लिंग पुराण : पशु, पाश एवं पशुपतिकी व्याख्या, पाशुपतयोगका माहात्म्य तथा पशुपाशमोक्षविवरण | Linga Purana: Explanation of Pashu, Pash and Pashupati, greatness of Pashupatayoga and description of Pashupasha salvation

श्रीलिङ्गमहापुराण लिंग पुराण [ उत्तरभाग ] नौवाँ अध्याय

पशु, पाश एवं पशु पति की व्याख्या, पाशुपत योग का माहात्म्य तथा पशुपाशमोक्ष विवरण

ऋषय ऊचुः

देवैः पुरा कृतं दिव्यं व्रतं पाशुपतं शुभम्।
ब्रह्मणा च स्वयं सूत कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा ॥ १

पतितेन च विप्रेण धौन्धुमूकेन वै तथा।
कृत्वा जप्त्वा गतिः प्राप्ता कथं पाशुपतं व्रतम् ॥ २

कथं पशुपतिर्देवः शङ्करः परमेश्वरः ।
वक्तुमर्हसि चास्माकं परं कौतूहलं हि नः ॥ ३

ऋषिगण बोले- हे सूतजी ! देवताओंने, ब्रह्माजीने तथा उत्कृष्ट कर्मोंवाले स्वयं विष्णुने पूर्वकालमें इस दिव्य एवं मंगलकारी व्रतको किया था। पतित विप्र धौन्धुमूकने भी इसे करके तथा मन्त्रका जप करके सद्गति प्राप्त की। यह पाशुपतव्रत कैसा है और वे परमेश्वर भगवान् शंकर पशुपति क्यों [कहे जाते] हैं? हमलोगोंको [इस विषयके प्रति] बड़ी जिज्ञासा है; आप हमें बतायें ॥ १-३॥

सूत उवाच

पुरा शापाद्विनिर्मुक्तो ब्रह्मपुत्रो महायशाः।
रुद्रस्य देवदेवस्य मरुदेशादिहागतः ॥ ४

त्यक्त्वा प्रसादाद्रुद्रस्य उष्ट्रदेहमजाज्ञया।
शिलादपुत्रमासाद्य नमस्कृत्य विधानतः ॥ ५

मेरुपृष्ठे मुनिवरः श्रुत्वा धर्ममनुत्तमम् ।
माहेश्वरं मुनिश्रेष्ठा ह्यपृच्छच्च पुनः पुनः ॥ ६

नन्दिनं प्रणिपत्यैनं कथं पशुपतिः प्रभुः।
वक्तुमर्हसि चास्माकं तत्सर्वं च तदाह सः ॥ ७

तत्सर्वं श्रुतवान् व्यासः कृष्णद्वैपायनः प्रभुः।
तस्मादहमनुश्रुत्य युष्माकं प्रवदामि वै ॥ ८

सर्वे शृण्वन्तु वचनं नमस्कृत्वा महेश्वरम्।

सूतजी बोले- पूर्वकालमें ब्रह्माजीके पुत्र महायशस्वी सनत्कुमार देवदेव रुद्रके शापसे मुक्त हुए थे। उन भगवान् रुद्रके ही अनुग्रहसे उष्ट्रदेहका त्याग करके वे मरुदेशसे नन्दीके पास मेरुके शिखरपर पहुँचकर उन्हें विधानपूर्वक यहाँ (भारतवर्ष) आ गये। पुनः ब्रह्माजीकी आज्ञासे शिलादपुत्र नमस्कार करके मुनिवरने उनसे सर्वश्रेष्ठ मोक्षधर्मका श्रवणकर पाशुपतव्रतके विषयमें पूछा। हे मुनिश्रेष्ठो! इन नन्दीको बार-बार प्रणाम करके सनत्कुमारने पूछा- प्रभु शिव पशुपति कैसे हुए-यह आप हमसे बतायें। तब उन नन्दीने उन्हें सब कुछ बता दिया। कृष्णद्वैपायन प्रभु व्यासने [सनत्कुमारसे] वह सब सुना और उन [व्यासजी] से सुन करके अब मैं आपलोगोंसे वही प्रसंग कह रहा हूँ, महेश्वरको नमस्कार करके सभी लोग उस वचनको सुनें ॥ ४-८॥ 

सनत्कुमार उवाच

कथं पशुपतिर्देवः पशवः के प्रकीर्तिताः ॥ ९ 

कैः पाशैस्ते निबध्यन्ते विमुच्यन्ते च ते कथम्।

शैलादिरुवाच

सनत्कुमार वक्ष्यामि सर्वमेतद्यथातथम् ॥ १०

रुद्रभक्तस्य शान्तस्य तव कल्याणचेतसः । 
ब्रह्माद्याः स्थावरान्ताश्च देवदेवस्य धीमतः ॥ ११

पशवः परिकीर्त्यन्ते संसारवशवर्तिनः । 
तेषां पतित्वाद्भगवान् रुद्रः पशुपतिः स्मृतः ॥ १२

अनादिनिधनो धाता भगवान् विष्णुरव्ययः । 
मायापाशेन बध्नाति पशुवत्परमेश्वरः ।। १३

स एव मोचकस्तेषां ज्ञानयोगेन सेवितः । 
अविद्यापाशबद्धानां नान्यो मोचक इष्यते ॥ १४

सनत्कुमार बोले- भगवान् शिव पशुपति कैसे हुए, कौन लोग पशु कहे गये हैं, वे किन पाशोंसे बाँधे जाते हैं और पुनः वे कैसे मुक्त होते हैं?  शैलादि बोले- हे सनत्कुमार! मैं रुद्रभक्त,शान्तस्वभाव तथा कल्याणभावनासे युक्त चित्तवाले आपको यह सब यथार्थ रूपमें बताऊँगा। ब्रह्मासे लेकर स्थावर जंगमपर्यन्त सभी मायावशवर्ती हैं और धीमान् देवदेव शिवके पशु कहे जाते हैं। उनका स्वामी होनेके कारण भगवान् रुद्र पशुपति कहे गये हैं आदि तथा अन्तसे रहित, धारण करनेवाले, अव्यय, षडैश्वर्यसम्पन्न, सर्वव्यापक, परमेश्वर महेश्वर ही इन जीवोंको मोहाभिभूत पशुके समान मायापाशमें बाँधते हैं तथा वे ही ज्ञानयोगसे आराधित होनेपर उन्हें मुक्ति देनेवाले भी हैं; क्योंकि अविद्यापाशमें बँधे जीवोंको मुक्ति देनेवाला परमात्मा परमेश्वर शंकरके अतिरिक्त कोई अन्य है ही नहीं ॥ ९ -१४ ॥

तमृते परमात्मानं शङ्करं परमेश्वरम् । 
चतुर्विशतितत्त्वानि पाशा हि परमेष्ठिनः ॥ १५

तैः पाशैमर्मोचयत्येकः शिवो जीवैरुपासितः । 
निबध्नाति पशूनेकश्चतुर्विशतिपाशकैः ॥ १६

स एव भगवान् रुद्रो मोचयत्यपि सेवितः । 
दशेन्द्रियमयैः पाशैरन्तःकरणसम्भवैः ॥ १७

भूततन्मात्रपाशैश्च पशून्मोचयति प्रभुः । 
इन्द्रियार्थमयैः पाशैर्बद्धा विषयिणः प्रभुः ॥ १८

चौबीस तत्त्व ही भगवान् परमेष्ठीके पाश हैं, वे एकमात्र शिव ही जीवोंके द्वारा आराधित होनेपर उन पाशोंसे मुक्त करते हैं। वे भगवान् रुद्र चौबीस पाशोंसे पशुओं (जीवों) को बाँधते हैं और वे ही सेवित होनेपर बन्धनमुक्त भी करते हैं। दस इन्द्रियों (पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय), अन्तःकरणजन्य भावों [मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त), शब्द आदि पाँच तन्मात्राओं तथा पृथ्वी आदि पाँच महाभूतों-इन समस्त विषयरूप पाशोंसे भगवान् शिव पशुओंको छुड़ाते हैं। इन इन्द्रियोंके विषयरूप पाशोंसे बँधे हुए विषयग्रस्त लोग परमेश्वर शिवकी सेवासे शीघ्र ही उनके भक्त हो जाते हैं॥ १५-१८ ॥

आशु भक्ता भवन्त्येव परमेश्वरसेवया।
भज इत्येष धातुर्वै सेवायां परिकीर्तितः ॥ १९

तस्मात्सेवा बुधैः प्रोक्ता भक्तिशब्देन भूयसी।
ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं पशून् बद्धा महेश्वरः ॥ २०

त्रिभिर्गुणमयैः पाशैः कार्यं कारयति स्वयम् ।
दृढेन भक्तियोगेन पशुभिः समुपासितः ॥ २१

मोचयत्येव तान् सद्यः शङ्करः परमेश्वरः ।
भजनं भक्तिरित्युक्ता वाङ्मनःकायकर्मभिः ॥ २२

सर्वकार्येण हेतुत्वात्याशच्छेदपटीयसी ।
सत्यः सर्वंग इत्यादि शिवस्य गुणचिन्तना ।। २३

रूपोपादानचिन्ता च मानसं भजनं विदुः।
वाचिकं भजनं धीराः प्रणवादिजपं विदुः ॥ २४

भज-यह धातु सेवा अर्थमें कही गयी है, अतः विद्वज्जनोंने सेवाको भक्ति शब्दसे सम्बन्धित बताया है। ब्रह्मा आदिसे लेकर तृणपर्यन्त सभी पशुओंको [सत्त्व आदि] तीनों गुणरूपी पाशोंसे बाँधकर महेश्वर स्वयं कार्य कराते हैं। पशुओंके द्वारा दृढ़ भक्तियोगसे सम्यक् आराधित होनेपर वे परमेश्वर शंकर उन्हें शीघ्र ही [बन्धनसे] छुड़ा देते हैं।मन, वचन तथा कर्मसे [प्रभुका] भजन ही भक्ति कही गयी है। समस्त प्रपंचोंके पति विष्णुका भी हेतु होनेके कारण वह भक्ति बन्धनको काटने में समर्थ है। वे सत्य हैं तथा सर्वव्यापी हैं- शिवके इन गुणोंको जानने तथा उनके रूप और उपादानोंके चिन्तनको विद्वानोंने मानस भजन कहा है और प्रणव (ॐकार) के उप आदिको उन्होंने वाचिक भजन कहा है, इसी प्रकार सत्पुरुषोंके द्वारा प्राणायाम आदिको कायिक भजन कहा जाता है।॥ १९-२४ ॥

कायिकं भजनं सद्भिः प्राणायामादि कथ्यते। 
धर्माधर्ममयैः पाशैर्बन्धनं देहिनामिदम् ॥ २५

मोचकः शिव एवैको भगवान् परमेश्वरः । 
चतुर्विशतितत्त्वानि मायाकर्मगुणा इति ॥ २६

कीर्त्यन्ते विषयाश्चेति पाशा जीवनिबन्धनात्। 
तैर्बद्धाः शिवभक्त्यैव मुच्यन्ते सर्वदेहिनः ॥ २७

पञ्चक्लेशमयैः पाशैः पशून् बध्नाति शङ्करः । 
स एव मोचकस्तेषां भक्त्या सम्यगुपासितः ॥ २८

अविद्यामस्मितां रागं द्वेषं च द्विपदां वराः। 
वदन्त्यभिनिवेशं च क्लेशान् पाशत्वमागतान् ॥ २९

तमो मोहो महामोहस्तामिस्त्र इति पण्डिताः । 
अन्धतामिस्त्र इत्याहुरविद्यां पञ्चधा स्थिताम् ॥ ३०

ताञ्जीवान् मुनिशार्दूलाः सर्वाश्चैवाप्यविद्यया। 
शिवो मोचयति श्रीमान्नान्यः कश्चिद्विमोचकः ॥ ३१

अविद्यां तम इत्याहुरस्मितां मोह इत्यपि। 
महामोह इति प्राज्ञा रागं योगपरायणाः ।। ३२

द्वेषं तामिस्त्र इत्याहुरन्धतामिस्त्र इत्यपि। 
तथैवाभिनिवेशं च मिथ्याज्ञानं विवेकिनः ॥ ३३

धर्माधर्ममय पाशोंसे जीवोंका यह बन्धन होता है और एकमात्र वे भगवान् परमेश्वर शिव ही [उन पाशोंसे जीवोंको मुक्त करनेवाले हैं। चौबीस तत्त्व, मायाके गुण और शब्द आदि विषय-ये जीवको बाँधनेके कारण पाश कहे जाते हैं। उन पाशोंसे बँधे हुए सभी प्राणी शिवभक्तिके द्वारा ही मुक्त होते हैं। [अविद्या आदि] पाँच बलेशरूप पाशोंसे भी वे शिव जीवोंको बाँधते हैं और वे ही भक्तिके द्वारा भलीभाँति उपासित किये जानेपर पाशोंसे उन्हें मुक्त कर देते हैं मनुष्योंमें श्रेष्ठ लोग अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेशको जीवोंको बाँधनेवाले [पाँच] क्लेश कहते हैं। पण्डितजन तम, मोह, महामोह, तामित्र और अन्धतामिस्र इन पाँच प्रकारसे अविद्या आदिको स्थित कहते हैं। हे मुनिश्रेष्ठो। केवल शिव ही उन समस्त जीवोंको अविद्यासे मुक्त कर सकते हैं, उन्हें मुक्त करनेवाला कोई दूसरा नहीं है। योगपरायण महाज्ञानियोंने अविद्याको तम, अस्मिताको मोह और रागको महामोह कहा है, इसी प्रकार विवेकयुक्त जनोंने द्वेषको तामिस्त्र और मिथ्या ज्ञानरूपी अभिनिवेशको अन्धतामिस्र बताया है॥ २५-३३ ॥

तमसोऽष्टविधा भेदा मोहश्चाष्टविधः स्मृतः । 
महामोहप्रभेदाश्च बुधैर्दश विचिन्तिताः ॥ ३४

अष्टादशविधं चाहुस्तामित्रं च विचक्षणाः। 
अन्धतामिस्त्रभेदाश्च तथाष्टादशधा स्मृताः ॥ ३५

अविद्ययास्य सम्बन्धो नातीतो नास्त्यनागतः । 
भवेद्रागेण देवस्य शम्भोरङ्गनिवासिनः ॥ ३६

कालेषु त्रिषु सम्बन्धस्तस्य द्वेषेण नो भवेत्। 
मायातीतस्य देवस्य स्थाणोः पशुपतेर्विभोः ॥ ३७

तथैवाभिनिवेशेन सम्बन्धो न कदाचन। 
शङ्करस्य शरण्यस्य शिवस्य परमात्मनः ॥ ३८

कुशलाकुशलैस्तस्य सम्बन्धो नैव कर्मभिः। 
भवेत्कालत्रये शम्भोरविद्यामतिवर्तिनः ॥ ३९

विपाकैः कर्मणां वापि न भवेदेव सङ्गमः। 
कालेषु त्रिषु सर्वस्य शिवस्य शिवदायिनः॥ ४०

तमके आठ भेद हैं। मोह आठ प्रकारका कहा गया है। विद्वानोंने महामोहके दस भेद बताये हैं। बुद्धिमान् लोगोंने तामिस्त्रको अठारह भेदोंवाला कहा है। अन्धतामिस्रके अठारह प्रकारके भेद बताये गये हैं सर्वान्तर्यामी देवदेव शिवका सम्बन्ध अविद्या तथा रागसे न तो वर्तमानमें है, न पूर्वकालमें रहा है  और न तो भविष्यमें होगा। मायासे परे, देवताओंके भी देव, स्थाणु, पशुपति तथा सर्वैश्वर्यसम्पन्न उन शिवका सम्बन्ध द्वेषसे तीनों कालोंमें नहीं हो सकता। शिवका सम्बन्ध अभिनिवेशसे भी कभी नहीं सम्भव उसी प्रकार शरणदाता तथा कल्याणकारक परमात्मा है। पुण्य तथा पापकर्मोंसे भी अविद्याका अतिवर्तन करनेवाले उन शिवका सम्बन्ध तीनों कालोंमें नहीं है। कल्याण प्रदान करनेवाले सर्वरूप शिवका सम्बन्ध [शुभाशुभ] कर्मकि फलसे भी तीनों कालोंमें नहीं है ॥ ३४-४० ॥ 

सुखदुःखैरसंस्पृश्यः कालत्रितयवर्तिभिः । 
स तैर्विनश्वरैः शम्भुर्बोधानन्दात्मकः परः ॥ ४१

आशयैरपरामृष्टः कालत्रितयगोचरैः । 
धियांपतिः स्वभूरेष महादेवो महेश्वरः ॥ ४२

अस्पृश्यः कर्मसंस्कारैः कालत्रितयवर्तिभिः ।
तथैव भोगसंस्कारैर्भगवानन्तकान्तकः ॥ ४३

पुंविशेषपरो देवो भगवान् परमेश्वरः । 
चेतनाचेतनायुक्तप्रपञ्चादखिलात्परः ॥ ४४

लोके सातिशयत्वेन ज्ञानैश्वर्यं विलोक्यते। 
शिवेनातिशयत्वेन शिवं प्राहुर्मनीषिणः ॥ ४५

वे बोधानन्दस्वरूप परम शिव तीनों कालोंमें विद्यमान रहनेवाले उन विनाशशील सुख-दुःखोंसे स्पर्श होनेयोग्य नहीं हैं। बुद्धिके स्वामी तथा स्वयं प्रकट होनेवाले वे महादेव महेश्वर तीनों कालोंमें अनुभूत होनेवाली कामनाओंसे भी अस्पृश्य हैं। इसी प्रकार कालका विनाश करनेवाले भगवान् शिव तीनों कालोंमें वर्तमान कर्मसंस्कारों तथा भोगसंस्कारोंसे अस्पृश्य हैं । वे परमेश्वर भगवान् महादेव सम्पूर्ण जीवोंसे श्रेष्ठ हैं और जड़-चेतनरूप सम्पूर्ण सृष्टिप्रपंचसे परे हैं। जैसे संसारमें ज्ञान और ऐश्वर्यको अत्यन्त श्रेष्ठ रूपमें देखा जाता है, वैसे ही अतिशय कल्याणरूप होने से ही मनीषियोंने महादेवको शिव कहा है॥ ४१-४५ ॥

प्रतिसर्गं प्रसूतानां ब्रह्मणां शास्त्रविस्तरम्।
उपदेष्टा स एवादौ कालावच्छेदवर्तिनाम् ।। ४६

कालावच्छेदयुक्तानां गुरूणामप्यसौ गुरुः ।
सर्वेषामेव सर्वेशः कालावच्छेदवर्जितः ॥ ४७

अनादिरेष सम्बन्धो विज्ञानोत्कर्षयोः परः ।
स्थितयोरीदृशः सर्वः परिशुद्धः स्वभावतः ॥ ४८

आत्मप्रयोजनाभावे परानुग्रह एव हि।
प्रयोजनं समस्तानां कार्याणां परमेश्वरः ॥ ४९

प्रणवो वाचकस्तस्य शिवस्य परमात्मनः ।
शिवरुद्रादिशब्दानां प्रणवोऽपि परः स्मृतः ॥ ५०

शम्भोः प्रणववाच्यस्य भावना तज्जपादपि।
या सिद्धिः स्वपराप्राप्या भवत्येव न संशयः ॥ ५१

प्रत्येक सर्गमें उत्पन्न होनेवाले तथा कालसीमामें बँधे सभी ब्रह्माओंको सम्पूर्ण शास्त्रोंका आरम्भमें उपदेश करनेवाले वे शिव ही हैं। कालसीमासे रहित वे सर्वेश्वर शिव कालावच्छेदसे युक्त सभी गुरुओंके भी गुरु हैं देहमें विद्यमान जीव तथा ईश्वरका यह सेवक तथा सेव्यका सम्बन्ध अनादि है। स्वभावसे अत्यन्त निर्मल तथा विश्वरूप वे शिव माया सम्बन्धसे रहित हैं। [नित्यानन्दस्वरूप होनेके कारण] अपने प्रयोजनके अभावमें भी वे परमेश्वर शिव जीवके प्रति समस्त कार्योंका प्रयोजनरूप अनुग्रह हैं  प्रणव उन परमात्मा शिवका वाचक है। यह प्रणव शिव-रुद्र आदि शब्दोंमें श्रेष्ठ कहा गया है। शिवके वाचक प्रणवके जपसे तथा उसकी भावनासे जो सिद्धि होती है, वह अन्य मन्त्रोंके जपसे प्राप्त नहीं होती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ४६-५१ ॥

ज्ञानतत्त्वं प्रयत्नेन योगः पाशुपतः परः। 
उक्तस्तु देवदेवेन सर्वेषामनुकम्पया ॥ ५२

स होवाचैव याज्ञवल्क्यो यदक्षरं गार्ग्ययोगिनः । 
अभिवदन्ति स्थूलमनन्तं महाश्चर्यमदीर्घमलोहित 
ममस्तकमासायमत एवो पुनारसमसङ्गमगन्धमरस 
मचक्षुष्कम श्रोत्रमवाड्मनोतेजस्कमप्रमाणमनुसुख- 
मनामगोत्रममरमजरमनामयममृतमोंशब्दममृत 
मसंवृतम पूर्वमनपरमनन्तमबाह्यं तदश्नाति किञ्चन न तदश्नाति किञ्चन ॥ ५३ ॥

देवदेव आदित्यरूपी शिवने [याज्ञवल्क्यकी तपस्यासे प्रसन्न होकर सभीकी अनुकम्पासे ज्ञानतत्त्वरूप श्रेष्ठ पाशुपत योगका उपदेश उन्हें दिया था। तत्पश्चात् याज्ञवल्क्यने गार्गीसे कहा- है गार्गि। अयोगी लोग नाशशून्य जो शिवतत्त्व है, उसे विरारूप, अनन्त तथा अत्यन्त आश्चर्यजनक बताते हैं, किंतु योगीलोग उसे अदीर्घ, अलोहित, मस्तक- विहीन, कभी अस्त न होनेवाला, अतएव नित्यानन्दरस- स्वरूप, स्पर्शशून्य, अगन्ध, अरस (रसविहीन), अचक्षुष्क (नेत्रविहीन), अश्रोत्र (कर्णरहित), मन तथा वाणीसे परे, अतेजस्क (अदाहक), अप्रमाण, सुखकारी, नाम तथा गोत्रसे विहीन, मृत्युरहित, जराशून्य, अनामय (रोगरहित), अमृत (मोक्षरूप) ॐकार शब्दसे प्रतिपाद्य, सुधारूप, अनाच्छादित, पूर्वभागसे शून्य, अपरभागशून्य तथा अन्तरहित कहते हैं। वह ब्रह्म सब कुछ खाता है और वह ब्रह्म कुछ भी नहीं खाता है॥ ५२-५३॥ 

एतत्कालव्यये ज्ञात्वा परं पाशुपतं प्रभुम् ।
योगे पाशुपते चास्मिन् यस्यार्थः किल उत्तमे ।। ५४

कृत्वोङ्कारं प्रदीपं मृगय गृहपतिं सूक्ष्ममाद्यन्तरस्थं 
संयम्य द्वारवासं पवनपटुतरं नायकं चेन्द्रियाणाम्।

वाग्जालैः कस्य हेतोर्विभटसि तु भयं दृश्यते नैव किंचि 
देहस्थं पश्य शम्भुं भ्रमसि किमु परे शास्त्रजालेऽन्धकारे ॥ ५५

एवं सम्यग्बुधैर्ज्ञात्वा मुनीनामथ चोक्तं शिवेन।
असमरसं पञ्चधा कृत्वाभयं चात्मनि योजयेत् ॥ ५६

इस उत्तम पाशुपतयोगमें जिस मनुष्यकी अभिरुचि होती है, वह इस श्रेष्ठ पाशुपत योगको जानकर अन्तकालमें परमेश्वरमें विलीन हो जाता है। ॐकाररूप दीपकको प्रज्वलित करके वायुसे भी अधिक वेगसे गति करनेवाले तथा इन्द्रियोंके स्वामी मनको भलीभाँति नियन्त्रित करके अन्तर्यामी, सूक्ष्म तथा सबके आदिस्वरूप उस परमात्माका अन्वेषण करो। तुम वाग्जालोंमें पड़कर किसलिये वृथा विवाद कर रहे हो। भय तो कुछ भी नहीं दिखायी दे रहा है। अतः तुम अपनी ही देहमें विद्यमान शम्भुको देखो;अन्धकारमय शास्त्रजालमें क्यों भटक रहे हो? इस प्रकार मुमुक्षुको चाहिये कि वह शिवजीके द्वारा मुनियोंके प्रति कहे गये उपदेशपर विद्वानोंके साथ भलीभाँति विचार करके आनन्दरूप आत्मस्वरूपको पंचकोशसे परे करके अभयरूपी मोक्ष प्राप्त करे ॥ ५२-५६ ॥ 

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे पाशुपतव्रतवर्णनं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥ 

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'पाशुपतव्रतवर्णन' नामक नौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९॥

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