लिंग पुराण : शिवमहामन्त्र के जपसे ब्राह्मण पुत्र दुराचारी धुन्धुमूक का शिव की कृपा से शिवगणत्व को प्राप्त करना | Linga Purana: By chanting Shivmahamantra, the evil-doing Brahmin son Dhundhumuk attained Shivaganatva by the grace of Shiva

श्रीलिङ्गमहापुराण लिंग पुराण [ उत्तरभाग ] आठवाँ अध्याय

शिवमहा मन्त्र के जप से ब्राह्मण पुत्र दुराचारी धुन्धुमूक का शिव की कृपा से शिव गणत्व को प्राप्त करना

सूत उवाच

अष्टाक्षरो द्विजश्रेष्ठा नमो नारायणेति च।
द्वादशाक्षरमन्त्रश्च परमः परमात्मनः ।। १

मन्त्रः षडक्षरो विप्राः सर्ववेदार्थसञ्चयः ।
यश्चों नमः शिवायेति मन्त्रः सर्वार्थसाधकः ॥ २

तथा शिवतरायेति दिव्यः पञ्चाक्षरः शुभः ।
मयस्कराय चेत्येवं नमस्ते शङ्कराय च ॥ ३

सूतजी बोले- हे द्विजश्रेष्ठो । 'ॐ नमो नारायणाय यह अष्टाक्षर मन्त्र तथा द्वादशाक्षर मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय) - ये परमात्माके श्रेष्ठ मन्त्र हैं। किंतु हे विप्रो! 'ॐ नमः शिवाय' यह जो षडक्षर मन्त्र है, वह सभी वेदार्थों का सारभूत है, उसी प्रकार 'शिवतराय' तथा 'मयस्कराय' ये दिव्य तथा मंगलकारक पंचाक्षरमन्त्र सभी मनोरथों को प्राप्त कराने वाले हैं और उसी तरह प्रधानपुरुष रुद्रका 'नमस्ते शङ्कराय'- यह सप्ताक्षर मन्त्र भी सभी मनोरथोंको सिद्ध करनेवाला है ॥ १-३॥

सप्ताक्षरोऽयं रुद्रस्य प्रधानपुरुषस्य वै।
ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः सर्वे देवाः सवासवाः ॥ ४

मन्त्रैरेतैर्द्विजश्रेष्ठा मुनयश्च यजन्ति तम्।
शङ्करं देवदेवेशं मयस्करमजोद्भवम् ॥ ५

शिवं च शङ्करं रुद्रं देवदेवमुमापतिम् ।
प्राहुर्नमः शिवायेति नमस्ते शङ्कराय च ॥ ६

मयस्कराय रुद्राय तथा शिवतराय च।
जप्त्वा मुच्येत वै विप्रो ब्रह्महत्यादिभिः क्षणात् ॥ ७

पुरा कश्चिद्विजः शक्तो धुन्धुमूक इति श्रुतः ।
आसीत्तृतीये त्रेतायामावर्ते च मनोः प्रभोः ॥ ८

हे द्विजश्रेष्ठो ! ब्रह्मा, भगवान् विष्णु तथा इन्द्रसहित सभी देवता, श्रेष्ठ द्विजगण एवं मुनिलोग इन मन्त्रोंसे उन शंकर, देवदेवेश, मयस्कर तथा अजोद्भव शिवका यजन करते हैं और उन्हीं शिवको शंकर, रुद्र, देवदेव तथा उमापति कहते हैं। नमः शिवाय, नमस्ते शङ्कराय, मयस्कराय, रुद्राय, शिवतराय-इन मन्त्रोंका जप करके विप्र ब्रह्महत्या आदि [महापातकों] से क्षणभरमें मुक्त हो जाता है पूर्वकालमें प्रभु मनुके तीसरे आवर्त (चतुर्युग)-के त्रेतायुगमें कोई धुन्धुमूक नामक सामर्थ्यसम्पन्न द्विज था॥ ४-८॥

मेघवाहनकल्पे वै ब्रह्मणः परमात्मनः ।
मेघो भूत्वा महादेवं कृत्तिवाससमीश्वरम् ॥ ९

बहुमानेन वै रुद्रं देवदेवो जनार्दनः।
खिन्नोऽतिभाराद्रुद्रस्य निःश्वासोच्छ्वासवर्जितः ॥ १०

विज्ञाप्य शितिकण्ठाय तपश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः ।
तपसा परमैश्वर्यं बलं चैव तथाद्भुतम् ॥ ११

लब्धवान् परमेशानाच्छङ्करात्परमात्मनः । 
तस्मात्कल्पस्तदा चासीन्मेघवाहनसंज्ञया ॥ १२

मेघवाहन कल्पमें परमात्मा शिवका मेघरूपी वाहन बनकर देवदेव जनार्दन विष्णुने अत्यन्त आदरके साथ उन महादेव कृत्तिवास (व्याघ्रचर्मधारी) ईश्वर रुद्रका वहन किया था। तब रुद्रके अत्यधिक भारसे पीड़ित होनेके कारण वे श्वास-उच्छ्‌वाससे रहित हो गये। इसके बाद उन कमलनयन विष्णुने शितिकण्ठ शिवको उद्देश्य करके तपस्या की और अपनी तपस्याके द्वारा परमेश्वर तथा परमात्मा शंकरसे परम ऐश्वर्य और अद्भुत बल प्राप्त किया। इसीलिये वह कल्प मेघवाहन नामसे विख्यात हुआ ॥ ९-१२॥

तस्मिन् कल्पे मुनेः शापाद् धुन्धुमूकसमुद्भवः । 
धुन्धुमूकात्मजस्तेन दुरात्मा च बभूव सः ॥ १३

धुन्धुमूकः पुरासक्तो भार्यया सह मोहितः । 
तस्यां वै स्थापितो गर्भः कामासक्तेन चेतसा ॥ १४

अमावास्यामहन्येव मुहूर्ते रुद्रदैवते। 
अन्तर्वत्नी तदा भार्या भुक्ता तेन यथासुखम् ॥ १५

असूत सा च तनयं विशल्याख्या प्रयत्नतः । 
रुद्रे मुहूर्त मन्देन वीक्षिते मुनिसत्तमाः ॥ १६

मातुः पितुस्तथारिष्टं स सञ्जातस्तथात्मनः । 
ऋषी तमूचतुर्विप्रा धुन्धुमूकं मिथस्तदा ॥ १७

मित्रावरुणनामानौ दुष्पुत्र इति सत्तमौ। 
वसिष्ठः प्राह नीचोऽपि प्रभावाद्वै बृहस्पतेः ॥ ९८

उस कल्पमें [पूर्वजन्ममें किसी] मुनिके शापके कारण धुन्धुमूकके यहाँ पुत्र उत्पन्न हुआ, धुन्धुमूकका वह पुत्र [पिताके दोषके कारण] दुरात्मा हो गया। पूर्वकालमें वह धुन्धुमूक विरक्त होते हुए भी भार्यापर मोहित हो गया और उसने अमावास्या तिथिको दिनमें ही रुद्रदैवत मुहूर्तमें कामासक्त मनसे भार्याके साथ सुखपूर्वक संसर्ग किया और उसमें गर्भ स्थापित कर दिया। तत्पश्चात् है मुनिश्रेष्ठो ! विशल्या नामक उस [मुनिपत्नी] ने शनिको दृष्टिवाले भयंकर मुहूर्तमें अत्यन्त कष्टपूर्वक एक पुत्रको जन्म दिया माता, पिता तथा अपने लिये अरिष्टकारी होकर उसने जन्म लिया था। है विप्रो! मित्र एवं वरुण नामक श्रेष्ठ ऋषियोंने उस धुन्धुमूकसे कहा कि यह दुष्पुत्र है, किंतु वसिष्ठने उससे कहा कि तुम्हारा यह पुत्र नीच तथा दुर्बुद्धि होते हुए भी बृहस्पतिके प्रभावसे पापसे मुक्त हो जायगा ॥ १३-१८॥

पुत्रस्तवासौ दुर्बुद्धिरपि मुच्यति किल्विषात् ।
दुःखितो धुन्धुमूकोऽसौ दृष्ट्वा पुत्रमवस्थितम् ।। १९

जातकर्मादिकं कृत्वा विधिवत्स्वयमेव च।
अध्यापयामास च तं विधिनैव द्विजोत्तमाः ॥ २०

तेनाधीतं यथान्यायं धौन्धुमूकेन सुव्रताः। 
कृतोद्वाहस्तदा गत्वा गुरुशुश्रूषणे रतः ॥ २१

अनेनैव मुनिश्रेष्ठा धौन्धुमूकेन दुर्मदात् । 
भुक्त्वान्यां वृषलीं दृष्ट्वा स्वभार्यावद्दिवानिशम् ॥ २२

एकशय्यासनगतो धौन्धुमूको द्विजाधमः। 
तथा चचार दुर्बुद्धिस्त्यक्त्वा धर्मगतिं पराम् ॥ २३

हे द्विजश्रेष्ठो! ऐसी दशावाले पुत्रको देखकर वह धुन्धुमूक [बहुत] दुःखित हुआ। उसने विधिपूर्वक उसके जातकर्म आदि संस्कार करके स्वयं उसे सम्यक् प्रकारसे पढ़ाया। उस धुन्धुमूकके पुत्रने भलीभाँति अध्ययन किया। हे सुव्रतो! इसके बाद उसका विवाह कर दिया गया, तब वहाँसे जाकर वह गुरुसेवामें निरत हो गया है द्विजश्रेष्ठो। इसी [पूर्वोक्त दोष) के कारण वह धुन्धुमूकपुत्र किसी शूद्राको देखकर मदोन्मत्त होकर अपनी भार्याके समान उसके साथ दिन-रात भोग करके [उसके पास] पड़ा रहता था। वह द्विजाधम तथा दुर्बुद्धि अपनी परम धर्मगतिका त्याग करके उसके साथ शय्यापर स्थित होकर दुराचारमें रत रहता था। वह कामोद्दीपनके लिये उसके साथ मदिरा भी पीता था॥ १९-२३॥

माध्वी पीता तया सार्धं तेन रागविवृद्धये।
केनापि कारणेनैव तामुद्दिश्य द्विजोत्तमाः ॥ २४

निहता सा च पापेन वृषली गतमङ्गला।
ततस्तस्यास्तदा तस्य भ्रातृभिर्निहतः पिता ॥ २५

माता च तस्य दुर्बुद्धेर्धांन्धुमूकस्य शोभना ।
भार्या च तस्य दुर्बुद्धेः श्यालास्ते चापि सुव्रताः ।॥ २६

हे द्विजश्रेष्ठो! किसी कारणसे उस शूद्राके साथ उसका विरोध हो गया और उस पापीने अभद्र शूद्राको मार डाला। तब उसके भाइयोंने उस धौन्धुमूक के पिताको मार डाला, इसी प्रकार उन्होंने उस दुर्बुद्धिको माता, सुन्दर पत्नी तथा उसके सालों (पानीके भाइयों)- का भी वध कर दिया। हे सुव्रतो! इस प्रकार क्षणभरमें उसका कुल विनष्ट हो गया और उस शूद्राका सम्पूर्ण कुल भी राजाके द्वारा मार डाला गया ॥ २४-२६ ॥

राज्ञा क्षणादहो नष्टं कुलं तस्याश्च तस्य च।
गत्वासौ धौन्धुमूकश्च येन केनापि लीलया ॥ २७

दृष्ट्वा तु तं मुनिश्रेष्ठं रुद्रजाप्यपरायणम्।
लब्ध्वा पाशुपतं तद्वै पुरा देवान् महेश्वरात् ॥ २८

लब्ध्वा पञ्चाक्षरं चैव षडक्षरमनुत्तमम् ।
पुनः पञ्चाक्षरं चैव जप्त्वा लक्षं पृथक्पृथक् ॥ २९

व्रतं कृत्वा च विधिना दिव्यं द्वादशमासिकम् ।
कालधर्म गतः कल्पे पूजितश्च यमेन वै ॥ ३०

उद्धृता च तथा माता पिता श्यालाश्च सुव्रताः ।
पत्नी च सुभगा जाता सुस्मिता च पतिव्रता ॥। ३१

ताभिर्विमानमारुह्य देवैः सेन्द्रैरभिष्टुतः ।
गाणपत्यमनुप्राप्य रुद्रस्य दयितोऽभवत् ।। ३२

तत्पश्चात् जिस किसी तरह वहाँसे निकलकर वह धौन्धुमूक पूर्वकालमें महेश्वर महादेवसे पाशुपतव्रत प्राप्त करके रुद्रजपमें तत्पर मुनिश्रेष्ठ बृहस्पतिके यहाँ प्रारब्धवश पहुँचकर उनसे सर्वश्रेष्ठ पंचाक्षर तथा षडक्षर मन्त्र ग्रहण करके और बादमें उस पंचाक्षर तथा षडक्षर मन्त्रको पृथक् पृथक् एक लाख बार जपकर और इस प्रकार दिव्य द्वादशमासिक व्रतको विधिपूर्वक करके अन्तमें [आयुके समाप्त होनेपर] मृत्युको प्राप्त हुआ। यमलोकमें यमराजके द्वारा वह बहुत सम्मानित किया गया। हे सुव्रतो! इस प्रकार उसने (शूद्रोंके द्वारा मारे गये] अपने माता, पिता तथा सालोंका उद्धार कर दिया और सुन्दर मुसकानवाली उसको पतिव्रता भार्या सौभाग्यवती हो गयी। उन सभीके साथ विमानमें बैठकर [रुद्रलोक पहुँचकर] इन्द्रसहित सभी देवताओंसे स्तुत होता हुआ वह गणाध्यक्ष बनकर भगवान् रुद्रका प्रिय हो गया ॥ २७-३२॥

तस्मादष्टाक्षरान्मन्त्रात्तथा वै द्वादशाक्षरात् । 
भवेत्कोटिगुणं पुण्यं नात्र कार्या विचारणा ॥ ३३

तस्माज्जपेद्धि यो नित्यं प्रागुक्तेन विधानतः । 
शक्तिबीजसमायुक्तं स याति परमां गतिम् ॥ ३४

एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमुत्तमम् । 
यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान् ॥ ३५

स याति ब्रह्मलोकं तु रुद्रजाप्यमनुत्तमम् ॥ ३६

अतएव अष्टाक्षर तथा द्वादशाक्षर मन्त्रोंसे यह [पंचाक्षरमन्त्र] करोड़ों गुना अधिक पुण्यप्रद होता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अतः जो मनुष्य पूर्वमें कहे गये विधानके अनुसार आदिमें मायाबीज लगाकर इस मन्त्रका नित्य जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है [हे मुनियो!] मैंने आपलोगोंसे यह उत्तम कथासार कह दिया, जो [मनुष्य] इस सर्वोत्कृष्ट रुद्रजपसम्बन्धी प्रसंगको पढ़ता है, सुनता है अथवा श्रेष्ठ द्विजोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोक प्राप्त करता है॥ ३३-३६ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागेऽष्टाक्षरप्रशंसा नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभाग में अष्टाक्षरप्रशंसा' नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८ ॥

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