शनि के वाणिज्य, व्यापार सम्बन्धी विचार,Shani Ke Vaanijy, Vyaapaar Sambandhee Vichaar

शनि के वाणिज्य, व्यापार सम्बन्धी विचार,

लोहा, स्टील, फौलाद, कोयला, पत्थर, शीशा, जमीन की खरीद फरोख्त बिक्री, बढ़ईगीरी का कार्य, मशीनरी, सीमेंट, प्लास्टिक, चमड़ा, कम्बल, जादू-मंत्र की कला, वकालत, जज, लिपिक, शराब, स्पिरिट, दलाली, सट्टेबाजी, पेन्टर, धोबी तरखान, रिक्शा चालक, वाहन चालक, गौ-भैंस, पान-का व्यवसाय, कृषि, खदान का कार्य, सरसों का तेल एवम्‌ काली मिर्च, उड़द आदि का व्यापार, सुरमा, काला तिल का व्यवसाय आदि व्यवसाय निर्देशित करता है । उपरोक्त के अलावा भी अन्य कई व्यवसायों का स्वामित्व शनि का है।

धन हानिं का योंग 

कुण्डली में किन भावों का शनि जातक के लिए 'धन-हानि' का योग बनाता है। भौतिकता प्रधान युग में जातक के लिए धन-हानि एवम्‌ ' धन-लाभ' सम्बन्धित तथ्य विशेष महत्त्व रखता है। सर्व प्रथम हम शनि के सम्बन्धित धनहानि के योग के विषय में चर्चा करेंगे तथा उसके उपायों का वर्णन करेंगे तत्पश्चात्‌ “शनि क्‍या लाभ प्रदाता भी है ?' के विषय में आइये देखें किन स्थितियों में शनि हानि-प्रद है -
  • मेष लग्न में लाभेश शनि यदि षष्ठम, अष्टम, अथवा द्वादशभाव में हो तथा धनेश अस्तगत अथवा पापग्रस्त हो । तो जातक के लिए दरिद्रता का योग बनता है।
  • यदि वृष लग्नस्थ जातक (जिसका जन्म वृष लग्न में हुआ हो) की कुण्डली में दशम भाव का स्वामी शनि षष्ठम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में विराजमान हो तो जातक को परिश्रम का पूर्ण फल (लाभ) नहीं प्राप्त होता। जीवन भर धन की कमी रहने का योग बनता है।
  • मिथुन लग्नस्थ जातक को कुण्डली में अष्टमेश शनि वक्री हो अथवा अष्ठम स्थान में अन्य कोई ग्रह वक्री हो तो जातक के लिए अचानक धन हानि का योग बनता है।
  • कर्क लग्न वाले जातक की कुण्डली में यदि अष्टमेश शनि वक्रो होकर कहीं बैठा हो अथवा अष्टम स्थान में अन्य कोई ग्रह वक्री हो तो अचानक धन-हानि हो सकती है।
  • धनु लग्न में धनेश शनि षष्टम, अष्टम अथवा द्वादश भाव में विराजमान हो तो जातक के लिए धन हीनता का योग बनता है।
  • धनु लग्नस्थ जातक की कुण्डली के केन्द्र में सूर्य, मंगल शनि और राहु विराजमान हो या धन भाव में शनि के साथ मंगल हो तो धन हीनता का योग बनता है
  • लग्न भाव में सूर्य, दशम भाव में शनि, सप्तम भाव में मंगल और सुखभाव में राहु विराजमान हो तो जातक के लिए महा दरिद्रता का योग बनता है।
  • कुम्भ लग्न में लग्नेश शनि षष्टम, अष्टम अथवा द्वादश स्थान पर हो और सूर्य षष्टम या द्वादश स्थान में हो तो जातक ऋणी हो सकता है। यह योग यही बताते हैं।
  • धन स्थान में पाप ग्रह हों और लाभेश शनि षष्टम, अष्टम अथवा द्वादश स्थान में हो तो दरिद्रता का योग बनता है।
  • शनि के अशुभ फल से पीड़ित दरिद्रता निवारण हेतु उपाय करें आवश्यकतानुसार मुझ से सहयोग परामर्श ले सकते हैं।

धन-लाभ का योग 

शनि के क्रूर स्वभाव से शायद ही कोई अपरिचित हो अन्यथा शनि का नाम सुनकर ही लोगों का हृदय कांप जाता है और जिन्होंने शनि की अशुभ दृष्टि (प्रकोप) को सहन किया है उनके विषय में कुछ कहने को बचता ही नहीं है। शनि क्रूर है, अशुभ है, भयंकर है किन्तु इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि शनि शुभ एवम्‌ धनदायी भी है।
ई भी देवता क्रूर या अशुभ नहीं होता बल्कि अशुभ और क्रूर होता है वह समय, जिस समय जातक (व्यक्ति) का जन्म होता है तथा जन्म और मरण दैववश (संयोग से तात्पर्य है) नहीं होता बल्कि विधाता के पूर्ण व्यवस्थित विधान के अन्तर्गत होता है। यूं कहा जाये तो अति उत्तम होगा कि प्राणी को प्रारब्ध (पिछले जन्म के कर्मों का फल) का फल अगले जन्म में भोगना पड़ता है | यदि शुभ कर्म आपने पूर्व जन्म में किया होगा तो यह जन्म शुभ घड़ी, शुभ मुहूर्त में हुआ। कर्म खराब थे सो अशुभ घड़ी में उत्पन्न हुए। जन्मकाल में ग्रहों की जो स्थिति होगी उसी अनुसार जातक को शुभ फल प्रदान करेंगे अथवा अशुभ होंगे। जबकि शनि को लोग अशुभ मानते हैं किन्तु सिर्फ मानना ही है शनि के प्रभाव से कितने लोग ऐसे हमारे बीच है जो करोड़ो-अरबों की सम्पत्ति के मालिक हैं।
एक जीते जागते व्यक्ति की कुण्डली प्रस्तुत कर रहे हैं जिन्हें शनि की शुभ-दशा ने शून्य से उठाकर कई करोड़ की सम्पत्ति का मालिक बनाया है। नाम न देकर केवल उनकी कुण्डली प्रस्तुत कर रहे हैं यह कुण्डली प्रस्तुत करने का मात्र उद्देश्य यही है कि शनि की शुभ-स्थिति जातक को करोड़ों का स्वामी बना देता है। किन्तु शनि के साथ अन्य ग्रहों की स्थिति भी शुभ हो।
निम्नलिखित कुछ स्थितियां प्रस्तुत कर रहे हैं जो जातक के लिए शनि की धनदायक स्थितियां हैं -
  • मेष लग्नस्थ जातक की कुण्डली में शनि, मंगल, वृहस्पति और शुक्र अपनी अपनी राशियों में विराजमान हो तो जातक अतुल धन-सम्पत्ति से पूर्ण हो सकता है।
  • मेष लग्न में शनि, मंगल, बुध और शुक्र का योग धनवान होने का कारक है। जातक करोड़पति हो सकता है।
  • मेष लग्न में उत्पन्न जातक की कुण्डली के वृष, कर्क, सिंह अथवा धनु राशि में वृहस्पति और चन्द्र कौ युति हो तो 'गजकेशरी योग' बनता है। ऐसे जातकों को अचनाक धन की प्राप्ति होती है।
  • यदि वृष लग्न के जातक कौ कुण्डली के पंचम भाव में राहु+शुक्र+मंगल+शनि की युति हो तो जातक महान धन सम्पत्ति वाला होगा। यह धनप्रदायक योग है।
  • वृष लग्न में शनि के साथ द्वितीय स्थान में बुध विराजमान हो तो धनप्राप्ति का योग बनता है।
  • मिथुन लग्न में चन्द्र, शनि के भाव में विराजित हो अर्थात्‌ कुम्भ राशि में हो तो जातक अपने कर्म के बल पर धनवान होगा।
  • वृष लग्न की कुण्डली के लग्न भाव में चन्द्र, कुम्भ में शनि, सिंह राशि में सूर्य और वृश्चिक राशि में वृहस्पति विराजमान हो तो जातक अत्यधिक धनवान हो सकता है। मोटर वाहन आदि से सम्पन्न होने का योग बनता है।
  • मेष लग्नस्थ कुण्डली के शनि भाव में शुक्र और शुक्र स्थान पर शनि विराजित हो तो जातक के भाग्य का सितारा चमकने का योग है। जातक अपने जीवन काल में अत्यधिक धन अर्जित कर सकता है। 
  • मिथुन लग्नस्थ जातक की कुण्डली के लग्न भाव में यदि शनि के साथ बुध विराजमान हो तो जातक शहर के धनी-मानी व्यक्तियों में से एक हो सकता है क्योंकि यह योग अधिक धन-प्रदायक है।
उपरोक्त शनि की कुछ विशेष स्थितियां हैं जो जातक के लिए धन-प्राप्त का योग बनाते हैं । इनके अलावा भी शनि अन्य कई स्थितियों में धन-प्रदाता है। पाठक उपरोक्त वर्णित भाग से अपनी जन्म कुण्डली का मिलान करके फल (शुभ-या-अशुभ) जान सकते हैं । विकट समस्‍याएँ उत्पन्न होने पर परामर्श आदि के लिए मुझसे भी सम्पर्क कर सकते हैं । मैं कोई बहुत बड़ा ज्योतिषाचार्य तो नहीं किन्तु ज्योतिष की पुस्तकों का गहन अध्यन करने के पश्चात्‌ कुछ ज्ञान अवश्य हो गया है । यदि आवश्यकता समझे तभी सम्पर्क करें वैसे इस पुस्तक का सृजन इतने सरल ढंग से किया गया है कि आप पाठक अपनी कुण्डली से शनि की स्थिति का स्पष्ट ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। 
अनेक ज्योतिष की पुस्तकों को पढ़ने के बाद ही मैंने यह निश्चय किया कि “शनि के उपाय एवम्‌ टोटके' नामक पुस्तक लिखना आवश्यक ही नहीं बल्कि अति आवश्यक है इसीलिए यह पुस्तक, अनेकों ज्योतिष की पुस्तकों से सहयोग एवम्‌ “गुरु' के आशीर्वाद से आप सभी के कल्याण की कामना करके लिख रहा हूं।

टिप्पणियाँ