माँ सरस्वती के चमत्कारी मंत्र | माँ सरस्वती साधकों को संदेश,Maa Sarasvatee Ke Chamatkaaree Mantr | Maan Sarasvatee Ke Saadhakon Ko Sandesh

माँ सरस्वती के चमत्कारी मंत्र | माँ सरस्वती साधकों को संदेश

माँ सरस्वती का दिव्य स्वरुप

ज्ञान-विज्ञान, साहित्य तथा विविध प्रकार की कलाओं की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती है, जो हंसवाहिनी है। 'हंस' शब्द ज्ञान और विवेक के अर्थ मे होने से ज्ञानी को 'हंस' शब्द से भी संबोधित किया जाता है।
माता सरस्वती के दोनों हाथों में वीणा रहती है, तो तीसरे हाथ में मोती की माला और चौथे में आगम की पोथी । जो व्यक्ति पूर्ण समर्पित भाव से ज्ञान की साधना करता है, कला की सिद्धी के लिये निरंतर प्रयत्नशील रहता है, माँ सरस्वती उसे अवश्य वरदान देती है। वाणी की देवी होने से, उन्हे 'वागिश्वरी' तथा श्वेतवस्त्रधारिणी होने से उन्हें 'शारदा' नाम से भी जाना जाता है। माँ शारदा की कृपा से मूर्ख भी पण्डित बन जाता है। कोई भी जाती, धर्म, वंश का व्यक्ति माँ सरस्वती का कृपा पात्र हो सकता है, जरुरत है केवल सच्ची श्रद्धा की। जिसके उपर माँ सरस्वती की कृपा हो जाती है, वह कम समय में भवसागर पार कर सकता है । श्रुत, वागेश्वरी, गीर्वाणी, वीणा-पाणी, शारदा, त्रिपुरा, ब्रह्माणी आदि उनके १०८ नाम है। वह कमल पर भी विराजमान रहती है। ऐसे माँ सरस्वती के चरणों में हम प्रार्थना करें-
'हे शारदे माँ ! हे शारदे माँ ! अज्ञानता से हमे तार दे माँ !'

Maa Sarasvatee Ke Chamatkaaree Mantr | Maan Sarasvatee Ke Saadhakon Ko Sandesh

श्री सरस्वती माता के चमत्कारी मंत्र

  • ऐं नमः । (मूल बीज-मंत्र)
  • ॐ ह्रीँ नमो अरिहंताणं वद वद वाग्वादिनि स्वाहा ।
  • ॐ क्लीं वद वद वाग्वादिनी ! ह्रीँ नमः ।
  • ॐ ह्रीं श्रीं ऐं हंसवाहिनी मम जिव्हाग्रे आगच्छ आगच्छ स्वाहा ।
  • ॐ ह्रीं श्राँ श्रीं यूँ श्रः हं तं यः यः ठः ठः ठः सरस्वती भगवती विद्या प्रसादं कुरु कुरु स्वाहा ।
  • ॐ ह्रीँ सरस्वत्यै नमः

माँ सरस्वती साधकों को संदेश

समयग्-ज्ञान की उपासना, ज्ञानवरणीय कर्मों की निर्जरा एवं स्मरण- शक्ती की बौद्धिक निर्मलता के लिए 'माँ सरस्वती' की जाप-साधना श्रेष्ठ अनुष्ठान है । जो मन्दबुद्धि है, बोलने में तुतलाते है, जिनके अस्पष्ट या अशुद्धउच्चारण है, जो अपनी बात सही तरीके से समझा न पाते है, जिनकी स्मरण-शक्ति कमजोर है, जिन्हें बुरे या दुर्विचार आते है अथवा ज्ञान के प्रति जिनकी रुचि न जगती है-ऐसे लोग सरस्वती जाप-साधना में अवश्य जुडे । स्मरण रहे कि माँ सरस्वती की जाप-साधना एक सात्विक व सम्यक् साधना है और इसका कोई बुरा प्रभाव नहीं पडता ।
  • मंत्र की सिद्धि व साधना की फलश्रुति के लिए १,२५,००० (सव्वा लाख) जप करने का लक्ष्य रखें। उससे कम ५१,००० (इक्यावन हजार), २७,००० (सत्ताईस हजार) अथवा १२,५०० (बारा हजार पांचसो) जाप का लक्ष्य तो रखा हो जाना चाहिए ।
  • उच्चारण पूर्वक जाप न करें, कोशिश करें कि जाप के दौरान होंठ व जीभ भी न हिलें; यह जाप की श्रेष्ठ प्रक्रिया है और उससे जाप अधिक सार्थक होते है।
  • किसी भी स्थान पर या किसी व्यक्ति के समक्ष मंत्र की चर्चा हरगीज न करें। स्मरण रहें कि मंत्र की चर्चा मंत्र की सिद्धि में बाधक होती है।
  • साधना के दिनों में ब्रह्मचर्य का पालन अवश्य करें, आहार पर संयम रखें और व्यसन मुक्त रहें ।
  • साधना-काल के दिनों में क्रोध, अभिमान, माया-कपट, लोभ, ईर्षा व राग-द्वेष से बचते हुए मन को निर्मल रखने का प्रयास करें। अधिक से अधिक मौन रखें, गलत स्थानों व गलत व्यक्तियों से दूर रहें और इस प्रकार साधना की उपलब्धियों की अनुभुति करें ।
साधना के साफल्य के लिए शक्ति व भावना हो तो उपवास, अन्यथा आयंबिल, एकासणा या बियासणा का पच्चक्खाण करें। यद्यपि तप करने का सामर्थ्य न हो, तो, कम से कम नवकारसी करे तथा रात्रि भोजन त्याग करे।
जाप के लिए नये अथवा धुले हुए सफेद वस्त्रों का परिधान आवश्यक है। साधको ने बैठने के लिए ऊन का सफेद कटासना (आसन) व सफेद माला का उपयोग करना चाहिए। कोशिश की जाये कि उस सफेद कटासने व माला का उपयोग केवल सरस्वती के जाप के लिए ही हो; अन्य किसी साधना के लिए न हो। इससे जाप साधना को पुष्टी मिलती है। मोती, स्फटीक अथवा सूत की माला भी उपयोग में ली जा सकती है।
माला पर जाप न करने के इच्छुक साधक उंगलियों पर जाप कर सकते है।

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