मैंने उन्हें प्रदान किया था; इसके विपरीत और कुछ भी नहीं है। इन राजा अम्बरीषके पुत्रके नातीके पुत्र महायशस्वी तथा ऐश्वर्यशाली 'दशरथ' नामक धर्मात्मा राजा होंगे। मैं उन्हींके 'राम' नामक ज्येष्ठ पुत्रके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा। मेरा दाहिना हाथ उस समय भरत नामसे और बायाँ हाथ शत्रुघ्न नामसे प्रकट होंगे और ये शेषनाग लक्ष्मणके रूपमें प्रसिद्ध होंगे। उस समय तुम मेरे पास आना और इस समय राजाको तथा इन मुनिवरोंको छोड़कर चले जाओ उन माधवने [उस अन्धकारसे] ऐसा कहा। भगवान्के ऐसा कहनेपर वह अन्धकार उसी क्षण नष्ट हो गया और निवारित किया गया वह विष्णुचक्र पूर्वको भौति व्यवस्थित हो गया ॥ १४२-१४९ ॥
निवारितं हरेश्चक्रं यथापूर्वमतिष्ठत ।
मुनिश्रेष्ठौ भयान्मुक्तौ प्रणिपत्य जनार्दनम् ॥ १५०
निर्गतौ शोकसन्तप्तौ ऊचतुस्तौ परस्परम्।
अद्यप्रभृति देहान्तमावां कन्यापरिग्रहम् ॥ १५१
न करिष्याव इत्युक्त्वा प्रतिज्ञाय च तावृषी।
योगध्यानपरौ शुद्धौ यथापूर्व व्यवस्थितौ ॥ १५२
अम्बरीषश्च राजासौ परिपाल्य च मेदिनीम्।
सभृत्यज्ञातिसम्पन्नो विष्णुलोकं जगाम वै॥ १५३
मानार्थमम्बरीषस्य तथैव मुनिसिंहयोः ।
रामो दाशरथिर्भूत्वा नात्मवेदीश्वरोऽभवत् ॥ १५४
मुनयश्च तथा सर्वे भृग्वाद्या मुनिसत्तमाः ।
माया न कार्या विद्वद्धिरित्याहुः प्रेक्ष्य तं हरिम् ॥ १५५
नारदः पर्वतश्चैव चिरं ज्ञात्वा विचेष्टितम् ।
मायां विष्णोर्विनिन्द्यैव रुद्रभक्तौ बभूवतुः ॥ १५६
एतद्धि कथितं सर्वं मया युष्माकमद्य वै।
अम्बरीषस्य माहात्म्यं मायावित्वं च वै हरेः ॥ १५७
यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वापि मानवः ।
मायां विसृज्य पुण्यात्मा रुद्रलोकं स गच्छति ॥ १५८
इदं पवित्रं परमं पुण्यं वेदैरुदीरितम् ।
सायं प्रातः पठेन्नित्यं विष्णोः सायुज्यमाप्नुयात् ॥ १५९
वे मुनिश्रेष्ठ भयसे मुक्त हो गये और जनार्दनको प्रणाम करके वहाँसे निकल गये। शोकसन्तप्त के दोनों मुनि आपसमें कहने लगे कि आजसे मृत्युपर्यन्त हम दोनों कन्यापरिग्रह (विवाह) नहीं करेंगे। ऐसा कहकर और प्रतिज्ञा करके वे दोनों ऋषि पूर्वकी भाँति योगध्यानपरायण तथा शुद्धविचारवाले हो गये राजा अम्बरीष भी भलीभाँति पृथ्वीका पालन करके अपने सेवकों तथा बन्धु-बान्धवोंसहित विष्णुलोक चले गये भगवान् विष्णु भी अम्बरीषके मानके लिये तथा दोनों मुनिश्रेष्ठोंके वचनकी रक्षाके लिये दशरथ-पुत्र राम हुए और वे प्रभु अपने स्वरूपको नहीं जान सके उन श्रीहरिको देखकर सभी मुनिगण, भृगु आदि मुनिश्रेष्ठ यह कहने लगे कि विद्वानोंको माया नहीं रचनी चाहिये नारद तथा पर्वत भी [अपने द्वारा किये गये] मूर्खतापूर्ण कार्यको दीर्घकालतक सोचकर तथा विष्णुकी मायाकी निन्दा करके रुद्रभक्त हो गये [हे मुनियो !] मैंने अम्बरीषका माहात्म्य तथा श्रीहरिका मायावी होना-यह सब आपलोगोंको बता दिया। जो मनुष्य इसे पढ़ता, सुनता अथवा दूसरोंको सुनाता है वह विशुद्ध आत्मावाला होकर मायाका त्याग करके रुद्रलोकको प्राप्त होता है। जो वेदोंके द्वारा कहे गये इस परम पवित्र तथा पुण्यप्रद [आख्यान] का प्रतिदिन प्रातः तथा सायं पाठ करता है, वह विष्णुप्तायुज्य प्राप्त करता है॥ १५०-१५९॥
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुरापणे उत्तरभागे श्रीमत्याख्यानं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्ग महापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'श्रीमती आख्यान' नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५ ॥
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