प्रथमं शैलपुत्री सम्पूर्ण जानकारी,Pratham Shailputri complete information

प्रथमं शैलपुत्री सम्पूर्ण जानकारी,Pratham Shailputri complete information

प्रथमं शैलपुत्री

महामाया जगज्जननी पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में उत्पन्न होने से देवी जगदम्बा 'शैलपुत्री' कहलाई। शैलपुत्री आद्यशक्ति तत्त्वातीत होते हुए भी सर्वतत्त्वमयी और प्रपञ्चरूपा हैं। वह नित्या, परमानन्द स्वरूपिणी तथा चराचर जगत् की बीज स्वरूपा हैं। यह प्रकाशात्मक शिव के स्वरूप ज्ञान की उद्बोधक दर्पण स्वरूप हैं। अहं ज्ञान ही शिव का स्वरूप ज्ञान है। आद्यशक्ति का आश्रय लिये बिना इसका आत्मज्ञान नहीं होता। आत्मशक्ति का दर्शन एवं आत्मस्वरूप की उपलब्धि और आस्वादन एक ही वस्तु है। वस्तु का सामीप्य सम्बंध न होने पर जैसे दर्पण प्रतिबिम्ब को ग्रहण नहीं कर सकता अथवा वस्तु का सानिध्य होने पर भी प्रकाश के अभाव से दर्पण में स्थित प्रतिविम्ब जैसे प्रतिबिम्ब रूप में नहीं भासता, उसी प्रकार शैलपुत्री भी प्रकाशरूप परम शिव के सानिध्य के बिना अपने अन्तः स्थित विश्वप्रपंच को प्रकटित करने में समर्थ नहीं होती। अतः शैलपुत्री के इस व्रत में भगवान सदाशिव का भी ध्यान किया जाता है।

Pratham Shailputri complete information

भगवती शैलपुत्री का वाहन वृषभ (बैल) है। उसके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बायें हाथ में कमल का पुष्प है। इस स्वरूप का नवरात्र के प्रथम दिन पूजन किया जाता है। दृढ़ संकल्प शक्ति के कारण ही अपनी तपस्या से शैलपुत्री ने प्राणनाथ रूप में सदाशिव को वरण किया था। यही कारण है शैलपुत्री की आराधना से इच्छाशक्ति में दृढ़ता का आविर्भाव होता है। प्राणी अपने लक्ष्य को निश्चित रूप से प्राप्त करता है। यहां यह भी स्मरणीय है कि इच्छाशक्ति की दृढ़ता में अहंकार का मिश्रण कदापि नहीं होना चाहिए।

माँ भगवती शैलपुत्री की पूजा मुख्य रूप से तीन उपचार रूप में की जाती है-
  1. पञ्चोपचार विधि - 1. गंध, 2. पुष्प, 3. धूप, 4. दीप, 5. नैवेद्य । (इस उपचार विधि का प्रयोग विशेष परिस्थिति; जैसे-यात्रा समय, प्रवास, निर्धनता में सामान्य रूप में किया जाता है।)
  2. दसोपचार विधि-1. पाद्य, 2. अर्घ्य, 3. आचमन, 4. स्नान, 5. वस्त्र निवेदन, 6. गन्ध, 7. पुष्प, 8. धूप, 9. दीप, 10. नैवेद्य ।
  3. सोलहोपचार विधि-1. पाद्य, 2. अर्घ्य, 3. आचमन, 4. स्नान, 5. वस्त्र, 6. आभूषण, 7. गन्ध, 8, पुष्य, 9. धूप, 10. दीप, 11. नैवेद्य, 12. आचमन, 13. ताम्बूल, 14. स्तवपाठ, 15. तर्पण, 16. नमस्कार ।

पूजा सामग्री रखने के स्थान 

  • बायीं ओर-(1) सुवासित (गुलाब या कमल सुगंध से युक्त) जल से भरा जल-पात्र, (2) घंटा, (3) धूपबत्ती या अगरबत्ती, (4) तेल तेल (तिल का) का दीपक बायीं ओर रखें।
  • दायीं ओर (1) घी का दीपक, 2. सुवासित जल से भरा शंख/नारियल की कटोरी। दूसरा अन्य पात्र।
  • सामने-(1) कुमकुम (केशर) और कपूर के साथ पिसा गाढ़ा चंदन। (2) पुष्प आदि अन्य सामान। (चंदन को ताम्रपात्र में न रखें)।

शैलपुत्री पूजा-विधान

शैलपुत्री का ध्यान व पूजनं पूर्व दिशा की ओर मुख करके करना चाहिए। ऐसे साधक या साधिका जो नवरात्र के प्रथम व अंतिम दिन ही उपवास करते हैं उन्हें इस दिशा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। अपने बालों पर जल लगाकर या जल से धोकर शिखा बंधन करके ही बैठना चाहिए। तत्पश्चात् निम्न मंत्र से तीन वार आचमन करें।

आचमन-ॐ गणेशाम्बिकाभ्यां नमः ॥
ॐ शैलसुतायै नमः ॥
ॐ शैलपुत्र्यै नमः ॥
आचमन करने के बाद प्रथम घी का दीपक जलायें। पुनः तेल का दीपक जलायें। जिस लकड़ी या तीली से घी का दीपक जलाया है उससे तेल का दीपक न जलाएं।
  • आंवाहन-माँ शैलपुत्री को निमंत्रित करना आवाहन है। हाथ में पुष्प लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें, फिर उस पुष्प को देवी के चरणों में अर्पित करें- 
शैलपुत्री  माँ भवानी आइये स्थिर रहो।
जबतलक पूजा करूं माँ तबतलक सन्निध रहो।।
श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। 
शैलपुत्रीम् आवाहयामि पुष्पांजलिं समर्पयामि। 

(पुष्प अर्पित करें।)

आसन-लाल वस्त्र को चौकी पर बिछाकर चावल से चंद्राकार आकृति बनाकर माता के बैठने के लिए आवाहित करें। नाना मणियों रत्नों से युत यह दिव्य स्वर्णमय आसन है। 

ग्रहण करो हे जगदम्बे बिन तेरे को दुःख नाशन है।
श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। आसनार्थे रक्तवस्त्रं समर्पयामि।
(लाल कपड़े पर जहां चंद्राकार आकृति बनाई है उस पर माता शैलपुत्री को स्थापित करें। निम्न मंत्रों से चार बार पाद्य, अर्घ्य आचमन तथा स्नान हेतु जल दें।)

ॐ शैलपुत्र्यै नमः। पाद्यं समर्पयामि। 
(दोनों पैरों पर जल चढ़ायें।) 
ॐ शैलसुतायै नमः । अर्घ्य समर्पयामि।
 (दोनों हाथों को जल से धुलायें।) 
ॐ हिमात्मजायै नमः। आचमनं समर्पयामि।
 (जल को अपनी अंजली में रखकर देवी के मुख से स्पर्श करें, पुनः हाथ धो लें।)
 ॐ सत्यै नमः। स्नानं समर्पयामि। 
(इस मंत्र से देवी को सुगधित जल से स्नान करायें।)
पंचामृत स्नान-दूध, दही, घी, बूरा और शहद- इन पांच वस्तुओं से बने पंचामृत से देवी को निम्न मंत्र द्वारा पंचामृत स्नान करायें-

दूध दही घृत और मधु शर्करा मिलाकर लाया हूं।
स्नान करो पंचामृत से भय दूर रहें हरषाया हूं।॥
श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। पञ्चामृतं समर्पयामि।

आलोक-दूध की आधी मात्रा में दही, दही का आधा बूरा, बूरा का आधा घी तथा घी के बराबर शहद डालना ही पंचामृत है.।.

शुद्धोदक स्नान-पंचामृत स्नान के बाद जल से स्नान कराना शुद्धोतक स्नान है। शुद्धोदक जल में गुलाब की पंखुरी या गुलाब जल डाल देना चाहिए। वस्त्र-जल द्वारा अभिमंत्रित कर वस्त्रों को अपने दाहिने हाथ में रखकर निम्न मंत्र पढ़ें-
हे   
दुःखनाशिनी शैलजा! कृपा करो पट धारो। 
यह कञ्चुक पट युग्म समर्पितभवसागर से तारो ॥
श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। वस्त्रोपवस्त्रं कञ्चुकीयं च समर्पयामि ॥

• (वस्त्र या पांच कलावा सूत्र अर्पित करें, पुनः आचमन करायें।)
सौभाग्य सूत्र-अपने हाथ में कलावा लेकर उसको हार का रूप दें। उस पर जल से अभिमंत्रण निम्न प्रकार से करें-

स्वर्ण मणी से युक्त  सूत्र सौभाग्य गले में धारो।
भाग्यवान हों भक्त तुम्हारे सबको शीघ्र उबारो॥
कण्ठे बध्नामि देवेशि सौभाग्यं देहि मे सर्वदा ॥
भाग्यवान हों भक्त तुम्हारे सूत्र सौभाग्य गले में धारो। 
श्री जगदम्बादै शैलपुत्र्यै नमः। सबको शीघ्र उबारो॥

 सौभाग्य सूत्रं समर्पयामि। (अभिमंत्रित किये कलावा सूत्र को माँ के गले में धारण करायें। पुरुष माँ के दाहिने हाथ में
पहनायें ।) चन्दन-शैलपुत्री को सफेद चंदन अति प्रिय है, अतः सफेद चंदन का प्रयोग
करें अथवा लाल चंदन में कपूर डालकर इस मंत्र को बोलें-

यह चन्दन श्रीखण्ड दिव्य सुरक्षित मन को हरने वाला।
हे शैलसुते तुझको अर्पित सुन्दर तन पे रहने वाला॥

श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। विलेपनार्थं चन्दनं समर्पयामि। (देवी के मस्तक पर चंदन लगाएं। महिलाएं माँ की भुजाओं, हृदयादि प्र भी श्वेत चंदन लगा सकती हैं।) हरिद्रा-चूर्ण- (हल्दी-चूर्ण का प्रयोग सौभाग्यवती स्त्रियां ही करें) निम्न मंत्र  से हरिद्रा को जल में डालकर गाढ़ा लेप बनाएं। सुख सौभाग्य प्रदायक यह हल्दी तुझे समर्पित है
सुख-शान्ति प्रदान करो अम्बे । यह मन मेरा अति हर्षित है।
श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। हरिद्रां समर्पयामि। (हल्दी का लेप करके हाथ जोड़ें।)

कुमकुम-हाथ में रोली लेकर निम्न मंत्र से मस्तक पर लगायें- सकल कामनादायक है। यह कुमकुम सदा सहायक है। यह कुमकुम तुझे समार्पित है तन मन धन मेरा अर्पित है। श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। कुंकुमं समर्पयामि। (इस मंत्र से रोली या बिंदी लगायें।)

सिन्दूर- भक्ति भाव से हे शैलेश्वरि सिन्दूर तुम्हें चढ़ाता हूं। स्वीकार करो वर दो माते यह सुन्दर गीत सुनाता हूं। श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः।  सिन्दूरं समर्पयामि। (जगज्जननी शैलपुत्री की मांग में चांदी या सोने की सलाई में सिंदूर लगायें। इसके अभाव में विल्वपत्र की दण्डी से माँ को सिंदूर लगायें।) कज्जल (काजल)- 

कर्पूर ज्योति से बना दिव्य यह काजल तुम्हें लगाता हूं। 
ग्रहण करो श्री नेत्रों में माँ ! जीवन का फल पाता हूं।।
 श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। कज्जलं समर्पयामि।
 (माँ की आंखों में चांदी या सोने की सलाई से काजल लगायें। अथवा अपने दाहिने हाथ की मध्यमा से दाहिनी तथा अनामिका से बायीं आंख में काजल लगायें।) दूर्वांकुर - 

तृणकान्त मणिसुन्दर पूर्वा से पूजा करूँ तुम्हारी।
 चरणों में तेरे अर्पित है माँ रखो लाज हमारी॥ 
श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। दूर्वांकुरान् समर्पयामि ॥ 
शैलपुत्री को कुछ विद्वान दूर्वा चढ़ाना निषेध करते हैं।

अतः दूर्वा को माँ के चरणों में चढ़ायें। विल्वपत्र- त्रिदल जहाँ गुण तीन नेत्र त्रय आयुष तीन जहां है। तीन जन्म के पाप कटे जो दूर, पत्र यहाँ है। श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। विल्वपत्रं समर्पयामि। (शैलपुत्री को विल्वपत्र अति प्रिय है। अतः विल्वपत्र का त्रिदल माँ शैलपुत्री को अर्पित करें।) विल्वपत्र की मात्रा 5, 11 या 21 आदि होनी चाहिए। कटा, फटा तथा कीट द्वारा काटा गया विल्वपत्र न चढ़ायें। विल्वपत्र एक बार चढ़ा देने पर भी खराब नहीं होता अतः उन्हें उतारकर जल से धोकर बार-बार चढ़ाया जा सकता है।

विल्वपत्र विशेष-उपरोक्त मंत्र से शिव तथा शैलपुत्री के समक्ष विभिन्न प्रयोगों द्वारा विल्वपत्र अर्पण करने से विभिन्न कार्यों का लाभ प्राप्त होता है। यहां कुछ ज्वलंत विषयों पर विल्वपत्र चढ़ाने का उपाय दिया जा रहा है। यहां स्मरण रहे विल्वपत्र तोड़ते समय विल्वपत्र के पत्ते की डंडी का वह भाग जो तने से लगा होता है उसे अलग करके ही विल्वपत्र दल चढ़ाना चाहिए। विल्वपत्र चढ़ाने का समय सूर्योदय तथा सूर्यास्त सर्वश्रेष्ठ है।
सर्वार्थसिद्धि प्राप्त करने के लिये मंत्र-सर्वप्रथम पांच, सात अथवा ग्यारह विल्वपत्र निम्न मंत्र से शिवा और शिव को अर्पण करें-

मंत्र-

त्रिदल त्रिगुणाकारं त्रिनेत्र च त्रिधायुतम्।
त्रिजन्मपाप संहारं विल्वपत्रं शिवार्पणम्॥
ॐ शं शैलपुत्र्यै नमः। विल्वपत्रं समर्पयामि ॥

उसके बाद ॐ शं शैलपुत्र्यै नमः। विल्वपत्रं समर्पयामि मंत्र से पंचामृत - में भिगोते हुए 1, 008 विल्वपत्र शिवा और शिव को समर्पित करना चाहिए। शेष बचे पञ्चामृत को हाथ में रखकर ही ग्रहण करना चाहिए। पंचामृत चांदी, मिट्टी अथवा चीनी के बर्तन में ही रखना चाहिए। पंचामृत केवल बछड़े वाली गाय का दूध, दही, गोघृत, गुड़ या शक्कर, शहद का बनायें। ज्वर निवारण के लिए मंत्र-सर्वप्रथम नीम के पेड़ से प्राप्त शहद से बारह विल्वपत्रों, पर 'शं' शब्द तीनों पत्तों पर लिखें तथा निम्न मंत्र से शैलपुत्री को अर्पण करें-
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं शं शैलपुत्र्यै ज्वरं कीलय-कीलय शौर्यवपुं प्रदाय-प्रदाय 
ॐ शं श्रीं ह्रीं ऐं ॐ। शैलपुत्र्यै नमः। विल्वपत्रं समर्पयामि ॥

इसके बाद- 'ॐ ऐं ह्रीं ह्रीं शं शैलपुत्र्यै नमः' इस मंत्र से गोदूध से भगवती को 2001 तुलसी दल भिगोकर अर्पित करें। यदि रोग अत्यंत पुराना हो गया हो तो कृष्णा तुलसी का. प्रयोग करना चाहिए। उसके बाद शेष बचे दूध में शहद मिलाकर रोगी को पिला दें।

वर-प्राप्ति हेतु मंत्र-जिस कन्या का विवाह न हो रहा हो अथवा विवाह में किसी भी प्रकार की अड़चन आ रही हो-ऐसी कन्या को अनार की डंडी की कलम. बनाकर सौभाग्य सिंदूर को गंगाजल में घोलकर अपनी इच्छा के अनुरूप वर के गुण आदि को लिखकर पहले इस मंत्र की ग्यारह (एक सौ आठ वाली) तुलसी माला से जप करें, फिर शैलपुत्री को अर्पण कर दें। जप करते समय लिखा प्रपत्र अपनी जंघा या हृदय पर धारण करें। मंत्र अग्र प्रकार है

मज्जनु करि सिय सखिहिं समेता। गई मुदित मन गौरी निकेता ॥
पूजा कीन्ह अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग वरू मांगा ॥

इस जप के करने से शीघ्र ही कन्या अपने घर चली जाती है। विवाह के उपरान्त इस प्रपत्र को केवल जीवन साथी के साथ गंगा में विसर्जित कर देना चाहिए। इस कार्य में अधिक विलम्ब न करें।
पुष्पमाला - 
अति सुगंधित मालती की माल गले पहनाऊं।
अपने ही द्वारे लाये इनपुष्पों को तुम्हें चढ़ाऊं।
श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। पुष्पमालां समर्पयामि। 
इस मंत्र से पुष्प और पुष्पमाला चढ़ाएं। यद्यपि भगवती को अनेक पुष्म चढ़ाये जाते हैं तथापि कुछ पुष्प चढ़ाने से तात्कालिक कष्टों का निवारण। होता है। । पुष्प चढ़ाते समय सर्वप्रथम राशि के अनुसार दिए गए मंत्र से विषम संख्या (5, 7, 9, 11 आदि) में पुष्प अर्पित करें, उसके बाद शेष बचे तथा अन्य दूसरे पुष्पों को चढ़ाने से धन, ऐश्वर्य तथा सौभाग्य मिलता है।
Chart 1
आभूषण 
हार कंकण मेखला
 केपूर कुण्डल आदि हैं।
 हीरों से जड़ा रत्न-भूषण
 लेकर हरती भव व्याधि है।
इस मंत्र का उच्चारण करते हुए स्त्री जिस-जिस क्रम में स्वयं आभूषण धारण करती है उस-उस क्रम में आभूषण माँ शैलपुत्री को समर्पित करें। यदि न कर सकें तो मंत्र के अंत में 'ॐ जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः । आभूषणं मनसा समर्पयामि।' इस मंत्र को बोलकर चंदन से देवी के उस-उस अंग का स्पर्श करें।
नाना परिमल द्रव्य- अबीर गुलाल हरिद्रा से है युक्त द्रव्य नाना परिमल।
 ग्रहण करो माँ शैलसुता मारो अन्तर के घल दल बल ॥ 
श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। नाना परिमलद्रव्याणि समर्पयामि ॥

 (इस मंत्र से अबीर, गुलाल, हल्दी-चूर्ण, भुड़भुड़ चढ़ायें ।)
सौभाग्यपेटिका- हल्दी कुंकुम सिन्दूर भरी सौभाग्य पेटिका लो माता आदिशक्ति हैं 
जगदम्बे तुम बिन जग में को फलदाता ॥
श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः। सौभाग्यपेटिकां समर्पयामि।
 (इस मंत्र से सौभाग्यवती स्त्री को जो शृंगार वस्तु होती हैं वे सभी स्वेच्छा से शैलपुत्री को अर्पित करनी चाहिएं।)

धूपबत्ती-भगवती शैलपुत्री को अपने दाहिने हाथ को बायीं ओर ले जाकर पुनः ऊपर की ओर ले जाते हुए वृत्त क्रम में धूपबत्ती को घुमाना चाहिए घुमाते समय एक बार मुख पर, तीन बार मस्तक पर, तीन बार हृदय पर, चार बार चरणों की ओर घुमाकर पुनः पांच या सात बार सम्पूर्ण प्रतिमा के चारों ओर घुमाएं, उसे माँ के बायीं ओर स्थापित करना चाहिए।

दीपक-एक विल्वपत्र को नीचे की ओर पलटकर रखें। पत्र रखते समय विल्वपत्र की डंडी को अपने अंगूठे तथा अनामिका अंगुली से पकड़कर रखना चाहिए। पहले दीपक को जलायें। फिर कुछ चावल पुष्प विल्वपत्र पर रखें तब जलते दीपक को विल्वपत्र पर स्थापित करें। दीपक जलाने के बाद हाथ धो लेना चाहिए। धूप-गाय के गोबर से बने उपले को जलाकर माँ भगवती का ध्यान करके, घी में लोंग का जोड़ा चढ़ाना चाहिए। लोंग के जोड़े नैष्टिक ब्रह्मचारी को पांच, ब्रह्मचारी को एक तथा गृहस्थी को दो-दो चढ़ाने चाहिएं। लौंग को चढ़ाते समय ॐ शं शैलपुत्र्यै नमः का उच्चारण करना चाहिए। पुनः इसी मंत्र से माँ भगवती को ऋतुफल अर्पण करना चाहिए। शैलपुत्री को अकेला फल या केवल केले नहीं चढ़ाने चाहिएं। दो फल या अधिकं से भोग देना चाहिए। नैवेद्य-  दूध, दही, घी, शक्कर से तैयार तुम्हारा भोजन है आहार स्वीकार करो देवी ए तरसत मेरे लोचन हैं।॥ (इस मंत्र से तुलसीदल सहित नैवेद्य अर्पण करें।)

ताम्बूल - नागबल्ली से भरा यह महादिव्य पुंगीफल है।
 लवंग-इलायची भी इसमें ताम्बूल समर्पित शुभ पल है। 
श्री जगदम्बायै शैलपुत्र्यै नमः । ताम्बूलं समर्पयामि।

 (इस मंत्र से इलायची, लोंग, सुपारी तथा जायफल के साथ पान निवेदन करें।

ध्यान-हाथ में सफेद या राशि में दिए किसी एक पुष्प को लेकर माँ भगवती शैलसुता का निम्न मंत्र से ध्यान करें-
वन्देवाच्छितलाभाया चन्द्रर्घकृतशेखराम्। 
वृषारूढ़ां शूलपरां शैलपुत्री यशस्विनीम्॥ 
पूणेन्दू निभां गौरी मूलाधारं स्थितां प्रणम दुर्गा त्रिनेत्रा । 
पटाम्बर परिधानां रत्नकिरीटा नानालंकार भूषिता ॥
प्रफुल्ल वदनां पल्लवाधरां कातंकपोलां तुब कुचाम। 
\कमनीयां लावण्यां स्मेरमूखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥
कवच-पीली सरसों लेकर अपने चारों ओर डालते हुए इस इस मंत्र मंत्र को बोलें- 

ओमकारः मे शिरः पातु मूलाधार निवासिनी।
हीँकारः पातु ललाटे बीजरूपा महोश्वरी ॥
श्रीकारः पातु वदने लज्जारूपा महेश्वरी।
हंकारः पातु हृदये तारिणी शक्ति स्वघृता.
फट्कार पातु स्वर्वांगे सर्वसिद्धि फलप्रदा। 

स्तोत्र-ध्यान और कवच के बाद निम्न स्तोत्र का पाठ करें-


प्रथम दुर्गा त्वंहि भवसागर तारणीम्। 
धमन ऐश्वर्य दायिनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥
त्रिलोकजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयनाम् । 
सौभाग्यरोग्यं दायनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम् ॥
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह विनाशिन । 
मुक्ति, भुक्ति दायनी, शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥ 
चराचरेश्वरी त्वंहि महामोह विनाशिन। 
भूक्ति, मुक्ति दायिनी शैलपुत्री प्रणमाम्यहम्॥

शैलपुत्री के जपनीय मंत्र-


वंदे वांछित लाभाय चन्द्रार्ध शेखरम्।
वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशश्विनीम्॥
  1. ॐ शं शैलपुत्र्यै नमः ।
  2. ॐ शैलजादेव्यै नमः ।

शैलपुत्री के रूप में प्रथम कन्या का पूजन-शैलपुत्री के रूप में प्रथम नवरात्र को या नवरात्र की अंतिम तिथि को प्रथम कन्या के रूप में 'कुमारी' का पूजन किया जाता है। 'कुमारी' के लिए दो वर्ष की कन्या का पूजन करना चाहिए।
निम्न मंत्र से शैलपुत्री को भोज्य पदार्थ अर्पित करें-

जगद् पूज्ये जगद् वन्द्ये सर्वशक्ति स्वरूपिणि ।
पूजां गृहाण कौमारि! जगन्म तर्नमोऽस्तुते॥
प्रथम नवरात्र में सिद्धिदायक मंत्र, यंत्र तथा टोने-टोटके इस प्रकरण में हम अपने जीवन को सुख, सौविध्य और सर्वेश्वर्य सम्पन्न करने के लिए मंत्र, यंत्र तथा टोने-टोटकों के माध्यम से बनाने के विषय में चर्चा करेंगे।

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आरती शैलपुत्री की

ॐ जय शैलसुते मैया जय शैलसुते।
भयहारिणि भवतारिणी पार्वती तू वर दे॥ 
द्याता स्वरूप धरिकै रचि सृष्टि सारी। 
पालौ प्रजा अखिल अच्युत भेषधारी ॥ 
नाशौ बहोरि सब शंकर अंक आयीं ॥ 
लीला अपार तव अंब न जाय गायी ॥ 
भावी अतीत अरू संप्रति काल ज्ञाता। 
तू ही सतोरज तमोगुण-पूर्णा-गाता॥ 
आद्यांतहीन, अखिलेश्वरि तू ही एका।
 है तू ही जाहि जपते तपसो अनेका॥ 
सप्रेम पूजि जिनको नर नेमधारी। 
पावें कवीन्द्र पद पावन कीर्तिकारि ॥ 
 नावें नृदेव निज पायन पै स्वमाथा। 
दंड़प्रणाम तिनको ममजोरि माथा ॥ 
ब्रह्मा, विष्णु निधिनायक नीरनाथा। 
सानन्द जासुगुण गावत जोरि हाथा॥ 
 सद्कीर्ति तासुयह पावर ज्ञानहीना। ॥
 कहे किमि महामतिमंद हीना ॥ 
पीयूषपूर्ण दृग तू जननी हमारी। 
संताप तप्ततन बालक मैं दुखारी॥
संबंध सत्य अस मातु हिये बिचारी। 
कीजै यथा उचित देवि ! हमें निहारी॥ 

इन मंत्र, यंत्र तथा टोने-टोटकों में मंत्र का प्रयोग साधक को गुरु द्वारा दीक्षा लेकर पूर्ण करना चाहिए तथा समस्त क्रियाविधि का पूर्ण पालन करते हुए करना चाहिए। माँ भगवती के प्रत्येक अनुष्ठान में शौच शुद्धता अति अनिवार्य है।
प्रकरण-
मंत्र भक्ति-प्राप्ति हेतु मंत्र-माँ भगवती शैलपुत्री की भावभीनी कृपा प्राप्त करने के लिये कुशासन पर बैठकर पूर्वाभिमुख होकर र माँ भगवती का ध्यान करें, पश्चात् पञ्चमुखी रुद्राक्ष की माला से निम्न मंत्र का 31,000 जप दशांश हवन, दशांश तर्पण तथा दशांश मार्जन करना चाहिए। एक समय फलाहार रहकर जप संख्या पूर्ण करना चाहिए पश्चात् दो वर्ष की नौ कन्याओं को भोजन तथा दक्षिणा से संतुष्ट करना चाहिए। भोज्य पदार्थ में बेलपत्थर का हलुआ देने से शीघ्र शैलपुत्री प्रसन्न होती हैं। मंत्र इस प्रकार है-

ॐ त्वं परा प्रकृतिः साक्षाद् ब्रह्मणः परमात्मनः 
त्वत्तो जातं जगत्सर्वं त्वं जगज्जननी शिवे॥

स्वकार्य की प्रशंसा के लिए मंत्र-अक्सर लोगों को कहते सुना जाता है कि हम अपने कार्यक्षेत्र में काफी परिश्रम से कार्य करते हैं, कार्य सफल भी हो जाता है परन्तु हमारे अधिकारी हमें प्रशंसा के दो शब्द भी नहीं कहते हैं उसके स्थान पर किसी दूसरे विषय को लेकर झिड़क देते हैं या कह देते हैं-"यह कार्य कर आपने कोई किला नहीं जीत लिया।" इस कार्य से दुःख तो होता ही है, मन में ठेस भी होती है। इससे अधिक मन अशान्त तो तब होता है जब आपके किए
कार्य की प्रशंसा किसी और को मिलती है। इस मंत्र का कम से कम 21,000 जप करना चाहिए।
विष्णोर्माया भगवती यमा सम्मोहितं जगत्।
'आदिष्टा प्रभुणांशेन कार्यार्थे सम्भविष्यति ॥
स्त्री वशीकरण मंत्र-अज्ञानता या भ्रमवश जिस पुरुष को अपनी पत्नी के प्रति यह भय उत्पन्न हो जाए कि मेरी पत्नी मुझे तलाक दे देगी या मुझसे तलाक मांग लेगी। अथवा पत्नी येन-केन-प्रकारेण हावी रहती हो उसके चले जाने या आत्महत्या करने का भय हो; अर्थात् गृहस्थ डांवाडोल हो रहा हो तो इस मंत्र के करने से घर में शान्ति आती है। अपने घर गयी पत्नी आ जाती है। इस मंत्र को जपते समय कमलगट्टा की माला से 51 या 101 माला का जप करना चाहिए।
लाल और पीला पुष्प देवी शैलपुत्री को भेंट करना चाहिए- 
इयं गेहे लक्ष्मी रियममृतवर्त्तिर्नयनयो,
 रसावस्याः स्पर्शों वपुषि बहलश्चन्दनरसः । 
अयं कण्ठे बाहुः शिशिर मसृणो मौर्वतकसरः,
किमस्या न प्रेयो यदि परमसद्यस्तु विरहः॥
दुःख तथा दारिद्र्य निवारण के लिए दरिद्रता के नाश के लिए तथा दुःख के निवारण के लिए निम्न मंत्र का कमलगट्टा या रुद्राक्ष की माला से 21,000 का जप करें, पुनः 210 या 2,100 गुलाब या कमल के पुष्पों को भगवती शैलपुत्री को अर्पण करने से दरिद्रता का नाश तथा सुख की प्राप्ति होती है। मंत्र इस प्रकार है-

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो,
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीत शुभां ददासि । 
दारिद्रय दुःख भयहारिणि का त्वदन्या,
सर्वोपकार करणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता ॥

 इस मंत्र की एक माला प्रतिदिन करने से भी माँ भगवती शैलपुत्री प्रसन्न होती हैं और शनैः शनैः इच्छित फल देती हैं।
सुलक्षणा पत्नी की उपलब्धि के लिए मंत्र-इस मंत्र का प्रतिदिन 5 या उससे अधिक माला जप करने से शीघ्र ही उत्तम कुल की कुलीन कन्या की प्राप्ति होती है। इस मंत्र को सावधानीपूर्वक शुद्ध उच्चारण के साथ ही करना चाहिए।

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। 
तारिणीं दुर्ग संसार-सागरस्य कुलोद्भवाम्॥

अतुल धन-धान्य प्रयोग हेतु मंत्र-धन-धान्य से परिपूर्णता प्रदान करने वाली अन्नपूर्णा माता शैलपुत्री की साधना की जाती है। यह वह मंत्र है जो द्रोपदी ने अपनी सिद्धि से अक्षय पात्र प्राप्त किया था जिसके फलस्वरूप उस छोटे पात्र का अन्न तब तक खत्म नहीं होता था जब तक स्वयं द्रोपदी भोजन नहीं कर लेती थी। माता शैलपुत्री ने साध्वी द्रोपदी को प्रसन्न होकर दिया है। कुशासन पर उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें ६। षोडशोपचार विधि से पूजन कर माता अन्नपूर्णा के निम्न मंत्र को प्रत्येक अन्नपूर्णा स्तोत्र मंत्र के आगे और पीछे सम्पुट लगाएं। मंत्र और अन्नपूर्णा स्तोत्र दिया जा रहा है- 

अन्नपूर्णा मंत्र-

ॐ ह्रीं नमो भगवती अन्नपूर्णे स्वाहा।

अन्नपूर्णा स्तोत्र

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी, 
निर्भूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्ष माहेश्वरी। 
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी, 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥1॥ 
नाना रत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी, 
मुक्ताहारविलम्ब मानविल सद् वक्षोजकुम्भान्तरी। 
काश्मीरागरुवासितांगरुचिरे कांशीपुराधीश्वरी,
 भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥2॥ 
योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी, धमार्थनिष्ठाकरी, 
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी समानलहरी त्रैलोक्य रक्षाकरी।
 सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी,
 भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥३॥
 कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शंकरी, 
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओंकारबीजाक्षरी।
 मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी,
 भिक्षां देहि कृपालम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥4॥ 
दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्ड भाण्डोदरी, 
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञा विज्ञान दीपांकुरी।
 श्री विश्वेशमनः प्रसादनकारी काशीपुराधीश्वरी, 
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥5॥ 
उर्वोसर्वजनेश्वरी भवगती मातान्नपूर्णेश्वरी, 
वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी।
 सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी,
 भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥6॥ 
आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी,
 काश्मीरत्रिजतेश्वरी त्रिलहरी नित्यांकुरा शर्वरी। 
कामाकांक्षकरी जनोदयकरी काशी काशीपुराधीश्वरी,
 भिक्षां देहि कृपावलम्बन करी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥7॥ 
देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी, 
वामं स्वादु पयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी। 
भक्ताभीष्टकरी सदाशुभकरी काशीपुराधीश्वरी ॥
 भिक्षां देहि देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥8॥ 
चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशु बिम्बाधरी,
 चर्चाग्निसमानकुन्तलघरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी। 
मालापुस्तकपाशसांकुशधरी काशीपुराधीश्वरी,
 भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥9॥ 
क्षत्रत्राणकरी महाऽभवकरी माता कृपासागरी, 
साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरी श्रीधरी। 
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी,
 भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥10॥ 
अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे । ज्ञान
 वैराग्यसिद्धयर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥11॥ 
माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः । 
वान्धवाः शिव भक्ताश्च सवदेशो भुवनत्रयम्॥12॥ 

उत्तम वर प्राप्त करने के लिए मंत्र-देवी यंत्र स्थापित करके स्फटिक की माला से निम्न मंत्र की प्रतिदिन सात माला जप करने से शीघ्र ही कन्या को उत्तम वर की प्राप्ति होती है-
हे गौरि शंकरार्धागि यथा त्वं शंकरप्रिया । तथा माँ कुरु कल्याणि कान्ताकान्ता सुलभाम्॥ ऋणहर्ता गणेश मंत्र-धन-धान्यप्रदाता गणेश जी का कोई भक्त यदि ऋणग्रस्त हो तो यह मंत्र नियमित जप करे और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा रविवार में आरम्भ करे तो गणेश तथा माता शैलपुत्री की कृपा से धन-धान्य से पूर्ण हो जाता है। वह इतना समर्थ हो जाता है कि अपने ऊपर लदा ऋण-भार उतार सके और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर सके। 
  • विनियोग
ॐ अस्य श्री ऋणहरणकर्तृ गणपति स्तोत्र मंत्रस्य सदाशिव ऋषिः,
अनुष्टुप् छंद, श्रीऋणहर्तुगणपतिदेवता ग्लौं बीजं गः  
शक्तिः गाँ कीलकं, मम सकल ऋणनाशने जपे विनियोगः।

  •  ध्यान-स्तुति
ॐ सिंदूरवर्णं द्विभुजं गणेशं, 
लम्बोदरं पद्मदले निविष्टम्।
 ब्रह्मादिदेवैः परिसेव्यमानं,
 सिद्धैर्युतं प्रणमामि देवम्॥

सृष्ट्यादी ब्रह्माणा सम्यक् पूजितः फल सिद्धये। 
सदैव पार्वती पुत्रः, ऋणनाशं करोतु मे ॥ 
त्रिपुरस्य वधात् पूर्वं शंभुना  सम्यगर्चितः ।
सदैव पार्वती पुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥
सदैव पार्वती पुत्रः ऋणनाशं करोतु मे ॥
 हिरण्यकश्यप वादीनां वधार्थे विष्णुनार्चितः । 
 सदैव पार्वती पुत्र ऋण नाशं  करोतु मे ॥ 
महिषस्य वधे देव्या गणनाथ प्रपूजितः । 
सदैव पार्वती पुत्रः ऋणनाशं  करोतु मे ॥

ॐ गणेश ऋणं छिन्धि वरेण्यं हूं नमः फट्।

लम्बाई बढ़ाने हेतु-चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रतिदिन पंचमुखी रुद्राक्ष की माला से निम्न मंत्र का 11 माला जप करें, जपोपरान्त माला को गंगाजल में डाल दें। शाम को माँ भगवती की माला से रक्तपुष्प (विशेषतः गुलाब) का एक पुष्प लेकर उसे भी गंगाजल में डाल दें। माँ भगवती की आरती कर पुष्प को पवित्र स्थान पर रखें और रुद्राक्ष की माला निकालकर जल को तीन छूट में क्रमशः ॐ ऐं, ॐ ह्रीं, ॐ क्लीं का उच्चारण कर पीलें। बाद में एक माला का जप करें। मंत्र इस प्रकार है-

गवां सर्वांगजं क्षीरं स्रवेत् स्तनमुखाद्यथा। 
तथा सर्वत्रगो देवः प्रतिमादिषु राजते ॥

यह कार्य दशमी तक प्रतिदिन करें। देवी प्रतिमा के साथ गौ-बछड़े को दूध पिलाती हुई की प्रतिमा या मूर्ति रखना अनिवार्य है।

शैलपुत्री के वाहन का रहस्य

इन नव शक्तियों में प्रथम ब्राह्मी शक्ति है। ब्राह्मी सृष्टि-शक्ति को कहते हैं। अखण्ड चैतन्य समुद्र के जिस अंश में सृष्टि क्रिया प्रकाशित हो उस चैतन्यांश का नाम ब्रह्मा कहते हैं और चेतनाधिष्ठान से जो क्रियाशक्ति प्रकाशित हो वही 'ब्राह्मी' है। इसका वाहन हंस है। हंस जीव को कहते हैं। व्यष्टि मन समष्टि मन का अंश मात्र होने के कारण समष्टि मन विराट मन है। इसी में सृष्टिक्रिया प्रकाशित होती है। मन का धर्म कल्पना है एवं कल्पना शक्तिरूपा है। इसी को क्रियाशक्ति कहते हैं, जो ब्राह्मी नामक है। यह हंसवाहिनी है। प्रति जीव में जो विभिन्न संकल्प देखा जाता है उसके मध्य होकर ही यह समष्टि मन का प्रकाश समझा जाता है, उसके मध्य होकर ही यह समष्टि मन का प्रकाश समझा जाता है। अतः जीव ही सृष्टि का परिचालक है। यदि जीव नहीं हो तो सृष्टि शक्ति के ज्ञान का उपाय हो ही नहीं सकता। इस कारण सृष्टि शक्तिरूपिणी ब्राह्मी का वाहन जीवरूपी हंस का होना ही उचित है। जीव श्वास-प्रश्वास के द्वारा दिन-रात में इक्कीस हजार छः सौ हंस मन्त्र का जप कर लेता है अतः उसे तान्त्रिक शब्दों में 'अजपा' कहते हैं। यही कारण है कि जीव हंस कहा जाता है।

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